कानूनी प्रक्रिया से ही तय हुआ JAL का भविष्य: Adani की जीत पर मुहर, CoC की ‘कमर्शियल विजडम’ सर्वोपरि
हाल ही में Jaiprakash Associates Limited (JAL) के अधिग्रहण को लेकर Vedanta के दावों के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें बोली प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, CoC, NCLT और NCLAT के फैसले इस पूरी प्रक्रिया को वैध ठहराते हैं। इस लेख में समझते हैं क्या है पूरा मामला, Vedanta के दावे की वैधानिकता और Adani Group की जीत की कहानी और पूरी कानूनी प्रक्रिया।
इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत पिछले एक दशक में भारतीय न्याय व्यवस्था ने एक सिद्धांत को लगातार मजबूत किया है-Committee of Creditors (CoC) की कमर्शियल विजडम सर्वोपरि है और अदालतें उसमें हस्तक्षेप नहीं करतीं। Jaiprakash Associates Limited (JAL) का मामला इसी स्थापित न्यायिक सिद्धांत का सबसे ताज़ा और स्पष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है।

क्या कहता है कानून?
Bombay High Court के वकील विनय चौहान भी इस बात को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि, "पिछले एक दशक में IBC के तहत न्यायिक दृष्टिकोण ने लगातार CoC की कमर्शियल समझ को प्राथमिकता दी है। अदालतों ने CoC के फैसलों को सर्वोपरि माना है। JAL मामले में भी CoC द्वारा चुने गए सफल रेजोल्यूशन एप्लिकेंट को NCLT ने बरकरार रखा, जबकि NCLAT ने भी उसके क्रियान्वयन पर कोई रोक नहीं लगाई। इस प्रकार, CoC की कमर्शियल विजडम को अदालतों ने निर्णायक माना है।"
वेदांता बनाम अडानी - क्या है मामला?
Jaiprakash Associates Limited (JAL) के दिवालियापन समाधान प्रक्रिया में कई कंपनियों ने बोली लगाई, लेकिन Committee of Creditors (CoC) ने व्यापक मूल्यांकन के बाद Adani Group के प्रस्ताव को चुना। यह निर्णय केवल सबसे ऊंची बोली पर नहीं, बल्कि भुगतान की संरचना, विश्वसनीयता और समयबद्ध रिकवरी जैसे कारकों पर आधारित था। CoC ने 93.8% वोट से इस प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसे NCLT ने भी स्वीकार किया। NCLAT ने इस पर कोई रोक नहीं लगाई। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला पूरी तरह IBC के नियमों और CoC की कमर्शियल विजडम के तहत लिया गया।
JAL के रेजोल्यूशन प्रोसेस में कई बड़े कॉरपोरेट समूहों ने भाग लिया, लेकिन अंततः CoC ने विस्तृत मूल्यांकन के बाद Adani Group की बोली को मंजूरी दी। यह निर्णय केवल बोली की राशि पर आधारित नहीं था, बल्कि भुगतान की संरचना, निष्पादन की विश्वसनीयता और समयबद्ध रिकवरी जैसे अहम कारकों को ध्यान में रखकर लिया गया।
PTI की रिपोर्ट के अनुसार, भले ही Vedanta ने दावा किया कि उसे "लिखित रूप से विजेता घोषित किया गया था", लेकिन लेंडर्स और प्रक्रिया से जुड़े सूत्रों ने स्पष्ट किया कि Vedanta कभी भी आधिकारिक रूप से सफल बोलीदाता नहीं था।
विश्लेषकों ने भी साफ कहा कि IBC प्रक्रिया में सिर्फ ज्यादा बोली लगाना जीत की गारंटी नहीं होता, बल्कि अंतिम फैसला CoC के संरचित मूल्यांकन और वोटिंग से तय होता है। CoC ने करीब 93.8% वोट के साथ Adani के रेजोल्यूशन प्लान को मंजूरी दी, जिसे बाद में NCLT ने भी स्वीकृति दे दी। यह दिखाता है कि यह निर्णय वैधानिक और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत लिया गया था।
अडानी की बोली की सबसे बड़ी ताकत उसकी ₹6000 करोड़ से अधिक की upfront payment और तेज निष्पादन क्षमता रही, जबकि Vedanta का प्रस्ताव लंबी अवधि में किस्तों पर आधारित था। ऐसे में, वर्षों से फंसे लेंडर्स के लिए तेज और सुनिश्चित रिकवरी ज्यादा अहम रही, और इसी आधार पर Adani का प्रस्ताव ज्यादा व्यवहारिक और भरोसेमंद माना गया।
कानूनी स्तर पर भी अडानी की स्थिति मजबूत बनी रही। NCLAT ने Vedanta की अपील पर कोई अंतरिम रोक (stay) नहीं दी, जिससे यह और स्पष्ट हो गया कि न्यायिक संस्थाएं CoC के फैसले को चुनौती देने के पक्ष में नहीं हैं।
मतलब साफ है:
JAL की संपत्तियों का अधिग्रहण Adani Group ने किसी विवाद या अनिश्चितता के तहत नहीं, बल्कि IBC की स्थापित कानूनी प्रक्रिया, CoC की निर्णायक मंजूरी और न्यायिक स्वीकृति के माध्यम से वैध तरीके से हासिल किया। यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि भारत में कॉरपोरेट दिवालियापन प्रक्रिया में भावनाओं या दावों से नहीं, बल्कि कानून, प्रक्रिया और वित्तीय व्यवहारिकता से ही अंतिम विजेता तय होता है।
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