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पुंछ एनकाउंटर: एक ऐसा ऑपरेशन जिसमें सवाल ज़्यादा हैं और जवाब कम

"हमारे मन में जो सवाल हैं वो वैसे ही बने हुए हैं. हम तो ये भी सोच रहे थे कि वहां जाएं और देखें कि क्या हो रहा है. लेकिन वहां जाने की इजाज़त नहीं है. ये बात अजीब ज़रूर है कि इतने दिनों तक एनकाउंटर चला लेकिन न कोई हमलावर पकड़ा गया, न ही कोई मारा गया. इस एनकाउंटर के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए थी. सरकार क्यों हमें कुछ नहीं बता रही?"

ये कहना है दिलबाग़ सिंह का जो 11 अक्तूबर को जम्मू-कश्मीर के पुंछ ज़िले में चरमपंथियों के साथ मुठभेड़ में मारे गए भारतीय सेना के सिपाही गज्जन सिंह के फूफा हैं. पुंछ के सुरनकोट इलाके के जंगलों में हुई इस मुठभेड़ में भारतीय सेना के एक नायब सूबेदार सहित पांच सैनिकों की मौत हुई थी.

दो दिन बाद 14 अक्टूबर को इसी इलाके के नज़दीक मेंढर में एक अन्य मुठभेड़ में एक जूनियर कमीशंड ऑफिसर सहित भारतीय सेना के चार और जवान मारे गए थे. कुल मिलाकर भारतीय सेना के नौ सैनिक इन मुठभेड़ों में मारे गए लेकिन किसी भी चरमपंथी के पकड़े या मारे जाने के बारे में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया.

11 अक्टूबर की मुठभेड़ में मारे गए भारतीय सेना के नायक मनदीप सिंह के चचेरे भाई गुरविंदर सिंह कहते हैं, "परिवार के ज़हन में बहुत सारे सवाल हैं. हर वक़्त घर पर यही बात चलती है कि आखिर ऐसा हुआ कैसे. सरकार और सरकारी एजेंसियां पूरी जानकारी तो देती नहीं हैं. ये हादसा होने के बाद भी एनकाउंटर तो चलता ही गया. इस बारे में हमारे मन में जो सवाल हैं वो तब तक नहीं जाएंगे जब तक हमें उनका जवाब न मिल जाए."

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चार हफ़्तों तक चला ऑपरेशन

इन दोनो मुठभेड़ों के बाद भारतीय सेना ने पुंछ के इलाके में कार्रवाई शुरू की जो करीब चार हफ़्तों तक चली.

एक जेसीओ सहित पांच सैनिकों के मारे जाने के बाद 11 अक्टूबर को सुरनकोट जंगल में ऑपरेशन शुरू हुआ और बाद में भागे हुए आतंकवादियों को बेअसर करने के लिए इस ऑपरेशन को मेंढर तक बढ़ा दिया गया.

जिन इलाकों में सेना का ऑपरेशन चला वो 10 से 15 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला एक गहरा जंगल है.

कम से कम तीन से चार हफ़्तों तक खबरें आती रहीं कि भारतीय सेना और आतंकवादियों के बीच एनकाउंटर जारी है. ये भी कहा गया कि ये एनकाउंटर शायद अब तक का सबसे लम्बा एनकाउंटर था. लेकिन इतने दिन बीत जाने के बाद भी चरमपंथियों का कोई सुराग नहीं मिला.

फिर कुछ दिन पहले इस एनकाउंटर को बंद कर दिया गया और इस बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई.

भारतीय सेना के प्रवक्ता कर्नल सुधीर चमोली ने बीबीसी से इस बात की पुष्टि की कि एनकाउंटर को रद्द कर दिया गया है लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि पुंछ के उस जंगलों वाले इलाके में तलाशी का काम अब भी जारी है. भारतीय सेना ने आधिकारिक तौर पर ये नहीं बताया है कि किस दिन एनकाउंटर को रद्द कर दिया गया.

बीबीसी ने भारतीय सेना के प्रवक्ता से इस बारे में पूछा. प्रवक्ता ने इस मुद्दे पर कोई सीधी टिप्पणी करने से इनकार किया. लेकिन इतना ज़रूर कहा कि ये एनकाउंटर एक घने और बड़े जंगल के इलाके में चल रहा था और जब तक कोई सामने से गोली नहीं चलाता तब तक उसे ढूंढना आसान नहीं है.

साथ ही, उन्होंने कहा कि एनकाउंटर के दौरान हमलावरों से कोई संपर्क ही नहीं हुआ.

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एनकाउंटर से जुड़े कुछ सवाल

ऐसी स्थिति में इस एनकाउंटर के जुड़े कई सवाल हैं जिनके जवाब नहीं मिले हैं.

