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क्या शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा में वापसी की कर रहे हैं तैयारी?

नई दिल्ली। दिल दिया, दर्द लिया। अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने कांग्रेस से दिल तो लगा लिया लेकिन भाजपा की सुनहरी यादें उनका पीछा नहीं छोड़ रहीं। वे कांग्रेस में हैं लेकिन दिल के किसी कोने में आज भी भाजपा रची-बसी बैठी है। सुषमा स्वराज के बहाने उन्होंने खुल कर अपने जज्बात जाहिर किये हैं। पिछले साल सुषमा स्वराज ने गजब की प्रतिबद्धता दिखाते हुए उन्हें भाजपा नहीं छोड़ने की सलाह दी थी। उन्होंने भाजपा प्रेम बिल्कुल नहीं छिपाया और कहा कि उनकी राजनीतिक परवरिश भाजपा में हुई है। वहीं राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा भी हुई है। भाजपा में जो सिखाया गया उसी के अनुरूप आज भी कश्मीर पर मेरी सोच वही है। इतना ही नहीं शत्रुघ्न सिन्हा ने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के साथ विवाद पर भी मिट्टी डालने की कोशिश की है। वे बार-बार इन दोनों नेताओं की तारीफ कर रहे हैं। तो क्या शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस में असहज महसूस कर रहे है ? आखिर क्यों उनका पुराना प्रेम फिर उमड़ रहा है ? क्या वे फिर भाजपा में आना चाहते हैं ? एक सवाल यह भी कि जिस नेता के दिल में भाजपा की जड़ें इतनी गहरी हों, क्या कांग्रेस उसे दिल्ली का अध्यक्ष बना सकती है ?

क्या शत्रुघ्न सिन्हा का मन बदल रहा है ?

क्या शत्रुघ्न सिन्हा का मन बदल रहा है ?

पिछले एक हफ्ते से शत्रुघ्न सिन्हा जो बयान रहे हैं उससे लग रहा है कि उनका मन बदल रहा है। वे भाजपा में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर तंज कसने के लिए अक्सर एक जुमला इस्तेमाल करते थे- वन मैन शो एंड टू मैन आर्मी। अब वही अमित शाह को डायनामाइट और नरेन्द्र मोदी को साहसिक फैसला लेने वाला पीएम बता रहे हैं। कांग्रेस का सिपाही बनने के बाद भी शत्रुघ्न सिन्हा को (जनसंघ) के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों को पूरा करने की चिंता बनी हुई है। जब वे सुषमा स्वराज को याद कर रहे थे तब उन्होंने बताया कि उनकी भाजपा में तो अच्छी निभ रही थी लेकिन दो-तीन लोगों की वजह से मुझे बाहर निकलना पड़ा। उनका इशारा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की तरफ ही था। लेकिन अब वे इस विवाद को भुलाना चाहते हैं। शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा, एक घर में अगर दो चार बर्तन पड़े होते हैं तो आपस में ठनठनाते रहते हैं। ऐसा अमूमन हर घर में होता है। यानी वे मोदी-शाह से अपने झगड़े को स्वभाविक बता कर उसकी कटुता कम करना चाहते हैं।

पार्टी लाइन से अलग चल रहे बिहारी बाबू

पार्टी लाइन से अलग चल रहे बिहारी बाबू

शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस की पार्टी लाइन से अलग रुख अख्तियार किये हुए हैं। जब तीन तलाक बिल संसद से पास हुआ था तब भी उन्होंने मोदी सरकार की तारीफ की थी। कांग्रेस ने दोनों सदनों में तीन तलाक बिल का विरोध किया था। लेकिन इसके उलट शत्रुघ्न सिन्हा ने इसका समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की दिशा में हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह सराहनीय कदम है। इस बिल को उन्होंने मिल का पत्थर बताया। शत्रुघ्न सिन्हा के इस रवैये से कांग्रेस के नेता कश्मकश में फंस गये हैं। अगर शत्रुघ्न सिन्हा सेलिब्रेटी स्टेटस वाले नेता नहीं होते तो उन्हें कब का पार्टी विरोधी गतिविधिय़ों का दोषी ठहरा दिया गया होता। लेकिन थकी हारी कांग्रेस उन्हें कुछ बोल नहीं पा रही है।

कांग्रेस को शत्रुघ्न की मनमानी भी मंजूर !

कांग्रेस को शत्रुघ्न की मनमानी भी मंजूर !

शत्रुघ्न सिन्हा बेधड़क बोलने वाले नेता हैं। उन्हें मालूम है कि राजनीतिक दल उनके स्टारडम की वजह से उनको तवज्जो देते हैं। कांग्रेस ने भी इसी खूबी को देख कर उनको पार्टी में शामिल किया था। वे किसी दल में रहें, करते वहीं हैं जो दिल कहता है। कांग्रेस में रहते हुए भी उन्होंने लोकसभा चुनाव के समय लखनऊ में अपनी पत्नी और सपा उम्मीदवार पूनम सिन्हा का प्रचार किया था। उस समय भी खूब हो-हल्ला हुआ था। उन पर पार्टी विरोधी कार्रवाई की मांग की गयी थी। लेकिन सब टांय-टांय फिस्स हो गया। अब तक तीन मौकों पर वे मोदी सरकार की तारीफ कर चुके हैं। इन सब के बावजूद इस बात की चर्चा चल रही है कि शत्रुघ्न सिन्हा को दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जा सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के निधन के बाद यह पद खाली पड़ा है। भोजपुरी फिल्म एक्टर और दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी की काट में कांग्रेस को कोई तगड़ा नेता नहीं मिल रहा है। कांग्रेस की निगाहें बिहारी बाबू पर लगी हुई हैं। लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि भाजपा प्रेम में वशीभूत शत्रुघ्न सिन्हा किस हद तक कांग्रेस की डगमगाती नैया पार लगा सकेंगे ?


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