India-US Trade Deal: दस्तावेजों में क्यों हुआ बदलाव?विदेश मंत्रालय ने जॉइंट स्टेटमेंट को कहा समझौते की बुनियाद
India-US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में संपन्न हुई ऐतिहासिक ट्रेड डील को लेकर व्हाइट हाउस द्वारा जारी दस्तावेजों में किए गए बदलावों ने कूटनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। 7 फरवरी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय नेतृत्व के बीच हुए समझौते के बाद, अमेरिका की ओर से जारी 'फैक्ट शीट' में अचानक किए गए संशोधनों को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे थे। इस बीच, भारत के विदेश मंत्रालय ने अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए स्थिति स्पष्ट कर दी है।
विदेश मंत्रालय का कहना है कि ये बदलाव आपसी सहमति और संयुक्त बयान (Joint Statement) की मूल भावना के अनुरूप ही हैं। यह ट्रेड डील दोनों देशों के आर्थिक भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जो फिलहाल एक अंतरिम व्यवस्था के रूप में है और भविष्य में एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते का मार्ग प्रशस्त करेगी।

विदेश मंत्रालय की आधिकारिक सफाई, "जॉइंट स्टेटमेंट ही आधार"
साप्ताहिक प्रेस वार्ता के दौरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका के बीच हुई इस बड़ी डील की बुनियाद वही संयुक्त बयान है, जिस पर दोनों देशों ने सहमति जताई थी।
सहमति का ढांचा: प्रवक्ता ने बताया कि अंतरिम समझौते के लिए जो ढांचा तय हुआ था, वही अंतिम माना जाएगा।
दस्तावेजों में बदलाव: व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट में जो संशोधन 10 फरवरी को किए गए, वे केवल साझा समझ को बेहतर तरीके से दर्शाने के लिए हैं।
व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट, क्या थे वो अहम बदलाव?
9 फरवरी को अमेरिका ने समझौते के विस्तार में एक फैक्ट शीट जारी की थी, जिसमें 10 फरवरी को कुछ तकनीकी और रणनीतिक बदलाव किए गए। इन बदलावों ने विशेष रूप से कृषि और टैक्स क्षेत्र का ध्यान खींचा:
1. दालों के टैरिफ पर रुख में बदलाव
मूल दस्तावेज में जिक्र था कि भारत कुछ अमेरिकी कृषि उत्पादों, विशेषकर 'कुछ दालों' (Certain Pulses) पर टैरिफ कम या खत्म करेगा। हालांकि, संशोधित वर्जन में 'दालों' के इस विशिष्ट उल्लेख को हटा दिया गया है। भारत ने इसे सामान्य प्रक्रिया बताया है।
2. डिजिटल टैक्स (Equalization Levy) का मुद्दा
पुराने दस्तावेज में डिजिटल सेवाओं पर लगने वाले टैक्स को हटाने की बात कही गई थी। संशोधित वर्जन में इसे हटा दिया गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत पहले ही 1 अप्रैल 2025 से डिजिटल विज्ञापन सेवाओं पर लगने वाला 6% इक्वलाइजेशन लेवी खत्म करने का निर्णय ले चुका है, जिससे इसे समझौते में बार-बार दोहराने की आवश्यकता नहीं रही।
3. 'निवेश' की जगह 'खरीद' पर जोर
एक बड़ा भाषाई बदलाव 500 अरब डॉलर की राशि को लेकर हुआ।
- पहले: कहा गया था कि भारत ऊर्जा, विमान और कीमती धातुओं के क्षेत्र में अमेरिका में 500 अरब डॉलर का निवेश करेगा।
- अब: संशोधित भाषा में कहा गया है कि भारत इतने मूल्य के अमेरिकी सामान खरीदने का इरादा रखता है। यह बदलाव भारत की क्रय शक्ति और व्यापार घाटे को संतुलित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
इस ट्रेड डील की घोषणा महीनों की लंबी बातचीत और टैरिफ तनाव के बाद हुई थी। खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील की जानकारी साझा की थी। 7 फरवरी को जारी संयुक्त बयान में यह स्पष्ट कर दिया गया था कि यह एक अंतरिम व्यवस्था है। भारत और अमेरिका का लक्ष्य इसे आने वाले समय में एक बड़े और व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते में तब्दील करना है, जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नई गति मिल सके।












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