क्या BJP से अकेले लड़ने के जोश में ममता बनर्जी विपक्ष को कमजोर कर रही हैं ?
नई दिल्ली, 29 नवंबर: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार धमाकेदार जीत के बाद ममता बनर्जी जब दिल्ली आई थीं तो लगा था कि भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्ष को एक बहुत बड़ी ताकत हाथ लग गई है। क्योंकि, बंगाल में टीएमसी ने जिस चुनावी लड़ाई में बीजेपी को मात दी, उसकी उम्मीद पीएम मोदी के कट्टर विरोधियों ने भी नहीं की होगी। तृणमूल सुप्रीमो आईं, सोनिया से भी मिलीं और संदेश यही गया कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को असल चुनौती मिलने वाली है। लेकिन, उसके बाद से तृणमूल की राजनीति की धारा ही बदल चुकी है। वह किसी भी सूरत में कांग्रेस, खासकर राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। सवाल है कि क्या ममता गैर-कांग्रेसी विपक्ष को लीड करके 2024 में मोदी को टक्कर देने लायक बन चुकी हैं ?

भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता में दरार
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान पहले ही दिन सोमवार को महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस सांसदों के अलग-अलग प्रदर्शनों की ये दोनों तस्वीरें बहुत कुछ बयां कर रही हैं। दोनों के विरोध का मसला एक है, लेकिन इसमें एक बहुत बड़ा गड़बड़झाला भी है। तृणमूल के सांसद कृषि कानूनों के वापस लेने के मोदी सरकार के फैसले पर संसद में बहस की मांग कर रहे हैं। लेकिन, सोनिया और राहुल के नेतृत्व में जुटे कांग्रेसी सांसद अभी भी कृषि कानून वापस लेने का ही रट लगाए हैं! जबकि, इसकी घोषणा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर चुके हैं। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस से हाथों से जाने देने को तैयार नहीं हैं और तृणमूल कांग्रेस किसी भी कीमत पर ममता बनर्जी के रहते हुए राहुल गांधी को बिग ब्रदर के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं है। दरअसल, भाजपा से मुकाबले के लिए टीएमसी ना केवल कांग्रेस को 'अक्षम और अयोग्य' मानती है, बल्कि अमेठी में हार के बाद से ही राहुल गांधी को विपक्ष का चेहरा कबूल करने के लिए तैयार नहीं है।

टीएमसी को कांग्रेस का नेतृत्व कबूल नहीं
टीएमसी की लाइन तय है। वह कांग्रेस के हाथों में अब विपक्ष का नेतृत्व सौंपने को तैयार नहीं है। पार्टी यह जरूर चाहती है कि कांग्रेस भाजपा-विरोधी विपक्ष का हिस्सा रहे, लेकिन वह इसका चेहरा सिर्फ और सिर्फ ममता बनर्जी को बनाना चाहती है। यही वजह है कि कांग्रेस नेता और राज्यसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से बुलाई गई बैठक में जाने से टीएमसी ने साफ इनकार कर दिया। पार्टी के एक सांसद ने कहा है कि, 'शिवसेना, झारखंड मुक्ति मोर्चा, डीएमके, लेफ्ट पार्टी, एनसीपी और राजद या और की तरह हम कहीं भी कांग्रेस के सहयोगी नहीं हैं और हम किसी भी तरह से कांग्रेस पार्टी की लाइन पर चलने के लिए बाध्य नहीं हैं।'

क्या कांग्रेस ममता का नेतृत्व स्वीकार करेगी ?
जानकारी के मुताबिक सलमान खुर्शीद जैसे कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं के दावों से भी टीएमसी खुश नहीं है कि पार्टी अभी भी अपने दम पर भाजपा के साथ सीधे मुकाबले में अगले लोकसभा चुनावों में 120 से 130 सीटें जीतने का माद्दा रखती है। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के विस्तार के लिए कांग्रेस नेताओं को शामिल करने में तृणमूल कांग्रेस को जरा भी गुरेज नहीं हो रहा है, चाहे इससे कांग्रेस कितनी ही कमजोर क्यों ना हो रही हो। तृणमूल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा को अभी भी लगता है कि विपक्ष की एकता बने रहने की संभावना है, लेकिन उनकी भी दलील है कि कांग्रेस कमजोर हो चुकी है। वो कह चुके हैं, 'यह सच्चाई है कि लोग अब टीएमसी की ओर देख रहे हैं और कांग्रेस पिछले कुछ वर्षों में काफी कमजोर हुई है, फिर भी अभी भी अगले आम चुनाव में 2.5 साल हैं और चीजें बदल सकती हैं।' लेकिन, सोनिया की अगुवाई वाली कांग्रेस एक परिवार के हितों को किनारे रखकर ममता को विपक्ष का नेता मानने को तैयार होगी ? इसकी संभावना तो दूर-दूर तक नहीं है।

क्या ममता बनर्जी विपक्ष को कमजोर कर रही हैं ?
असल में कांग्रेस ना सिर्फ अपनी पार्टी का नेतृत्व राहुल गांधी को सौंपना चाहती है, बल्कि वह उन्हें विपक्षी खेमे का भी स्वाभाविक लीडर मानती है। मतभेद की जड़ यहीं पर है। इसीलिए ममता खुद को पैन-इंडिया नेता बनाने की मुहिम चला रही हैं, लेकिन उससे सबसे ज्यादा कांग्रेस पर ही असर पड़ रहा है। जहां तक इससे ममता के मजबूत होने का सवाल है तो यह बहस का पूरी तरह से अलग टॉपिक है। मसलन, एक राजनीतिक विश्लेषक बीस्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, 'नेतृत्व के लिए टीएमसी और कांग्रेस जितना लड़ेगी, बीजेपी के लिए उतना ही अच्छा है। अगर कांग्रेस को किनारे कर दिया गया तो यह विपक्षी मोर्चे के लिए लगभग यह असंभव है कि वह लोकसभा में जादुई आंकड़े तक पहुंच जाए।'












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