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जयललिता, करुणानिधि युग के बाद पहले चुनाव के लिए तमिलनाडु तैयार

करुणानिधि, जयललिता
BBC
करुणानिधि, जयललिता

तमिलनाडु के दो बड़े नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्रियों जयललिता और करुणानिधि की मौत के बाद 18 अप्रैल को लोग पहली बार लोकसभा और विधानसभा उपचुनाव की सीटों के लिए वोट डालेंगे.

दिसंबर 2016 में जयललिता की मृत्यु के क़रीब दो साल बाद पिछले साल अगस्त में करुणानिधि की भी मौत हो गई थी.

डीएमके की कमान स्टालिन के हाथ में जबकि एआईएडीएमके के दो फाड़ हो चुके हैं. एक धड़ा पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम के हाथ में है. दूसरे धड़े के टीटीवी दिनाकरन का दावा है कि उनका धड़ा ही असली एआईएडीएमके है.

इडापड्डी के. पलानीस्वामी के नेतृ्त्व में तमिलनाडु में एआईएडीएमके की सरकार है जबकि ओ पनीरसेल्वम उप-मुख्यमंत्री हैं. साल 2016 में विधानसभा चुनाव जीतने के कुछ वक्त बाद ही जयललिता की मुख्यमंत्री काल में मृत्यु हो गई थी.

यानी आज की तारीख़ में तमिल राजनीति में राष्ट्रीय पहचान का कोई नेता नहीं है और भाजपा एआईएडीएमके के साथ मिलकर यहां प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में है.

स्टालिन
PTI
स्टालिन

राजनीतिक इतिहास

ये वही राज्य है जहां 1967 में कांग्रेस के सत्ता से बाहर जाने के बाद से द्रविड़ पार्टियों का प्रभुत्व रहा है और राष्ट्रीय दलों ने द्रविड़ पार्टियों के नेतृत्व में सहयोगी की भूमिका निभाई है.

चेन्नई के प्रसिद्ध मरीना बीच पर कई लोगों ने बातचीत में कहा कि करुणानिधि और जयललिता के जाने के बाद उन्हें समझ में नहीं आ रहा है नए चेहरों में में से किस पर विश्वास करें और किसे वोट करें.

और दूसरा उनका आरोप था कि राज्य को चलाने वाले नेता कमज़ोर हैं, और इस कारण राष्ट्रीय राजनीति में तमिलनाडु का क़द कम हुआ है और दिल्ली का असर बढ़ा है.

तमिलनाडु के इतिहास से हिंदी विरोधी प्रदर्शन भी जुड़े हैं और उत्तर भारत के बढ़ते प्रभाव का विरोध भी.

लोग बीते वक्त को याद कर रहे हैं जब जयललिता की समर्थन वापसी से वाजपेई सरकार गिर गई थी, केंद्र की यूपीए पर डीएमके का प्रभाव था, यानि तमिलनाडु के चुने नेता ज़ोर शोर से अपनी मांगों को आगे रखते थे.

ओ पनीरसेल्वम
AFP
ओ पनीरसेल्वम

कई लोगों में नाराज़गी इस बात पर भी है कि मुख्यमंत्री के तौर पर जयललिता ने जिन कार्यक्रमों का विरोध किया, उनकी बीमारी के दौरान और मौत के बाद एआईएडीएमके की राज्य सरकार ने उन पर पर हामी भर दी, चाहे वो खाद्य सुरक्षा बिल या जीएसटी को यहां लागू करना हो, मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए नीट परीक्षा हो या फिर बिजली वितरण कंपनियों को पटरी पर लाने की उदय योजना को लागू करना हो.

वो मानते हैं कि भाजपा की केंद्र सरकार के दबाव में राज्य सरकार ने ये क़दम उठाए.

बातचीत में भाजपा प्रवक्ता नारायनन तिरुपति और एआईएडीएमके के राबी बर्नार्ड ने माना कि जयललिता कुछ बातों के तो ख़िलाफ़ थीं "लेकिन ऐसा कैसे हो कि एक क़ानून पूरे देश में लागू हो लेकिन तमिलनाडु में लागू न हो."

तमिलनाडु ने जीएसटी का विरोध किया क्योंकि माना जाता था कि इससे राज्य को राजस्व का नुक़सान होगा. नीट के विरोध के पीछे सोच थी कि इससे ग़रीब परिवारों को नुक़सान होगा क्योंकि वो महंगी कोचिंग पर पैसा ख़र्च नहीं कर पाएंगे. जयललिता का कहना था कि केंद्र सरकार को राज्य के अधिकारों में दख़ल नहीं देना चाहिए. वो खाद्य सुरक्षा बिल को उसी नज़रिए से देखती थीं.

भाजपा के मुताबिक़ असामाजिक और लोगों को बांटने वाले लोग जनता को भड़का रहे हैं और अगर केंद्र सरकार राज्य की सहायता करती है तो इसमें कोई ग़लत बात नहीं.