राजौरी-पुंछ रेंज के पुलिस उपमहानिरीक्षक विवेक गुप्ता ने कुछ हफ़्तों पहले कहा था कि "घुसपैठियों का एक समूह दो से तीन महीने से इलाके में मौजूद था. आठ जुलाई से इलाके में अभियान चल रहा है."

अगर घुसपैठिए दो से तीन महीनों से इलाके में मौजूद थे तो क्या ये मुमकिन नहीं कि उन्होनें जंगलों में छिपने के ठिकाने बना लिए हों?

क्यों करीब दो हफ्ते तक भारी गोलीबारी के बावजूद एक भी घुसपैठिए को नहीं मारा जा सका जबकि भारतीय सशस्त्र बलों के इतने लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

सुरक्षा बलों के बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान के बाद उनके हाथ क्या लगा?

एक और बड़ा सवाल ये है कि अगर घुसपैठिए अब भी जंगलों में छुपे हुए हैं तो उन्हें रसद कहाँ से मिल रही है? वे कैसे सुनिश्चित कर रहे हैं कि वे सुरक्षा बलों की नज़रों में न आएं?

एनकाउंटर की शुरुआत से ही सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी थी. तो क्या उस सूरत में घुसपैठियों का सुरक्षा बलों को चकमा देकर निकल जाना मुमकिन था?

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एनकाउंटर में विचाराधीन क़ैदी की मौत

इसी बीच 24 अक्टूबर को खबर आई कि इसी एनकाउंटर के दौरान एक विचाराधीन क़ैदी की गोली लगने से मौत हो गई.

ये मामला था पाकिस्तानी चरमपंथी ज़िया मुस्तफ़ा का जिसे इस ऑपरेशन के दौरान चरमपंथी ठिकाने की पहचान के लिए भट्टा धूरियां ले जाया गया था.

ज़िया मुस्तफा को 2003 में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उस साल मार्च में कश्मीरी पंडितों के नदीमर्ग जनसंहार के मास्टरमाइंड के रूप में गिरफ्तार किया था. मुस्तफा पिछले 18 साल से जेल में एक विचाराधीन क़ैदी था.

पुलिस के मुताबिक मुस्तफा जेल के अंदर से ही उन पाकिस्तानी चरमपंथियों के संपर्क में था जिन्होंने जम्मू के पुंछ जिले में घुसपैठ की थी. पुलिस के मुताबिक मुस्तफा इन घुसपैठियों को जंगल के रास्ते तलाशने में मदद कर रहा था.

जम्मू-कश्मीर पुलिस के मुताबिक मुस्तफा की मौत तब हो गई जब चरमपंथियों ने पुलिस और सेना के जवानों की संयुक्त टीम पर गोलियां चलाईं. इस हमले में दो पुलिस के और एक सेना का जवान घायल हुए थे.

इस घटनाक्रम से सवाल इस बात पर भी उठता है कि एक तरफ तो सुरक्षा बलों और चरमपंथियों में कई दिनों तक कोई संपर्क ही नहीं हुआ और आखिरकार जिस दिन संपर्क हुआ उस दिन मुठभेड़ में एक विचाराधीन क़ैदी मारा गया.

ज़िया मुस्तफा की मौत के बाद कई मीडिया रिपोर्ट्स ने इस बात को नोट किया कि मुस्तफा की मौत के साथ ही 2003 के नदीमर्ग नरसंहार से जुड़ा मुक़दमा भी ख़त्म हो गया है.

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क्या घुसपैठिए पुंछ से कश्मीर घाटी में घुस गए?

भारतीय सेना के सेवानिवृत मेजर जनरल एसबी अस्थाना अपने कार्यकाल के दौरान जम्मू-कश्मीर में कई साल काम कर चुके हैं. उन्होनें 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन विजय में भी हिस्सा लिया था.

वे कहते हैं, "पुंछ के इलाके में आतंकवादियों को आम लोगों का समर्थन नहीं है और आतंकवादी अक्सर इस इलाके का इस्तेमाल पीर पंजाल की पहाड़ियों के रास्ते कश्मीर घाटी में घुसने के लिए करते हैं."

मेजर जनरल अस्थाना कहते हैं, "इस बात की सम्भावना है कि ये आतंकवादी पीर पंजाल पार कर दक्षिण कश्मीर में घुसकर वहां के लोगों में घुलमिल कर छिप गए होंगे."

मेजर जनरल अस्थाना कहते हैं कि कश्मीर घाटी के मुक़ाबले जम्मू के पुंछ जैसे इलाकों में तैनात सैनिकों की संख्या कम है और शायद इसी बात का फायदा उठाकर आतंकी इस रास्ते का इस्तेमाल कर कश्मीर घाटी में घुसने की कोशिश कर रहे हैं.

