दिल्‍ली की छात्रा ने लिखा खत- पापा, मेरी आत्मा को योनि के भीतर कैद न समझें...

मैं अपने मूलभूत अधिकारों के लिए लड़ती रहूंगी और वो इन सब से काफ़ी आगे की लड़ाई लड़ रही होंगी। ये वो पिछड़ापन है जिसकी डोर रिश्तों के साथ गूंथ कर बंधी हुई है।

नई दिल्‍ली। जामिया मिल्लिया इस्‍लामिया से मास कम्‍युनिकेशन का कोर्स करने वाली छात्रा बुशरा शेख का फेसबुक पोस्‍ट तेजी से वायरल हो रहा है। बुशरा ने अपने फेसबुक पोस्‍ट में आजादी की बात कहते हुए अपने पिता और पितृसत्तात्‍मक समाज के खिलाफ लिखा है। उसने अपने पोस्‍ट के माध्‍यम से यह जाहिर करने की कोशिश की है कि एक नौजवान लड़की अपनी दुनिया को कैसे देखती-समझती है। परिवार और संबंधियों से पड़ने वाले दबाव का सामना कैसे करती है। तो आईए बुशरा की पूरी कहानी आपको उसी के फेसबुक पोस्‍ट की जुबानी बताते हैं। इससे पहले आपको बता दें कि फोटो बुशरा के फेसबुक अकाउंट से और कंटेंट उसके पोस्‍ट से लिया गया है।

दिल्‍ली में पली बढ़ी

दिल्‍ली में पली बढ़ी

मेरी उम्र 24 साल है, पोस्ट ग्रेजुएशन की छात्रा हूं और दिल्ली जैसे महानगर में पली बढ़ी हूं। परिवार में तालीम लेने वाले लोगों की कमी नहीं है (मानसिक स्तर पर भले ही तालीम से दूर दूर तक कोई लेना देना न हो)। मेरे पिता की चार संताने हैं और हम चारों ही लड़कियाँ हैं। हालाँकि लड़की होने का कोई मलाल अब तक उनमें दिखा नहीं।

 रवैया हमेशा से बेहद सख़्त रहा

रवैया हमेशा से बेहद सख़्त रहा

पढ़ाई लिखाई को लेकर हमें बचपन से ही प्रोत्साहित किया जाता रहा है (ये पढाई लिखाई अच्छा कैरियर बनाने तक ही सीमित रहे तो ही ठीक है। जैसे ही आपने उस शिक्षा का इस्तेमाल समाज के बनाये नियम कायदों को तोड़ने और उनके विरुद्ध जाने के लिए सोचा तो सचेत हो जाइए), लेकिन कुछ चीज़ों को लेकर उनका रवैया हमेशा से बेहद सख़्त रहा है।

शाम 6 बजते ही मेरे फ़ोन की घण्टी बजने लगती है

शाम 6 बजते ही मेरे फ़ोन की घण्टी बजने लगती है

मुझे क्या पहनना है क्या नहीं, घर से कितने बजे निकलना है, कब वापस आना है, किनसे बात करनी है किसे मित्र (उनके अनुसार लड़कियाँ) बनाना है इन सबका फ़ैसला करने का एकमात्र अधिकार मेरे पिता को प्राप्त है। शाम 6 बजते ही मेरे फ़ोन की घण्टी बजने लगती है, ये याद दिलाने के लिए कि मेरे वापस आने का समय अब हो चला है।

मेरा अधिकार नहीं

मेरा अधिकार नहीं

और अगर फोन उठाने में ज़रा भी कोताही बरती तोह बदले में जो सब सुनना पड़ता है वो आपको भीतर तक तोड़ने के लिए काफी होता है। ख़्वाहिश,आज़ादी ,चुनाव, फ़ैसले लेने के अधिकार, ये सब भले ही मेरी ज़िन्दगी से जुड़े शब्द हो लेकिन यह मेरा अधिकार प्राप्त क्षेत्र नहीं।

