किसी के पास नहीं इन 12 जिन्दगियाें के बारे में सोचने का वक्त
बेंगलोर। जब प्रकृति की रचना पर इंसानी स्वार्थ और तथाकथित 'विकास' हावी हो जाए तो कौन बचाएगा अमूल्य जिन्दगियों को। हमने बीते दिनों पढ़ा कि दुनियाभर में सिर्फ 3200 बाघ ही बचे हैं। हालिया WWF की रिपोर्ट ही सक्रियता का पैमाना नहीं है। यह बात हम, आप और हर इंसान बेहद संजीदगी से स्वीकारने को तैयार है कि 'विकास' व 'कमाई' के लिए प्रकृति को रौंदा जा रहा है।
इस फोटो स्लाइडर को घुमाइए और जानिए देश-दुनिया के वे मासूम, संवेदनशील जानवर जो अपने अस्तित्व की विनतियां कर रहे हैं। इंसानी लंका में वे विभीषण की भूमिका में हैं। इन तस्वीरेां के आंकड़े WWF के साथ ही DW व वन संपदा के अन्य तथ्यों से प्रेरित हैं। घुमाएं स्लाइडर और जानें पूरी हकीकत इन 12 जानवरों की-

सूंस
यह मछलीनुमा जानवर व्हेल या डॉल्फिन से मिलता-जुलता है। आम तौर पर चीन की यांगसे नदी में पाया जाने वाला यह कोमल जीव भारत, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, चीन और जापान में भी मौजूद है। वर्ल्ड वाइड फंड के ताज़ा आंकड़ों में इस जीव को भी ख़तरे में दिखाया गया है।

टाइगर
इंडोनिशिया के सुमात्रा में यह प्रजाति ख़ास तौर से पाई जाती है। 2008 में हुई गणना की बात करें तो दुनिया में 441 और 679 से अधिक ऐसे बाघ नहीं पाए जाते हैं। चौंकाने वाला तथ्य है कि जावा टाइगर पहले ही लुप्त हो चुके हैं व बंगाल टाइगर पर भी खतरा मंडरा रहा है।

घड़ियाल
बीते दिनों हमने गुजरात की एक खबर में जाना कि एक बाथरूम में घड़ियाल पाया गया पर असल में यह मासूम जीव कराह रहा है। यूपी के इटावा व करीबी बीहड़ इलाकों में चंबल नदी ही अब इनकी असली पनाहगार बनती नजर आ रही है।

साओला
बकरी जैसा यह जानवर वियतनाम और आस पास के देशों में अभी भी पाया जाता है। 2010 साओला के पर्याप्त संख्या में मौजूद होने की खबरें उड़ीं जिस पर शोध किया गया पर सामने आया कि यह जानवर भी अब गिनी-चुनी संख्या में ही है।

तेंदुआ का अंत
अपनी चमड़ी के लिए इंसानी रावणों की भेंट चढ़ता जा रहा यह तेंदुआ भी चिंता का बड़ा विषय है। रूस और चीन में ये तेंदुआ ख़ासा पाया जाता है। जंगलों की कटाई तो इनकी गिरती संख्या के लिए जिम्मेदार तो है ही साथ ही इनकी खाल 500 से 100 डॉलर के बीच बिकती है।

मोर हो जाएगा 'नो मोर'
अब बादल बरसे तो नहीं दिखते मोर। मेार का नांच एक दौर में इंद्र देवता की खुशी जाहिर करता था पर आज मोरों पर शिकारियों की नज़र है व वे अब पर्यावरण संरक्षण की मुहिम में भी सक्रियता से शामिल नहीं किए जा रहे हैं।

गैंडा
केन्या, दक्षिण अफ्रीका व यहीं के करीबी अफ्रीकी देशों में काले गैंडे अपनी धुन में विचरण करते मिलते हैं पर अब ये तेज़ी से घटते जा रहे हैं। दरअसल इनके खूबसूरत सींग घटती संख्या के जिम्मेदार हैं।

गुरिल्ला
इस प्रजाति के गुरिल्ले नाइजीरिया और कैमरून जैसे देशों में अधिक संख्या में पाए जाते रहे हैं। ताजा सर्वे बताता है कि दुनिया में 200-300 की संख्या में ही बचे हुए हैं। जो कि बेहद अफसोसजनक है।

कछुआ
इस कछुए की जीवनलीला इसकी खाल और मांस के लिए कर दी जाती है। बेहद संवेदनशील यह जीव हिन्द, प्रशांत और अटलांटिक महासागर में पाया जाता है। इनके बचाव के लिए पर्यावरण वैज्ञानिकों के प्रयास जारी हैं।

गेंडे
इंडोनेशिया, भारत व चीन में खास तौर पर पाए जाने वाले इन गेंडों की संख्या लगातार घट रही है। इनके सींगों की कीमत 30 हजार डॉलर प्रति किलो तक होती है व इसी कारण वे दम तोड़ते जा रहे हैं।

कछुआ
अटलांटिक में पाया जाने वाला खास तरह का कछुआ सभी कछुओं से बड़ा होता है। समुद्र में फैलते प्लास्टिक व प्रदूषित तत्व भी यह गलती से खा लेता है, जिससे इसकी संख्या घट रही है।

हाथी का नहीं कोई साथी
सुमात्रा हाथी को खतरे से 'बुरी तरह खतरे' वाली प्रजाति में डाल दिया गया है। पिछले 20 साल में इसकी आधी आबादी विलुप्त होती जा रही है। सुमात्रा में पिछले 25 साल में 70 फीसदी यह प्रजाति गुम हो चुकी है।












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