डीएमके नेता और राज्य सभा सांसद टीकेएस इलंगोवन
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डीएमके नेता और राज्य सभा सांसद टीकेएस इलंगोवन

नए और पुराने की तुलना

तुलना हो रही है कि किस तरह जयललिता विपक्षी नेताओं और केंद्र सरकार के समक्ष मज़बूती से अपनी बात रखती थीं. और वाकपटु करुणानिधि की लोगों पर कितनी पकड़ थी. ये बातें पार्टियों के नए नेताओं में नहीं हैं.

हाल में जब स्टालिन ने प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम आगे किया तो शायद ही किसी ने उनकी बात को आगे बढ़ाया. स्टालिन के आलोचक कहते हैं कि अगर करुणानिधि किसी का नाम आगे बढ़ाते तो उनकी बात में बहुत ज़्यादा वज़न होता.

डीएमके नेता और राज्य सभा सांसद टीकेएस इलंगोवन के मुताबिक़ विपक्षी नेता राहुल गांधी को बहुत "जूनियर" मानते हैं और शायद इसलिए स्टालिन की बात पर चुप्पी साध ली.

वो कहते हैं, "किसी ने राहुल वाली बात नहीं मानी लेकिन राहुल गांधी की जगह किसी ने दूसरा नाम भी पेश नहीं किया. उसमें भी विपक्ष में एकता नहीं है."

इलंगोवन के मुताबिक़ 2004 में जब करुणानिधी ने सोनिया गांधी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया था तब भी कई तरफ़ से उनका विरोध हुआ था.

अख़बार द हिंदू के डी सुरेश कुमार
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अख़बार द हिंदू के डी सुरेश कुमार

क्या है कमी?

आम लोग करुणानिधि और जयललिता की कमी की बात करते हैं.

अख़बार 'द हिंदू' के डी सुरेश कुमार कहते हैं, "यहां लोगों को मज़बूत नेताओं की कमी खल रही है. उन्हें लगता है कि यहां एक कमज़ोर राज्य सरकार है जो केंद्र की भाजपा सरकार की ग़ुलाम है. ऐसा पहले नहीं था. पिछले 50 सालों की द्रविड़ राजनीति में राज्य में अन्नादुराई, एमजीआर, जयललिता और करुणानिधी जैसे मज़बूत नेताओं का ज़ोर रहा है."

एआईएडीएमके भाजपा के साथ इन चुनाव में उतरी है लेकिन कई हलक़ों में सोच ये है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा एआईएडीएमके की कमज़ोर लीडरशिप के कारण उस पर हावी है.

याद रहे कि 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर के दौरान भी तमिलनाडु की 39 सीटों में से 37 जयललिता की एआईएडीएमके ने जीती थीं और राज्य में द्रविड़ दलों का मज़बूत प्रभाव जारी रहा था.

कॉलम्निस्ट और पत्रकार कविता मुरलीधनर
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कॉलम्निस्ट और पत्रकार कविता मुरलीधनर

कॉलम्निस्ट और पत्रकार कविता मुरलीधनर कहती हैं, "2014 के चुनाव में जयललिता ने चुनाव प्रचार में मोदी को चुनौती दी और लोगों से पूछा - कौन बेहतर प्रशासक है, गुजरात के मोदी या तमिलनाडु की लेडी. उनकी मौत के बाद हाल ही में एक एआईएडीएमके मंत्री ने कहा मोदी हमारे डैडी हैं. ऐसे बयानों से लोग बेहद निराश हैं."

स्टालिन और करुणानिधि की तुलना करते हुए मद्रास विश्वविद्यालय के मनिवन्नन कहते हैं, "स्टालिन बहुत अच्छे वक्ता नहीं हैं और वो हर काम में एहतियात बरतते हैं. वो फैसला नहीं लेते लेकिन उम्मीद करते हैं कि काम हो जाए. उनकी तुलना में करुणानिधि आगे बढ़कर काम की दिशा बदल देते थे."

डीएमके के एक नेता ने बताया कि स्टालिन के भाषणों पर एक टीम काम कर रही है लेकिन सफ़र लंबा है.

पत्रकार डी सुरेश कुमार कहते हैं एआईएडीएमके नेता और मुख्यमंत्री ईपी पल्लानीस्वामी की सभाओं में लोग आ तो रहे हैं लेकिन रुक नहीं रहे हैं.

मद्रास विश्वविद्यालय के मनिवन्नन
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मद्रास विश्वविद्यालय के मनिवन्नन

उन्होंने ट्विटर पर चल रहा एक वीडियो दिखाया जिसमें एआईएडीएमके कार्यकर्ता लोगों को सभा छोड़कर जाने से रोक रहे थे.

डीएमके और एआईएडीएमके के नेताओं को इस बात से राहत मिलती होगी कि तमिलनाडु में ऐसे कई लोग हैं जो अपना वोट नहीं बदलते चाहे नेता बदल जाए.

हमारे ड्राइवर बाशा ने बताया कि उनके दादा डीएमके को वोट देते थे, उनके पिता के बाद अब वो भी डीएमके को वोट देते हैं.

लेकिन जानकार बताते हैं कि पहली बार वोट डालने जा रहे नए वोटरों में ऐसी निष्ठा नहीं है इसलिए नेताओं के सामने काम कर ख़ुद को साबित करने की चुनौती है.

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