गोरक्षा आंदोलन का सॉफ्ट चेहरा नहीं रहा
नई दिल्ली। देश में गोरक्षा आंदोलन से 1966 से सक्रिय रूप से जुड़े हुए ईश्वर प्रकाश गुप्त चल बसे। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर अशोक सिंघल के परम मित्र गुप्त हमेशा नेपथ्य में रहकर काम करनेवालों में थे। उनकी हाल में मृत्यु हो गई।

ईश्वर प्रकाश गुप्ता ने 1966 में दिल्ली में हुए गोरक्षा आंदोलन में भाग लिया था। वे जीवनभर गो रक्षा आंदोलन से जुड़े रहे। वे पिछले 50 से भी ज्यादा बरसों से गोरक्षा अभियान से जुड़े हुए थे।
84 वर्षीय ईश्वर प्रकाश गुप्ता, के निधन से देश में गोरक्षा आंदोलन को अपूर्णीय क्षति हुई है। उनका बीते दिनों राजधानी में निधन हो गया।
अंतिम दिनों तक रहे समर्पित
गोरक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध गुप्ता अपने जीवन के अंतिम दिनों तक अपने ध्येय के प्रति समर्पित रहे। मगर इस बात पर भी जोर देते रहे कि गोरक्षा की आड़ में असामाजिक तत्वों को अराजकता फैलाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
गुप्ता का मानना था कि गोरक्षा के विषय पर एक राष्ट्रीय सहमति बननी चाहिए। वे नेपथ्य में रहकर काम करना पसंद करते थे।
अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर अशोक सिंघल जैसे दिग्गज नेताओं के साथ दशकों गुजारने पर भी उन्होंने कभी कोई पद की इच्छा नहीं जताई।
अग्रिम पंक्ति के नेता थे
हरियाणा के शहर नरवाना में जन्मे श्री ईश्वर प्रकाश गुप्ता, 1966 के गोरक्षा अभियान के अग्रिम पंक्ति के नेता थे, जिन्होंने देश भर में गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग की।
शंकराचार्य, अन्य संतों एवं हजारों गोरक्षकों के साथ मिलकर गोरक्षा के लिए अनशन किया और अपनी बात को सरकार तक पहुँचाने केलिए 7 नवम्बर 1966 को दिल्ली में संसद भवन पर एक विशाल धरना-प्रदर्शन का भीआयोजन किया।
गोरक्षा और गायों के प्रति उनके समर्पण का प्रत्यक्ष उदाहरण है दिल्ली में बवाना स्थित 'गोपालगोसदन'जहाँ 4500 से भी ज्यादा गायों का हर प्रकार से ख्याल रखा जाता है।
प्रारंभ से ही गोपाल गो सदन से जुड़े श्रीगुप्ता, गायों की देख-रेख के हर पहलू पर पूरा ध्यान देते थेजैसे, पौष्टिक भोजन, स्वास्थ्य, उपचार आदि।
नियमित जाते थे गोसदन
वीएचपी के अशोक सिंघल के साथ वे नियमित रूप से गोसदन जाते थे और गायों की सेवा में अपना समय बिताते थे। यह स्थान उनके लिए दूसरे घर के समान था।
शुरू के दिनों में इसे चलाने के लिए मित्रों एवं सगे-संबंधियों से पैसे भी इकट्ठा किया करते थे।
गोरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीयता के भी पुरजोर समर्थक थे श्रीगुप्ता। युवावस्था से ही वे आरएसएस से जुड़ गए थे और आखिरी दिनों तक उसकी विचारधारा के प्रति समर्पित रहे।
इस विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए वे देश के हर कोने तक गए और आरएसएस के मुखपत्र पान्चजन्य एवं ऑर्गनाइजर के पूर्णकालिक सदस्यों के रूप में बड़ी संख्या में लोगों को जोड़ा।
और तब आए इनके संपर्क में
इसी दौरान वे आरएसएस के वरिष्ठ नेताओं जैसे दत्तोपंत ठेंगड़ी, गुरू गोलवलकर जी, एवं रज्जूभैया के सम्पर्क में आए।
1975 केआपातकाल के दौरान, बतौर आरएसएस प्रचारक, उन्हें पुलिस की ज्यादतियों को भी सहना पड़ा।
गुप्त 1985 के दौरान सेवा भारती नामक संस्था से जुड़े। उन्होंने दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में समाज के वंचित वर्ग के लिए डिस्पेंसरी और कम्पयूटर सेंटर भी खोले।
इसी कड़ी में उन्होंने 1990 में केशव धर्मार्थ हॉस्पिटल को भी स्थापना की जिसका उद्घाटन आरएसएस के दिनों से उनके मित्र पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया।
खर्चीली शादियों के थे मुखर विरोधी
श्री गुप्ता सामाजिक बुराइयों जैसे खर्चीली शादियाँ एवं जातिवाद के मुखर विरोधी भी थे और मानते थे कि जातिवाद ने हिन्दू धर्म को बहुत नुक्सान पहुँचाया है।इससे अपने जीवन से निकाल फेंकना ही हमारे लिए उचित होगा।
सामाजिक चेतना और जागरुकता के लिए उन्होंने 1992 में राजधानी केपीतम पुरा टीवी टावर के निकट एक अनोखी रामलीला की शुरुआत की जिसका नाम राम-लखन रामलीला रखा।
श्री गुप्ता ने यह सुनिश्चित किया कि उनकी रामलीला हमेशा कुछ अलग पेश करे। कलाकारों के डायलॉग पर भी वे कड़ी नज़र रखते थे। एक सामान्य ज्ञान परीक्षा काभी रामलीला के दौरानआयोजनहोनेलगाजिससे राम-लखन रामलीला लोगों में बहुत चर्चित हो गयी।
कहा जाता है कि किसी के बगैर कोई काम नहीं रुकता है मगर श्री गुप्ता की कमी आरएसएस और गौरक्षा अभियान को हमेशा महसूस होगी।
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