Jagannath Rath Yatra 2021: खास लकड़ी से तैयार होते हैं रथ, रास्ते किए जाते हैं 'सोने की झाड़ू' से साफ

नई दिल्ली, 12 जुलाई। आस्था की मानक भगवान जगन्नाथ की 144वीं 'रथ यात्रा' आज पुरी में कोरोना महामारी की वजह से बिना भक्तों के निकाली जा रही है। 'जगन्नाथ रथ यात्रा' हर साल आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को प्रारंभ होती है। कहा जाता है कि श्री जगन्नाथ जी, राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति का रूप है और इन्हीं की वजह से सम्पूर्ण जगत का उद्भव हुआ है। स्कंद पुराण में लिखा है कि 'जो भी व्यक्ति प्रभु जगन्नाथ के नाम का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा नगर जाता है वह सारे अपने कष्टों से मुक्त हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।'

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    नीम या नारियल की लकड़ी के बने होते हैं रथ

    नीम या नारियल की लकड़ी के बने होते हैं रथ

    आपको बता दें कि आस्था के मानक पुरी के जगन्नाथ धाम में 800 सालों से प्रभु जगन्नाथ की पूजा होती है, जिसमें उनके साथ उनके बड़े भाई बलराम जी और बहन सुभद्रा भी विराजमान हैं, रथयात्रा में तीनों ही लोगों के रथ निकलते हैं। ये रथ नारियल की लकड़ी के बने होते हैं और इसमें एक भी कील नहीं होती है और ना ही किसी धातु का प्रयोग किया जाता है। लकड़ी के बने होने के कारण इस रथ को खींचने में आसानी होती है।

    भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल-पीला होता है

    भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल-पीला होता है

    भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल-पीला और आकार में बहुत बड़ा होता है। इनके रथ का नाम 'नंदीघोष' है, जो कि यात्रा में सबसे पीछे चलते हैं। सबसे आगे प्रभु बलराम का रथ होता है जिसका नाम 'ताल ध्वज' है और बीच में बहन सुभद्रा का रथ होता है, जिसे कि 'पद्म ध्वज रथ' कहते हैं।

    'बहुड़ा यात्रा'

    'बहुड़ा यात्रा'

    जगन्नाथ यात्रा केवल पुरी में नहीं निकाली जाती है, बल्कि गुजरात में भी इस यात्रा का आयोजन होता है। इस यात्रा की एक और खास बात है, इसके शुरू होने से पहले इसके मार्ग को 'सोने की झाड़ू' से साफ किया जाता है। इसके बाद रथों की पूजा की जाती है, फिर रथों को खींचकर जगन्नाथ मंदिर से 3 कि.मी. दूर गुंडीचा मंदिर ले जाते हैं। इस स्थान को भगवान की मौसी का घर कहते है। जहां तीनों भाई-बहन 7 दिनों तक आराम करते हैं और इसके बाद फिर आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ वापस मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। वापसी की यह यात्रा 'बहुड़ा यात्रा' कहलाती है।

    एकादशी पर होती है प्रतिष्ठा

    जगन्नाथ मंदिर पहुंचने के बाद भी सभी प्रतिमाएं रथ में ही रहती हैं। अगले दिन एकादशी पर मंदिर खोले जाते हैं और तब देवों को गंगा स्नान के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उन्हें प्रतिष्ठित किया जाता है।

    रथ-यात्रा का सीधा-प्रसारण

    पुरी रथयात्रा में कई धर्मों के लोग शामिल होते हैं, जो कि इस बार कोरोना महामारी के कारण शामिल नहीं हो पा रहे हैं लेकिन सभी भक्तों के लिए यात्रा का सीधा प्रसारण डीडी चैनल और ऑन लाइन हो रहा है।

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