क्या CRFP कमांडो की रिहाई के लिए नक्सलियों से हुई थी डील ? बदले में छोड़ा गया था एक शख्स
रायपुर। छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सुरक्षबलों के ऊपर घात लगाकर नक्सलियों ने हमला कर दिया था जिसमें 22 जवान मारे गए थे और एक जवान का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था। सीआरपीएफ के इस जवान राकेश्वर सिंह मिनहास के अपहरण की नक्सलियो ने खुद ही जानकारी दी थी। पांच दिनों के प्रयास के बाद नक्सलियों ने इस जवान को रिहा किया था। शुरुआत में कहा गया था कि इस जवान को नक्सलियों ने बिना किसी शर्त के छोड़ा था लेकिन अब जो जानकारी सामने आ रही है उसमें इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं। दरअसल जवान के बदले में नक्सलियों ने एक आदमी को छोड़ने की मांग रखी थी और जवान के रिहा करने के पहले छोड़ा भी गया था।
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कुंजम सुक्का के बदले था जवान को छोड़ा
8 अप्रैल को जब नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवान को राकेश्वर को रस्सियों से खोलकर आजाद किया तो उसके कुछ घंटे पहले ही एक शख्स को सुरक्षाबलों के कब्जे से नक्सलियों तक पहुंचाया गया था।
हालांकि इस शख्स के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं सामने आई है लेकिन हिंदू की खबर के मुताबिक इस शख्स का नाम कुंजम सुक्का है। नक्सलियों ने जवान राकेश्वर की रिहाई के बदले एक डील थी जिसमें जवान के बदले एक शख्स को छोड़ा जाना था। ये शख्स कोई और नहीं कुंजम सुक्का ही था।
सुरक्षाबलों ने मुठभेड़ के बाद कुंजम सुक्का को पकड़ लिया था। उधर सीआरपीएफ के राकेश्वर सिंह नक्सलियों के हाथों में पड़ गए थे। नक्सलियों ने इसकी जानकारी दी और कहा भी कि वे जवान की रिहाई के लिए बातचीत को तैयार हैं।
जवान की रिहाई के लिए केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से तो प्रयास चल ही रहे थे। कई स्थानीय लोग भी मध्यस्थता में लगे थे। मध्यस्तों के जरिए ही नक्सलियों ने ये मांग रखी कि अगर जवान की रिहाई चाहिए तो कुंजम सुक्का को सुरक्षित छोड़ना होगा।

जवान की रिहाई के पहले पहुंचा दिया गया था सुक्का
गुरुवार को जब मध्यस्थों और पत्रकारों की टीम जवान को सकुशल लेने के लिए जंगल के बीच में पहुंची तो कुंजम सुक्का को भी वहां ले जाया गया था। नक्सलियों ने कुंजम सुक्का को लेने के बाद ही जवान को रिहा किया था।
हालांकि बस्तर के बड़े अधिकारी जवान के बदले किसी डील से इनकार करते हैं। बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी ने हिंदू से बातचीत में बताया मुठभेड़ के बाद किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया गया था।
सुंदरराज आगे कहते हैं कि "मुठभेड़ के बाद शवों को तलाश करने और घायलों को हेलीकॉप्टर तक पहुंचाने में कई ग्रामीण स्वेच्छा से लगे हुए थे। इनमें से कुछ तरेम कैंप तक चले आए थे। ऐसा हो सकता है कि इनमें से ही कोई वापस लौटा हो।"
हालांकि जवान की रिहाई के लिए गए पत्रकारों ने वहां घटना का वीडियो भी बनाया लेकिन उन्हें भी कुंजम सुक्का के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। इसकी वजह भी नक्सली ही थे, उन्होंने पत्रकारों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी। नक्सलियों ने तो ये कहा कि वह जवान को बिना शर्त छोड़ रहे हैं लेकिन सच अलग था।

पत्रकारों को भी नहीं थी भनक
जब तक कुंजम सुक्का वहां पहुंचा तो उस समय पत्रकारों ने कैमरा ऑन नहीं करने दिया। जब नक्सलियों ने कुंजम सुक्का की रिहाई सुनिश्चित कर ली उसके बाद ही जवान राकेश्वर सिंह को वहां लाया गया और कैमरे के सामने उनकी रस्सियां खोली गईं। नक्सलियों ने कहा कि वह मानवता के नाते जवान को छोड़ रहे हैं।
नक्सली और अधिकारी दोनों ने इस डील के बारे में भले ही कुछ न कहा हो लेकिन ये बात सच है कि ऐसी डील पहले भी होती रही हैं। 2012 में उड़ीसा ने माओवादियों ने विधायक झीना हिकाका को बंधक बना लिया था जिनकी रिहाई के बदले में 5 माओवादियों को छोड़ा गया था।












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