'लाला हमारे पास चप्पल नहीं हैं, पांव जल रहे...', IPS सिकेरा ने शेयर की थाने पहुंची बूढ़ी मां की कहानी
आज करीब दोपहर 2 बजे मैं थाने में बैठा था, तभी मैंने देखा कि थाने के सामने से एक वृद्ध मां आ रही थी...
लखनऊ, 4 अप्रैल: आईपीएस अधिकारी नवनीत सिकेरा अक्सर अपनी फेसबुक पोस्ट के जरिए पुलिस के उन जवानों की कहानियां शेयर करते रहते हैं, जो ड्यूटी के साथ-साथ बीच इंसानियत निभाने से पीछे नहीं हटते। फिर चाहे वो गंगनहर में अपनी जान की बाजी लगाकर मुस्लिम बच्चे को बचाने वाले उत्तराखंड पुलिस के जवान कुम्पाल सिंह तोमर हों, या फिर कोरोना महामारी के बीच रात के 10 बजे चौराहे पर गप्पे लड़ा रहे पुलिसवालों की ही क्लास लगाने वालीं महिला सिपाही प्रीति सरोज हों। अब नवनीत सिकेरा ने ऐसी ही एक और घटना शेयर की है, जिसमें भरी दोपहर और गर्मी में थाने पहुंची एक बूढ़ी मां के चेहरे पर यूपी पुलिस के एक जवान ने मुस्कान खिला दी।

क्या था पूरा मामला
नवनीत सिकेरा ने अपनी फेसबुक वॉल पर यूपी पुलिस के जिस जवान नीरज कुमार यादव का जिक्र किया है, आगे की कहानी उन्हीं के शब्दों में सुनिए- 'आज करीब दोपहर 2 बजे मैं थाने में बैठा था, तभी मैंने देखा कि थाने के सामने से एक बूढ़ी मां आ रही थी, जिनकी उम्र लगभग 100 वर्ष से ज्यादा थी। वो थाने में आईं, तो मैं उनके पास गया। वो कुछ बताना चाहती थीं, मैंने सबसे पहले उन्हें अपने पास ले जाकर बैठाया और फिर उन्हें पानी पिलायाl'

'लाला 5 रुपए के अंगूर मंगा दो बस'
अपनी पोस्ट में नीरज यादव ने आगे लिखा, 'पानी पीने के बाद मैंने उनसे पूछा- हां दादी, अब बताओ, तो वे बोलीं- लाला हमारे पास चप्पल नहीं हैं, मेरे पांव जल रहे हैं। हमें एक जोड़ी चप्पल दिला दो। मैंने कहा- ठीक है दादी, अभी दिला देता हूं और मैंने तुरंत चप्पल मंगाकर उन्हें पहनाईं। मैंने फिर उनसे पूछा कि कुछ खा लीजिए तो उन्होंने मना किया और कहा कि नहीं लाला कुछ नही खाना हैं। मेरे कई बार कहने पर उन्होंने धीरे से मेरे कान मे कहा- लाला 5 रुपए के अंगूर मंगा दो बस। मैंने एक किलो अंगूर मंगाए और उन्हें दिए। वो अंगूर खाते हुए मुझसे बोलीं- लाला तुम भी खा लो, फिर मैं भी उनके साथ अंगूर खाने लगा।'
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दादी जानती हो, इलाहाबाद कहां है
नीरज यादव ने आगे की कहानी बताते हुए लिखा, 'अम्मा ने फिर मुझसे मेरा नाम पूछा, बोलीं- लाला का नाम बा...? मैंने अपना नाम बताया तो फिर पूछा- कहां से हो, मैंने बताया इलाहाबाद से हूं। दादी जानती हो, इलाहाबाद कहां है तो बोलीं- हां मेला लगता है ना वहां। मैंने कहा हां, गई हो आप कभी तो बोलीं- नहीं लाला गए नहीं हैं। मैंने पूछा- चलोगी मेरे साथ तो हंसने लगीं। फिर मैंने पूछा- दादी आप आई कहां से हो, तो उन्होंने अपने गांव का नाम बताया, जो मेरे थाने से लगभग 7 किमी दूर है।'
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'मेरे पास पैसे ही नहीं थे, तो किराया नहीं दिया'
फिर मैंने पूछा- 'वहां से आप आईं कैसे, तो उन्होंने बताया कि गाड़ी से और मैंने उन्हें किराया भी नही दिया। मैंने पूछा कि क्यों, तो हंसते हुए बोलीं- मेरे पास पैसे ही नहीं थे। मैंने पूछा- गाड़ी वाला कुछ बोला नहीं, तो बोलीं- कुछ नही बोला। मैं उस गाड़ी वाले का, उसकी मानवता के लिए शुक्रिया अदा करता हूं। अभी भी बहुत अच्छे लोग हैं। फिर दादी को हमारे एक दीवान जी ने गाड़ी में बिठाया और ड्राइवर से कहा कि दादी जहां बोलें, उन्हें उतार देना। आज दिल खुश हो गया, ऐसे लोग आएं तो उनकी मदद जरूर करनी चाहिए। जय हिंद।'












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