झारखंड विधानसभा चुनाव : हुसैनाबाद में निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन देने पर क्यों मजबूर हुई भाजपा ?
नई दिल्ली। झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा के कई रंग हैं। तेवर दिखाने वाली भाजपा जब हुसैनाबाद सीट पर औंधे मुंह गिर गयी तो वह चिरौरी पर उतर आयी। जिस उम्मीदवार को उसने पहले दुतकारा था अब उसे पुचकारना शुरू कर दिया है। हुसैनाबाद सीट पर भाजपा आखिर क्यों निर्दलीय प्रत्याशी को समर्थन देने पर मजबूर हुई ? यहां भाजपा गरम से नरम कैसे हो गयी?

खींचतान में गिरी भाजपा
भाजपा और आजसू के बीच जब गठबंधन जीवित था तब सीट बंटवारे को लेकर हुसैनाबाद पर भी विवाद था। आजसू यहां से अपना उम्मीदवार देना चाहता था जब कि भाजपा पिछले चुनाव में तीसरे स्थान पर रहने के कारण खुद दावेदार थी। दोनों अपनी जिद पर अड़े थे। फैसला हो नहीं पा रहा था। भाजपा के स्थानीय नेता असमंजस में थे। भाजपा के युवा नेता और जिला परिषद के निवर्तमान उपाध्यक्ष विनोद कुमार सिंह टिकट के दावेदार थे। भाजपा उन्हें भाव नहीं दे रही थी। वह आजसू से मोलतोल में लगी थी। विनोद सिंह को लगा शायद भाजपा ये सीट आजसू को देने वाली है इसलिए उन्होंने बगवात कर दी। विनोद सिंह ने निर्दलीय ही हुसैनाबाद सीट से नामांकन कर दिया। इस बीच भाजपा का आजसू से तालमेल नहीं हो पाया और नामांकन की आखिरी तारीख भी गुजर गयी। उसका अधिकृत उम्मीदवार नॉमिनेशन नहीं कर पाया।

ऐसे झुकी भाजपा
आजसू से गठबंधन टूटने के बाद जब भाजपा ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जिस राज्य में आज तक किसी दल को बहुमत नहीं मिला हो वहां की एक-एक सीट का महत्व समझा जा सकता है। भाजपा के पास हुसैनाबाद में कोई विकल्प नहीं बचा था। उम्मीदवार नहीं होने से यह सीट उसके हाथ से फिसल रही थी। थक-हार कर उसने विनोद सिंह को समर्थन देने का फैसला किया। उसने नाराज विनोद सिंह को मनाया। विनोद सिंह अब भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। 2014 में इस सीट पर भाजपा के कामेश्वर प्रसाद कुशवाहा तीसरे स्थान पर रहे थे और उन्हें करीब 16 फीसदी वोट मिले थे। इस सीट पर कुशवाहा शिवपूजन मेहता ने बहुजन समाज पार्टी को पहली बार जीत दिलायी थी। अब शिवपूजन मेहता आजसू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं।

हुसैनाबाद की राजनीति तस्वीर बदली
हुसैनाबाद सीट पर भाजपा केवल एक बार जीती है। यह जीत उसे तीस साल पहले तब मिली थी जब यह सीट बिहार विधानसभा का हिस्सा थी। 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के दशरथ कुमार सिंह ने जनता दल के उम्मीदवार को केवल 163 वोटों के अंतर से हराया था। उसके बाद भाजपा यहां कभी जीत नहीं पायी है। बिहार-झारखंड की सम्मिलित राजनीति की बात करें तो इस सीट पर पहले कांग्रेस का प्रभाव था। कांग्रेस के दिग्गज नेता भीष्म नारायण सिंह लंबे समय तक यहां से विधायक रहे। वे बिहार के शिक्षा और खान मंत्री भी रहे थे। 2000 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर राजद के संजय सिंह यादव जीते थे। 2005 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कमलेश सिंह विजयी रहे। 2009 में राजद के संजय सिंह यादव फिर जीते। 2014 में शिवपूजन मेहता ने पहली बार यहां बसपा का खाता खोला। इस सीट पर अगड़ी और पिछड़ी जाति के मतदाता लगभग बराबर (35-35 फीसदी) हैं। अतिपिछड़ी जातियों के मतदाता करीब 11 फीसदी हैं। अतिपिछड़े वोटरों के रुख पर ही यहां का नतीजा निर्भर करता है।

चुनावी मुद्दा
जब झारखंड बिहार का हिस्सा था तब हुसैनाबाद प्रखंड की जपला सिमेंट फैक्ट्री देश भर में प्रसिद्ध थी। पलामू के हुसैनाबाद में एक सौ साल पहले जपला सिमेंट फैक्ट्री की स्थापना हुई थी। 1920-21 में निर्मित यह बिहार की पहली सिमेंट फैक्ट्री थी। तब जपला बिहार का औद्योगिक शहर था। आर्थिक रूप से समृद्ध इलाका था। लेकिन 1992 में यह सिमेंट फैक्ट्री बंद हो गयी। 15 नवम्बर 2000 को जब झारखंड अलग राज्य बना तो उसके हिस्से में बंद पड़ी जपला सिमेंट फैक्ट्री भी आयी। किसी सरकार ने इस फैक्ट्री को फिर खोलने की ईमानदार कोशिश नहीं की। इस फैक्ट्री में हमेशा के लिए ताला लग गया। 2018 में उसकी परिसम्पत्तियां नीलाम कर दी गयीं। 2017 में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने इस फैक्ट्री को दोबारा खोलने की घोषणा की थी लेकिन ऐसा हो न सका। मौजूदा विधायक शिवपूजन मेहता भी सिमेंट फैक्ट्री को दोबारा खोलने के लिए संघर्ष करते रहे हैं। फैक्ट्री को दोबारा खोलने की मांग पिछले कई साल हो रही है। हुसैनाबाद के लिए यह प्रमुख चुनावी मुद्दा है। अब तक तीन चुनावों में कोई प्रत्याशी दोबारा जीत हासिल नहीं कर सका है। यहां के वोटरों ने हर बार नये विधायक को चुना है।












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