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इंदौर में NOTA के पक्ष में पड़े ज्यादातर वोट तो कौन जीतेगा? पूर्व CEC ने वोटिंग से पहले दे दिए बड़े संकेत

Madhya Pradesh Lok Sabha Election: इंदौर लोकसभा सीट का चुनाव अभी पूरे देश में सुर्खियों में है। यहां कांग्रेस की ओर से नोटा (NOTA) का बटन दबाए जाने की अपील की वजह से मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है। ऐसे में देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ओपी रावत ने नोटा के बारे में बड़ी जानकारी दी है।

ओपी रावत ने नोटा का बटन दबाने को लेकर जो कुछ कहा है, उससे इंदौर लोकसभा सीट के चुनावों को लेकर बहुत बड़ा संकेत मिलता है। उन्होंने कहा है कि नोटा का एक 'प्रतीकात्मक' प्रभाव है और अगर इसके पक्ष में किसी सीट पर 50% से ज्यादा वोट पड़े, तभी चुनाव परिणामों में इसे कानूनी तौर पर प्रभावी बनाए जा सकने के बारे में सोचा जा सकता है।

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उम्मीदवार को मिले 1 भी वोट तो जीत उसकी-पूर्व सीईसी
रावत मध्य प्रदेश कैडर के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं और उन्होंने न्यूज एजेंसी पीटीआई से रविवार को नोटा के चुनाव परिणामों पर पड़ने वाले असर को लेकर जो कुछ कहा है, उससे कांग्रेस के मंसूबे को वहां दूसरी बार झटका लग सकता है। उन्होंने कहा है, अगर 100 वोटों में से 99 नोटा (NOTA-इनमें में से कोई भी नहीं) को मिलता है और एक प्रत्याशी को 1 ही वोट मिलता है तो भी वही जीतेगा या जीतेगी।

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इंदौर में कांग्रेस का प्रत्याशी ही मैदान से हट गया
मध्य प्रदेश में इंदौर लोकसभा सीट पर इससे पहले कांग्रेस को तब बड़ा झटका लगा जब 29 अप्रैल को उसके प्रत्याशी अक्षय कांति बम ने नामांकन वापस लेकर उसपर बहुत बड़ा बम पटक दिया था। क्योंकि, वह पर्चा वापस लेने का आखिरी दिन था। बाद में वे बीजेपी में शामिल हो गए थे।

कांग्रेस के 'नोटा अभियान' को लग सकता है झटका!
इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने 13 मई को होने वाले मतदान में 'भगवा पार्टी को सबक सिखाने' के लिए ईवीएम पर नोटा विकल्प का बटन दबाने की अपील की। इंदौर में इसे एक अभियान की तरह चलाया गया है। 72 साल में ऐसा पहली बार हुआ है, जब कांग्रेस पार्टी चुनाव से पहले ही इंदौर की चुनावी रेस से बाहर हो चुकी है।

2019 में इंदौर में नोटा को मिले थे कितने वोट?
2019 के लोकसभा चुनाव में इंदौर में बीजेपी के उम्मीदवार शंकर लालवानी को 10,68,569 और कांग्रेस प्रत्याशी पंकज संघवी को 5,20,815 वोट मिले थे। वहीं 5,045 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था।

नोटा किसी सीट के परिणाम पर अभी असर नहीं डाल सकता- ओपी रावत
पूर्व सीईसी रावत के मुताबिक, 'मौजूदा स्थिति में नोटा का सिर्फ प्रतीकात्मक महत्त्व है और यह किसी भी सीट के चुनाव परिणाम पर कोई असर नहीं डाल सकता है।' उन्होंने कहा, 'एक चुनाव में अगर 100 में से 99 वोट नोटा को जाता है और एक प्रत्याशी को सिर्फ 1 ही वोट मिलता है, तब भी वह उम्मीदवार विजेता घोषित होगा, न कि नोटा।'

नोटा को प्रभावी बनाने के लिए क्या करना होगा?
उनका कहना है, 'राजनीतिक समुदाय को ये दिखाने के लिए कि वे क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले या अन्य अयोग्य उम्मीदवारों को अपने वोट के योग्य नहीं मानते हैं, 50% से ज्यादा वोटरों को एक बार एक सीट पर नोटा का विकल्प चुनना होगा। इसके बाद ही संसद और चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ेगा और उन्हें चुनाव परिणामों पर नोटा को प्रभावी बनाने के लिए कानूनों में बदलाव के बारे में सोचना पड़ेगा।'

नोटा विकल्प कब और क्यों लागू हुआ?
ईवीएम पर नोटा बटन का विकल्प सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सितंबर 2013 से दिया जाने लगा। इसका लक्ष्य यह है कि राजनीतिक दल दागी छवि के लोगों को टिकट देने से परहेज करें।

2019 में गोपालगंज में नोटा पर पड़े सबसे ज्यादा वोट
2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार के गोपालगंज (सुरक्षित) सीट पर 51,660 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया, जो कि सबसे ज्यादा था। यहां 5% से ज्यादा वोट इस विकल्प को पड़े थे।

चुनाव सुधारों के लिए आवाज उठाने वाली संस्था एडीआर के प्रमुख अनिल वर्मा के मुताबिक 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में नोटा पर औसतन 2% से कम वोट पड़े। उन्होंने कहा, 'नोटा विकल्प को अगले स्तर पर ले जाने के लिए इसे कानूनी तौर पर शक्तिशाली बनाना चाहिए। हमें लगता है कि अगर नोटा को मिले वोट किसी सीट पर उम्मीदवारों से ज्यादा हो जाती है तो वहां चुनाव रद्द करवा कर नए उम्मीदवारों के साथ ताजा चुनाव करवाए जाने चाहिए।'

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