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ISRO की अकल्पनीय यात्रा, चीन को दिखाई ताकत...NASA ने माना जिसका लोहा... बैलगाड़ी से मंगलयान तक का सफर

इसरो ने एसएलपी से पीएसएलवी तक और पीएसएलवी से जीएसएलवी तक का सफर कैसे तय किया...जानिए अद्भुत कहानी

नई दिल्ली, अगस्त 12: इसरो...यानि भारतीय स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन का ईओएस-03 मिशन कुछ तकनीकी दिक्कतों की वजह से फेल हो गया। जिसकी वजह से वैज्ञानिकों में निराशा है। वैज्ञानिकों का निराश होना स्वभाविक ही है, क्योंकि अपने मिशन की खातिर इसरो के ये महान वैज्ञानिक अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, ताकि दुनिया के मस्तक पर भारत मणि की तरफ चमके। ईओएस-03 मिशन के दौरान क्रायोजेनिक इंजन में कुछ तकनीकी खराबी आने की वजह से वैज्ञानिकों को सिग्नल मिलने बंद हो गए और मिशन फेल हो गया। जिसकी जानकारी इसरो के चीफ डॉक्टर के सिवन ने दी। लेकिन, इस नाकामी के बाद भी इसरो के साथ पूरा देश खड़ा है...क्योंकि इसरो ने जिस अद्भुत सफर को तय किया है, उसपर हर एक भारतवासी को गर्व है...फक्र है। इसरो ने एसएलपी से पीएसएलवी तक और पीएसएलवी से जीएसएलवी तक का सफर कैसे तय किया...इस महान और अद्भुत कहानी को जानना और हर एक भारतीय के साथ शेयर करना बेहद जरूरी है।

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    इसरो के 52 कामयाब साल

    इसरो के 52 कामयाब साल

    तीन दिनों के बाद भारत अपना 75वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है उस वक्त इसरो अपने 52 सालों का सफर पूरे कर रहा है। पांच दशक से ज्यादा की इस यात्रा में इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यानि इसरो ने एक नहीं, दर्जनों बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं और भारत की विकास यात्रा में अपनी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसरो ने जब अपना पहला प्रोजेक्ट सैटेलाइट टेलिकम्यूनिकेशन एक्सपेरिमेंट प्रोजेक्ट लॉन्च किया था, उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि इसरो उस अद्भुत विकास के यात्रा पर निकल रहा है, जो उसे विश्व के अंतरिक्ष कार्यक्रमों में अग्रणी पंक्ति में खड़ा कर देगा। इसको का पहला प्रोजेक्ट सैटेलाइट टेलिकम्यूनिकेशन एक्सपेरिमेंट ना सिर्फ कामयाब हुआ, बल्कि भारत में एक क्रांति लेकर आ गया। इसी सैटेलाइट की वजह से भारत में गांव गांव तक टीवी की पहुंच सुनिश्चित कर दी।

    एक लंबा और क्रांतिकारी सफर

    एक लंबा और क्रांतिकारी सफर

    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 15 अगस्त, 1969 को अपनी स्थापना के बाद से एक लंबा सफर तय किया है। सिर्फ 30-70 किलोग्राम पेलोड के छोटे रॉकेट लॉन्च करने से लेकर 4,000 किलोग्राम पेलोड को बाहरी अंतरिक्ष में ले जाने तक, इसरो के पास अंतरिक्ष उपलब्धियों को लेकर जश्न मनाने के लिए बहुत कुछ है। 1962 में डॉ विक्रम साराभाई द्वारा भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) के गठन के बाद भारत की अंतरिक्ष यात्रा शुरू हुई। उस समय, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ अंतरिक्ष प्रभुत्व का नेतृत्व कर रहे थे। 1969 में, INCOSPAR का नाम बदलकर ISRO (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) कर दिया गया। और आज जब हम इसरो की इस लंबी यात्रा पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि इसरो ने अकल्पनीय कामयाबियां हासिल की हैं।

    अकल्पनीय कामयाबियां, आर्यभट्ट की उड़ान

    अकल्पनीय कामयाबियां, आर्यभट्ट की उड़ान

    इसरो ने भारत का पहला उपग्रह आर्यभट्ट बनाया, जिसे सोवियत संघ की मदद से 19 अप्रैल, 1975 को लॉन्च किया था। ये अंतरिक्ष की दुनिया में भारत का पहला कदम था, जिसे उठाने में अजीज दोस्त रूस ने हमारी मदद की थी और फिर हमने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। और फिर 18 जुलाई 1980 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने पहला एसएसवी लॉन्च कर इतिहास रच दिया। रोहिणी वो पहला सैटेलाइट बन गया, जिसे भारत में बनाकर भारत से लॉन्च करते हुए अंतरिक्ष में भेजा गया था और पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया था।

    एसएलवी से एएसएलवी तक का सफर

    एसएलवी से एएसएलवी तक का सफर

    1980 में एसएलवी सैटेलाइट लॉन्च करने के बाद इसरो लगातार विकास की नई कहनियां लिखता चला गया और फिर आर्यभट्ट युग की शुरूआत हो गई। भारत के महान गणितत्र आर्यभट्ट के नाम पर इसरो ने अपने अंतरिक्ष यान का नाम रखा था। ये भारत का पहला प्रायोगिक सैटेलाइट था, जिसे सोवियत कॉसमॉस -3 एम रॉकेट द्वारा कपुस्टिन यार, वॉल्वोग्राड लॉन्च स्टेशन से 19 अप्रैल, 1975 को वर्तमान रूस में लॉन्च किया गया था। आर्यभट्ट ने एक्स-रे खगोल विज्ञान, एरोनॉमी और सौर भौतिकी का अध्ययन करने के लिए एक मिशन को अंजाम दिया। इसरो के मुताबिक, इसका मिशन जीवन और कक्षीय जीवन के लिए 17 सालों तक चला, क्योंकि इस सैटेलाइट ने 10 फरवरी 1992 को पृथ्वी की कक्षा में फिर से प्रवेश किया। प्रो सतीश धवन (1972-82) की अध्यक्षता में इसरो में उपग्रह का निर्माण करने वाली टीम का नेतृत्व नासा प्रशिक्षित वैज्ञानिक प्रोफेसर यू आर राव ने किया था।

