जाटों, ज़मींदारों सबने रयान स्कूल के दलित कंडक्टर का दिया साथ

"सीधे चले जाइए, हरिजन बस्ती में, वहीं है अशोक का घर."

गुरुग्राम (गुड़गाँव) के घामड़ौज गाँव में जैसे ही पता पूछने के लिए हमारी गाड़ी रूकती, कोई ना कोई गाँव वाला इशारे से बता देता कि कहाँ जाना है.

अशोक का घर ढूंढने में कोई दिक्कत नहीं हुई. पिछले दो महीने से मीडिया का उसके घर आना-जाना लगा रहता है.

ये अशोक कुमार वही हैं जो रयान इंटरनेशनल स्कूल के छात्र प्रद्युमन की हत्या के आरोप में पिछले दो महीने से पुलिस हिरासत में था.

आठ सितम्बर को स्कूल में ही सात साल के बच्चे प्रद्युमन की हत्या ने खलबली मचा दी थी.

दिल्ली-एनसीआर के एक बड़े स्कूल में हत्या होना मीडिया के लिए मामूली खबर नहीं थी.

गुरुग्राम पुलिस ने भी एक ही दिन में स्कूल बस के कंडक्टर अशोक को पकड़ कर मीडिया के सामने जुर्म कबूल भी करवा दिया था.

लेकिन बच्चे के माँ-बाप को कुछ और ही अंदेशा था और उनकी लगातार मांग पर केस सीबीआई को सौंपा गया.

अशोक को पकड़े जाने के ठीक दो महीने बाद सीबीआई ने स्कूल के ही एक छात्र को हत्या के आरोप में हिरासत में लिया.

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अशोक को मिला गाँव का साथ

घामड़ौज गांव में घुसते ही एक ठीक-ठाक बड़ा स्कूल है. बड़े-बड़े घरों को देखकर लगा कि काफी संपन्न गांव है.

अशोक के घर के बाहर मीडिया की गाड़ियों की लाइन लगी हुई थी और अंदर कई पत्रकार उनके इंटरव्यू के लिए कतार में थे.

एक कमरे में अशोक कंबल ओढ़ कर खाट पर लेटे थे और उनकी पत्नी ममता घूंघट में उनके सिरहाने बैठी थीं. अशोक बोलने की हालत में नहीं थे. मीडिया से गाँव का एक व्यक्ति ही बात कर रहा था.

कमरे के बाहर गाँव की 10-12 महिलाएँ अशोक से मिलने के लिए बैठी थीं, आपस में अशोक को लेकर चर्चा हो रही थी.

अशोक का आरोप है कि उन्हें बुरी तरह मारा पीटा गया लेकिन गुड़गाँव पुलिस इन आरोपों को ग़लत बताती है.

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अशोक कुमार
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अशोक के समर्थन में गांववासी

"अशोक ऐसा नहीं है. दो छोटे बच्चे हैं उसके. इसके माँ-बाप इतने भले लोग हैं. सारा परिवार ही भला है. उसको मार-पीट कर डरा दिया, बेटी", गाँव की एक बुज़ुर्ग कुर्सी से उठ कर मेरे पास आती हुई बोलीं.

मेरे पूछने पर वहां बैठी औरतों ने बताया कि वे सब यहां अशोक का हाल-चाल लेने आई हैं.

गाँव की ही एक महिला को रोते देख मैंने उनसे पूछा कि आपका अशोक से क्या रिश्ता है. उन्होंने बताया कि ये लोग हमारे खेतों पर काम करते हैं. बहुत गरीब हैं. घर को देख कर पता चल ही गया होगा आपको.

जहां हम बैठे थे, वो घर अशोक के किसी रिश्तेदार का था. ज़मानत मिलने पर गांव लौटने के बाद से अशोक इसी घर में हैं और तबसे अपने घर में कदम नहीं रख पाए हैं. मीडिया लगातार उसे घेरे हुए है. अशोक की मामी ने बताया कि हम कल रात ढाई बजे से सो नहीं पाए हैं.

मैं महिला के बताये हुए घर में पहुंची. लोहे के गेट वाले घर में ठीक से चारदीवारी भी नहीं थी.

