जानलेवा गर्मी में भी जारी अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति की जंग
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। राजधानी में एक तरफ जानलेवा गर्मी पड़ रही है, दूसरी तरफ लू के प्रकोप व तपन से लोग अपने कार्यालय व घरों में त्राही त्राही कर रहे है। सडकें सुनसान है। ऐसे तपते मौसम में भी भारतीय भाषा आंदोलन के जांबाज देश को अंग्रेजी की गुलामी के बंधन से मुक्ति दिलाने के लिए जंतर मंतर पर विगत 26 माह से धरना जारी रखे हुए है।

निर्णायक लड़ाई
भारतीय भाषा आंदोलन ने भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चौहान व महासचिव देवसिंह रावत के नेतृत्व में जंतर मंतर पर 21 अप्रैल 2013 से देश में अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति के लिए अपनी निर्णायक जंग प्रारम्भ कर दी। भारतीय भाषा आंदोलन ने सरकार से दो टूक मांग की है कि न्यायपालिका व संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं, शिक्षा व रोजगार सहित पूरे देश की व्यवस्था से अंग्रेजी की अनिवार्यतारूपि गुलामी से मुक्त करके भारतीय भाषा लागू करे।
होती उपेक्षा
जंतर मंतर पर भारतीय भाषा आंदोलन के सतत् धरने से अनेक ज्ञापन सरकार को दिये जाने के बावजूद न मनमोहन सरकार व नहीं मोदी सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंगी। इस शांतिपूर्ण व राष्ट्रहित की प्रमुख आंदोलन की सरकार द्वारा लगातार शर्मनाक उपेक्षा की जा रही है। इसी से आहत भारतीय भाषा आंदोलन ने 20 अप्रैल 2015 को इस धरने को दो साल पूरे होने पर जंतर मंतर पर धिक्कार दिवस मनाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अंग्रेजों के जाने के 68 साल बाद भी देश की आजादी को बलात अंग्रेजी की गुलामी के कलंक से मुक्त करने की पुरजोर मांग करते हुए एक ज्ञापन भी दिया।
ज्ञापन में प्रधानमंत्री का ध्यान इस तरफ आकृष्ट किया गया कि पूरे विश्व के चीन, रूस, जर्मन, फ्रांस, जापान, टर्की सहित सभी स्वतंत्र व स्वाभिमानी देश अपने देश की भाषा में अपनी व्यवस्था संचालित करके विकास का परचम पूरे विश्व में फहरा रहे हैं।
अंग्रेजी की गुलामी
इस आंदोलन के नेता देव सिंह रावत कहते हैं कि शर्मनाक स्थिति यह है कि 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने के 68 साल बाद भी देश को वह आजादी हासिल नहीं हुई जिसके लिए हमारे शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व बलिदान किया। उसी फिरंगी भाषा (अंग्रेजी) की दासता शर्मनाक ढ़ग से जकड़ा हुआ है जिसकी गुलामी से मुक्ति के लिए देश के लाखों सपूतों ने अपना सर्वस्व बलिदान देते हुए शताब्दियों तक लम्बा ऐतिहासिक संघर्ष किया था।












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