भारत की नींव सनातन धर्म में निहित: उपराष्ट्रपति धनखड़

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शुक्रवार को कहा कि भारत की नींव सनातन धर्म में निहित है। वे आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेता श्रील प्रभुपाद की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक सभा को संबोधित कर रहे थे। धनखड़ ने कहा कि भारत अहिंसा, शांति और भाईचारे के सिद्धांतों के कारण सदियों से दुनिया के लिए मार्गदर्शक शक्ति रहा है और भविष्य में विश्व गुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

सनातन धर्म की समावेशिता और भारतीय संस्कृतिधनखड़ ने सनातन धर्म की समावेशिता और सार्वभौमिक मूल्यों पर जोर देते हुए कहा कि यह देशभक्ति और जाति, पंथ व आर्थिक भेदभाव से ऊपर उठने का प्रतीक है। उन्होंने भारत की 5000 साल पुरानी संस्कृति को दुनिया में अद्वितीय बताया। उन्होंने कहा कि भारत सदियों से आध्यात्मिक केंद्र रहा है और इसे आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है। साथ ही, उन्होंने नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों के विनाश पर भी चिंता व्यक्त की, जो कभी वैश्विक ज्ञान केंद्र थे।

भारत का पुनरुत्थान और आध्यात्मिकता की भूमिकाउपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत ने ऐतिहासिक आक्रमणों के दौरान अकल्पनीय बर्बरता और विध्वंस देखा, लेकिन देश इन चुनौतियों से उबरकर फिर से विकास और प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह यात्रा आध्यात्मिक उन्नति के बिना संभव नहीं होगी।

आध्यात्मिक महापुरुषों का योगदानधनखड़ ने कहा कि विश्व भारत की आध्यात्मिकता और संस्कृति को श्री रामकृष्ण, स्वामी विवेकानंद, श्री चैतन्य और श्रील प्रभुपाद जैसी महान हस्तियों के माध्यम से जानता है। इन विभूतियों ने न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का प्रचार किया।

बंगाल का योगदान और राष्ट्रीय आंदोलनों में भूमिकाबंगाल को श्रद्धांजलि देते हुए उपराष्ट्रपति ने इसे हर महत्वपूर्ण आंदोलन का अग्रदूत बताया, चाहे वह आध्यात्मिक हो, सांस्कृतिक हो या स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित। उन्होंने बंगाल को खुदीराम बोस, चित्तरंजन दास और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि बताते हुए कहा कि इन नेताओं का योगदान राज्य और देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

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