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अशोक के घर का आंगन
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गांव वालों ने ली ज़िम्मेदारी

दो कमरों के घर में अशोक के माँ-बाप, पत्नी और दोनों बच्चे रहते हैं. चार बहनें हैं जिनकी शादी हो चुकी है. दोनों बच्चे प्रद्युमन के ही हमउम्र हैं. एक बेटा आठ साल का और एक सात साल का.

घर के दोनों कमरों में सामान के लिए चाहे कम जगह हो लेकिन भगवान के मंदिरों और तस्वीरों को काफ़ी जगह मिली हुई थी.

गोबर-मिट्टी से लिपे आँगन के एक कोने में अशोक की एक बहन बर्तन धो रही थी. दूसरी बहन सुषमा चूल्हे पर पानी गर्म कर रही थी.

"जब पहली बार सुना तो झटका सा लगा कि ये कैसे हो सकता है", सुषमा बताने लगीं कि पिछले 2 महीने परिवारवालों पर कितने भारी गुज़रे.

"मदद तो सब गाँव वालों ने की, जिन लोगों से बातचीत नहीं होती थी, वे लोग भी आगे आये. ज़मानत की रकम भरने के लिए किसी ने 100 रूपये दिए, किसी ने 500."

अशोक की पत्नी के माता-पिता भी आँगन में आकर बैठ गए. पिता ने बताया कि उनकी बेटी और अशोक की शादी को 12 साल हो गए हैं. कभी उनके कहने पर एक सांप भी नहीं मारा अशोक ने, फिर किसी बच्चे को कैसे मारा होगा.

"अब आगे क्या करेंगे, ये हम नहीं जानते. गाँव वाले ही, गाँव के प्रधान ही मिल कर तय करेंगे कि कोई मुक़दमा किया जाएगा या नहीं. गाँव वाले ही अब तक सब करते आ रहे हैं."

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अशोक के घर से ली गई तस्वीर
BBC
अशोक के घर से ली गई तस्वीर

नौकरी से तौबा

अशोक के दोनों बच्चे वहीं खेल रहे थे. सुषमा ने बताया कि दो महीने से बच्चों की स्कूल की फीस भी नहीं भर पाए हैं. स्कूल वाले ऐसे ही पढ़ा रहे हैं.

अशोक की बड़ी बहन मुझे चाय देने लगी. मैंने मना किया तो बोली कि आप लोग भी तो काम में लगे हुए हो, पी लो.

मैंने चाय हाथ में ली और पूछा कि सिर्फ आपके कुनबे और बस्ती के लोगों ने मदद की या बाकी गांव वालों ने भी?

"ऐसा कहते हैं ना कि जाट-ज़मींदार लोगों को क्या मतलब होगा हम जैसे लोगों से..लेकिन हर कोई मदद करने आया."

थोड़ा परेशान होते हुए बोलीं कि भाई ने मना कर दिया है कि वो अब किसी की नौकरी नहीं कर पाएगा. यहीं गांव में ही कोई काम देख लेगा.

"अगर बच्चे के मां-बाप जांच के लिए न अड़े होते तो हमारा भाई तो हमेशा के लिए चला ही गया था."

वहीं पास में ही एक रिपोर्टर अशोक के मामा से कह रहा था कि रिश्तेदारों को इकट्ठा कर लो, चार बजे लाइव करेंगे. मुआवज़े की मांग करिए आप लोग. मामा ने कहा कि ये सब हमें नहीं पता, हमारा बेटा घर आ गया, बस.

गाँव के बड़े मकानों के बीच से गुज़र कर आखिर में हरिजन बस्ती में रहने वाले अशोक के घर गांव वालों का आना-जाना लगा रहा. कुछ देर बाद मीडिया का गाड़ियां भी लौटने लगीं थीं.

लाठी के सहारे चलते आये एक बुज़ुर्ग ने मुझसे पूछा, "बेटी, अशोक कित है (अशोक कहाँ है)". इशारे से मैंने उन्हें बता दिया कि अशोक आ गया है, अभी दूसरे घर में है.

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