    इसरो में अब्दुल कलाम युग

    इसरो में अब्दुल कलाम युग

    भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, जो एसएलवी-3 के प्रोजेक्ट लीडर थे...और जब अगस्त 1979 में इसरो की पहली प्रायोगिक उड़ान विफल होने के बाद जब पूरी टीम निराश हो गई थी, तब उन्होंने एक लीडर की तरह टीम को संभाला। डॉ. कलाम ने प्रो सतीश धवन को उस वक्त संभाला जब पूरी टीम को उनकी जरूरत थी। और ठीक साल जब इसरो का मिशन कामयाब हो गया तो डॉ. सतीश धवन ने प्रोजेक्ट की कामयाबी का पूरा श्रेय डॉ. कलाम को दिया था। इसरो ने 20 मई 1992 को एसएलवी से एएसएलवी की तरफ कदम बढ़ाया।

    22 अक्टूबर 2008 को रचा इतिहास

    22 अक्टूबर 2008 को रचा इतिहास

    22 अक्टूबर 2008 को जब इसरो ने मानव रहित चंद्र ऑर्बिटर, चंद्रयान -1 को कक्षा में भेजकर इतिहास बना दिया था। चंद्रमा से सिर्फ 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद चंद्रयान-1 चंद्रमा के रासायनिक, खनिज और भूगर्भ विज्ञान को लेकर कई ऐसे रिसर्च की खोज की, जिसका मानव इतिहास को काफी फायदा हुआ। इस अंतरिक्ष यान में भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन और बुल्गारिया में निर्मित 11 वैज्ञानिक उपकरण थे। सभी प्रमुख मिशन उद्देश्यों के सफल समापन के बाद, मई 2009 के दौरान कक्षा को 200 किमी तक बढ़ा दिया गया है। और 29 अगस्त 2009 को इसरो ने चंद्रयान-1 मिशन को समाप्त कर दिया।

    इसरो का पीएसएसली युग

    इसरो का पीएसएसली युग

    इसरो ने अंतरिक्ष इतिहास में नया कदम उठाते हुए अपने 100वें अंतरिक्ष मिशन PSLV-C21 रॉकेट का उपयोग करके सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। इसने दो विदेशी उपग्रहों को भी पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया। वहीं, इसरो ने 5 नवंबर 2013 को मार्स ऑर्बिटर मिशन लॉन्च किया और 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में प्रवेश किया, जिससे भारत मंगल पर अपने पहले प्रयास में सफल होने वाला पहला देश बन गया। इसरो दुनिया की चौथी अंतरिक्ष एजेंसी होने के साथ-साथ एशिया की पहली अंतरिक्ष एजेंसी बन गई है, जो मंगल की कक्षा में पहुंची है।

    15 फरवरी 2017...ऐतिहासिक दिन

    15 फरवरी 2017...ऐतिहासिक दिन

    15 फरवरी 2017 को इसरो ने एक PSLV-C37 रॉकेट के द्वारा अंतरिक्ष में एक साथ 104 सैटेलाइट को लॉन्च कर एक विश्व रिकॉर्ड बनाया। वहीं, इसरो ने 5 जून 2017 को अपना सबसे भारी रॉकेट, जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल-मार्क III (GSLV-Mk III) लॉन्च किया और एक संचार उपग्रह GSAT-19 को कक्षा में स्थापित किया। वहीं 14 नवंबर 2018 को इसरो ने श्रीहरिकोटा से जीसैट-29 उपग्रह का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया, जो 3,423 किलोग्राम वजन वाले सबसे भारी उपग्रह था और इसका लक्ष्य देश के दूरदराज के क्षेत्रों के लिए बेहतर संचार प्रदान करना है।

    इसरो का मिशन जीएसएलवी फेल

    इसरो का मिशन जीएसएलवी फेल

    एसएलवी से सफर की शुरआत करने वाले इसरो ने जीएसएलवी की विशालकाय यात्रा की तरफ कदम बढ़ा दिया है। हालांकि, आज इसरो का ईओएस-3 मिशन कामयाब नहीं हो पाया और क्रायोजेनिक इंजन्स के फेल हो जाने की वजह से इसरो का ये मिशन अधूरा रह गया है, लेकिन इसरो और भारत सरकार ने कहा है कि इसरो अपना ये मिशन पूरा करके रहेगा। इसरो का ये अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट था, जिसका मकसद देश की सीमा पर दुश्मनों पर नजर रखना था। इस सैटेलाइट को भारत का 'आई इन द स्काई' भी कहा जा रहा था, जो पहली बार में कामयाब नहीं हो पाया। लेकिन, हम जानते हैं कि भारत अपने इस मिशन को भी आज नहीं तो कल कामयाब करके रहेगा और आसमान में भारत की कामयाबी का परचम लहरा कर रहेगा।

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