कई हफ़्तों तक चले सेना के ऑपरेशन के बारे में अस्थाना कहते हैं कि इसका मुख्य उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि चरमपंथियों ने इन जंगलों में कोई शिविर न स्थापित कर लिए हों. और चूंकि तलाशी अभियान एक जंगल में चल रहा है इसलिए उसमे वक़्त लगना लाज़मी है.

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स्थानीय लोगों का समर्थन?

पारंपरिक तौर पर सुरक्षा एजेंसियों का यह मानना रहा है कि जम्मू के पुंछ और राजौरी जैसे इलाकों में आम लोगों का समर्थन चरमपंथियों को नहीं मिलता है.

लेकिन इस हालिया एनकाउंटर के बाद सुरक्षा एजेंसियां इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या स्थानीय लोगों ने घुसपैठियों को पनाह और रसद दी.

बीबीसी को मिली जानकारी के मुताबिक जम्मू-कश्मीर पुलिस ने पुंछ की मेंढर तहसील के भट्टा धूरियां के घने जंगलों में छिपे घुसपैठियों के समूह को रसद की सहायता देने के लिए कुल चार लोगों को गिरफ्तार किया है.

जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "ऑपरेशन के दौरान दो महिलाओं सहित एक दर्जन से अधिक संदिग्धों को पुलिस ने पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था. इनमें से चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है. गिरफ्तार लोगों के नाम हैं यासिर अराफात, खुर्शीद अहमद, वाहिद इक़बाल और अन्य."

पुलिस के मुताबिक ये चारों आरोपी भट्टा धूरियाँ के निवासी हैं और इनमें से एक जुवेनाइल है यानी उसकी उम्र 16 साल से कम है इसलिए उसका नाम देने की जगह अन्य लिखा गया है.

इन सभी आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत हत्या, हत्या की कोशिश, आपराधिक साज़िश, उकसाने और अपराधी को शरण देने के आरोप लगाए गए हैं. साथ ही, इन आरोपियों पर आर्म्स एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है.

जम्मू-कश्मीर पुलिस का कहना है कि यासिर अराफ़ात को काठमांडू से उस समय हिरासत में लिया जब वह 25 अक्टूबर को सऊदी अरब जा रहा था. पुलिस के मुताबिक अराफ़ात सऊदी अरब में काम कर रहा था और घुसपैठियों के संपर्क में था. पुलिस का कहना है कि इस बात की पुष्टि हो चुकी थी कि यासिर अराफ़ात ने भट्टा धूरियाँ के जंगलों में छिपे चरमपंथियों को भोजन और आश्रय दिया था.

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2003 की यादें ताज़ा?

इस एनकाउंटर ने सुरक्षा बलों के लिए खतरे की घंटी बजाने के साथ-साथ 2003 की यादें भी ताज़ा कर दी हैं जब पुंछ अचानक से चरमपंथ का गढ़ बनकर उभरा था और चरमपंथियों का खात्मा करने के लिए ऑपरेशन "सर्प विनाश" चलाया गया था.

1999 के कारगिल संघर्ष के बाद से ही दर्जनों पाकिस्तानी चरमपंथियों ने पुंछ में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार घुसपैठ करके एलओसी से कुछ किलोमीटर दूर सुरनकोट तहसील के हिलकाका में डेरा जमाना शुरू कर दिया था.

साल 2003 तक लश्कर-ए-तैबा और जैश-ए-मोहम्मद संगठनों के चरमपंथियों ने हिलकाका की किलाबंदी कर ली थी और कई महीनों का राशन जमा कर लिया था.

आखिरकार ऑपरेशन "सर्प विनाश" के तहत भारतीय सेना ने दो हफ़्तों तक चली कार्रवाई में 62 चरमपंथियों को मार डाला था और भारी मात्रा में गोला-बारूद बरामद किया था.

सुरक्षा बलों का मानना है कि 11 और 14 अक्टूबर को भारतीय सेना पर जिन चरमपंथियों ने हमला किया उनकी संख्या 6 से 8 से ज़्यादा नहीं है लेकिन जिस तरह से ये घुसपैठिए अब तक भारतीय सुरक्षा बलों की पहुँच से बाहर रहने में कामयाब रहे हैं, उससे कई सवाल उठ खड़े हुए हैं.

ऐसे सवाल जिनके जवाबों का सबसे ज़्यादा इंतज़ार वे नौ शोक-संतप्त परिवार कर रहे हैं जिन्होंने अपने सैनिक बेटों को खोया है.

(मोहित कंधारी के इनपुट के साथ)

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