पिछड़ेपन का एहसास तेज़ होने लगता है

पिछड़ेपन का एहसास तेज़ होने लगता है

आज के दौर में जब मैं मेरी उम्र की लड़कियों को उनके ज़िन्दगी के तमाम फैसले स्वयं लेते देखते हूँ, देश विदेश के राजनितिक, सामाजिक, महिला सम्बन्धी मुद्दों, लिव इन, सेक्स की आज़ादी, पीरियड्स से जुड़ी समस्याओं, पर अपने मत को मुखर होकर रखते हुए देखती हूँ तो अपने पिछड़ेपन का एहसास तेज़ होने लगता है। हमारे बीच की पिछड़ेपन की खाई वक़्त के साथ बढ़ती जायेगी।

अधिकारों के लिए लड़ती रहूंगी

अधिकारों के लिए लड़ती रहूंगी

मैं अपने मूलभूत अधिकारों के लिए लड़ती रहूँगी और वो इन सब से काफ़ी आगे की लड़ाई लड़ रही होंगी। ये वो पिछड़ापन है जिसकी डोर रिश्तों के साथ गूँथ कर बँधी हुई है। परिवार नामक संस्था की इज़्ज़त का बोझा आपकी इच्छा के बिना आप पर लाद दिया जाता है। और रिश्तों की बेड़िया आपके क़दमो को समय समय पर कंट्रोल करती रहती है।

मेरे शरीर की बनावट, मेरे लिंग का आधार

मेरे शरीर की बनावट, मेरे लिंग का आधार

आप कई बार इन सब बन्धनों और सीमाओं को तोड़ कर निकलने की कोशिश तो करती हैं लेकिन वो सीमाएं अपना दायरा मुसलसल बढ़ाती जाती है और आप थक कर बैठ जाते है। मेरे शरीर की बनावट, मेरे लिंग का आधार, भला कैसे मेरे फैसलों और मेरी इच्छाओं को मुझसे छीन सकता है।

शरीर के अंगों के बढ़ते उभारों के साथ बढ़ता जाता है

शरीर के अंगों के बढ़ते उभारों के साथ बढ़ता जाता है

भला ये कैसी मानसिकता है जो मेरी योनि में अपने वर्चस्व, इज़्ज़त को महफूज रखने का ढकोसला करती फिरती है। हर दिन हर जगह..आख़िर ये कैसा भय है, कैसी असुरक्षा की भावना है जो मेरे शरीर के अंगों के बढ़ते उभारों के साथ बढ़ता जाता है। यह लड़ाई मैं पिछले 10 साल से भी ज्‍यादा समय से लड़ती आ रही हूं और न जाने कब तक लड़ती रहूँ।

आख़िर वो कब मुझे खुलकर ये कहेंगे

आख़िर वो कब मुझे खुलकर ये कहेंगे

आख़िर वो कब मेरी हर इच्छा के पीछे की ज़रूरत तलाशने से बाज़ आएंगे, कब समझेंगे कि दुप्पटे से छाती ढक लेने भर से लोगों की मानसिकता नहीं ढ़क जाती वो गन्दी नज़र दुपट्टे को चीरते हुए भी निकल जायेगी। मेरी आत्मा को योनि के भीतर कैद न समझे.. आख़िर वो कब मुझे खुलकर ये कहेंगे की लड़की होने का अर्थ पति के आगे सर झुकना नहीं होता, उसकी हर नाजायज़ हरक़त को ज़ायज़ समझ के स्वीकार करना नहीं होता, बेज़ुबान होकर जीना,और सहना नही होता बल्कि लड़की होना इन सब रूढ़िवादिताओं को कुचलने से भी अधिक पावरफुल होना होता है और शारीरिक बनावट की भिन्नता से अधिकारों में भिन्नता हरगिज़ नहीं लायी जा सकती है।

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