क्या नीतीश कुमार को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने की तैयारी है ?
नीतीश कुमार को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने की तैयारी ?
नई दिल्ली, 22 फरवरी। राजनीतिक रिश्ते मतलब के लिए बनते-बिगड़ते हैं। प्रशांत किशोर ने दो साल पहले नीतीश कुमार को झूठा और पिछलग्गू कहा था। लेकिन अब उन्होंने नीतीश कुमार की किस्मत को 'बुलंदी’ पर पहुंचाने का जिम्मा उठाया है। दिल्ली में नीतीश से मुलाकात के बाद प्रशांत किशोर की राजनीतिक सक्रियता बढ़ गयी है। चर्चा है कि वे एक बड़े मिशन पर काम कर रहे हैं। नीतीश कुमार को राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष का साझा उम्मीदवार बनाने की तैयारी चल रही है। अगर सब कुछ योजना के अनुरूप हुआ तो नीतीश कुमार जल्द ही भाजपा से गठबंधन तोड़कर विपक्ष के सर्वमान्य नेता बन सकते हैं।
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प्रशांत किशोर की सक्रियता बढ़ी
प्रशांत किशोर ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से बातचीत कर इस मुहिम को आगे बढ़ाया है। विपक्ष के अन्य नेताओं से भी उनकी मुलाकात होनी है। मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोबिंद का कार्यकाल जुलाई 2022 में पूरा हो रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद अगर भाजपा की सरकार नहीं बनती है तब यह मुहिम और तेजी से परवान चढ़ सकती है। राष्ट्रपति चुनाव में सांसदों के अलावा निर्वाचित विधायक भी वोट डालते हैं। किसी राज्य के एक विधायक के वोट की कीमत उसकी जनसंख्या से निर्धारित होती है। राष्ट्रपति चुनाव में उत्तर प्रदेश के एक विधायक के वोट की कीमत 2012 में 208 थी। अब इस मत का मूल्य और बढ़ गया होगा। गैरभाजपा खेमे के विधायकों की संख्या जितनी अधिक होगी, विपक्ष के उम्मीदवार की स्थिति उतनी मजबूत होगी। नीतीश कुमार को सर्वोच्च पद पर बैठाने का अभियान, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के फैसले पर भी निर्भर है। यह चुनाव परिणाम देश की राजनीति को एक नयी दिशा दे सकता है।

क्या नीतीश कुमार बड़े पद के साथ विदाई चाहते हैं ?
नीतीश कुमार से जब भी उनके प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के बारे में पूछा गया, हमेशा उन्होंने इंकार किया है। लेकिन जदयू के कई बड़े नेता उन्हें पीएम मटेरियल बताते रहे हैं। प्रशांत किशोर 2019 में जब नीतीश कुमार के सबसे करीबी थे तब उन्होंने खुद इसके लिए रणनीति बनायी थी। लोकसभा चुनाव के पहले फरवरी 2019 में प्रशांत किशोर ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मुलाकात की थी। वे ये जानना चाहते थे कि अगर नरेन्द्र मोदी को बहुमत नहीं मिला तो क्या विपक्ष नीतीश कुमार को सर्वमान्य नेता मान सकता है ? उसी समय जदयू के एक नेता ने बयान दिया था कि नीतीश जी, पीएम पद के लिए योग्य नेताओं में से एक हैं। लेकिन चुनाव में नरेन्द्र मोदी और बड़ी जीत के साथ सत्ता में लौटे जिससे प्रशांत किशोर के मंसूबे पर पानी फिर गया। पटना के राजनीतिक गलियारे अक्सर एक बात की चर्चा होती है। नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार के मुख्यमंत्री हैं। अब उनकी ख्वाहिश है कि किसी बड़े पद पर आसीन हो कर अपने राजनीतिक जीवन से सम्मानजनक विदाई लें। प्रधानमंत्री पद के के भावी उम्मीदवार बनने की उनकी मुहिम अलग अलग कारणों से दम तोड़ गयी। लेकिन राष्ट्रपति पद के चुनाव को एक मौके की तरह भुनाने की कोशिश हो रही है। चार-पांच महीने बाद चुनाव होना है।

प्रशांत किशोर क्यों आये नीतीश कुमार के पास ?
महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने राजनीति के बारे में लिखा है, हमारे देश में सबसे आसान काम आदर्शवाद बघारना और फिर उपयोगितवादी की तरह व्यवहार करना। प्रशांत किशोर राजनीति में आदर्शवाद की वकालत करते रहे हैं। निष्ठा और विश्वसनीयता पर बड़े-बड़े बयान देते रहे हैं। लेकिन उनका भी रंग मौसम की तरह बदलते रहा है। कुछ दिन पहले तक वे ममता बनर्जी को विपक्षी राजनीति का केन्द्रबिन्दु बना रहे थे। वे मुहिम चला रहे थे कि गैरभाजपा राजनीति में जो जगह कांग्रेस की है, वह स्थान ममता बन्रजी को मिल जाए। लेकिन अब अचानक उनकी ममता बनर्जी से अनबन हो गयी है। पश्चिम बंगाल निगर निगम के चुनाव के समय तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों के चयन में प्रशांत किशोर के दखल का आरोप लगा था। दो सूची जारी होने से तृणमूल की किरकिरी हुई थी। इसके बाद तृणमूल के वरिष्ठ नेताओं ने प्रशांत किशोर पर सीधा हमला बोल दिया था। श्रीरामपुर के सांसद कल्याण बनर्जी ने बिना किसी का नाम लिये कहा था, "दलाली के लिए बहुत लोग हैं। असली काम के समय दिखायी नहीं देते।" प्रशांत किशोर नीतीश कुमार से भी एक बार झगड़ चुके हैं। भाजपा से उनकी पुरानी खुन्नस है। प्रशांत किशोर एक सफल चुनावी रणनीतिकार हैं। लेकिन उन पर एकाधिकारवादी होने का भी आरोप लगता रहा है। जब वे जदयू में नम्बर दो के ओहदे पर थे तब कई वरिष्ठ नेताओं के साथ उनकी नहीं बनती थी। प्रशांत किशोर के उलट जदयू के कुछ नेता इस बात के हिमायती हैं कि अगर नीतीश कुमार को राष्ट्रपति पद के लिए प्रोजेक्ट करना है तो यह काम भाजपा को विश्वास में लेकर किया जाना चाहिए। इससे मंजिल पर पहुंचने का रास्ता आसान हो जाएगा। फिलहाल सारी गतिविधियां अभी पर्दे की ओट में हैं।












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