भारत का दोस्त मिस्र, जिसकी आपत्ति पर पाकिस्तान का प्रस्ताव नहीं हुआ था पास

मोदी और अलसीसी
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मोदी और अलसीसी

मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल-फतह-अल-सीसी भारत के 74वें गणतंत्र दिवस समारोह में हिस्सा लेने दिल्ली पहुंच गए हैं. ये पहला मौक़ा है जब मिस्र के राष्ट्रपति इस समारोह में प्रमुख अतिथि के तौर पर शिरकत करेंगे.

राष्ट्रपति अल-सीसी का ये तीसरा भारत दौरा है. इस मौक़े पर मिस्र सेना की एक टुकड़ी भी गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होगी. अल-सीसी की भारत यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट में मिस्र के राष्ट्रपति की भारत यात्रा को 'ऐतिहासिक' बताया.

भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय ने ट्वीट कर पीएम मोदी और राष्ट्रपति अल-सीसी के बीच हुई मुलाक़ात के बारे में कहा, "बैठक में अपने रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग को और मज़बूत करने और काउंटर-टेररिज़्म संबंधी सूचना एवं इंटेलिजेंस का आदान-प्रदान बढ़ाने का भी निर्णय लिया है."

प्रधानमंत्री मोदी का कार्यालय
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प्रधानमंत्री मोदी का कार्यालय

मिस्र के राष्ट्रपति की ये यात्रा ऐसे वक्त हो रही है जब भारत और मिस्र के कूटनीतिक रिश्तों के 75 वर्ष पूरे हुए हैं. भारत ने जी-20 की अध्यक्षता के दौरान मिस्र को 'मेहमान देश' के तौर पर भी आमंत्रित किया है.

मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में एसोसिएट फ़ेलो मोहम्मद मुदस्सिर क़मर के मुताबिक़, पश्चिम एशिया और अरब दुनिया में मिस्र के महत्व और भारत के पश्चिम एशिया देशों के साथ बढ़ते रिश्तों को देखते हुए ये एक महत्वपूर्ण यात्रा है.

मिस्र सबसे बड़ा अरब देश है और मध्य पूर्व की राजनीति में इसने केंद्रीय भूमिका निभाई है.

मिस्र के राष्ट्रपति अल सीसी
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मिस्र के राष्ट्रपति अल सीसी

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फ़ॉर रेबिक एंड अफ्रीकन स्टीज़ में प्रोफ़ेसर मुजीबुर रहमान कहते हैं, "अरब दुनिया में मिस्र भारत की बहुत अच्छा मित्र देश है. उसकी वजह ये है कि पूरी अरब दुनिया में मिस्र को एक लीडर के तौर पर देखा जाता है."

जहां पचास के दशक में कमाल अब्दुल नासिर ने अरब राष्ट्रवाद और गुटनिरपेक्ष आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई, उनके उत्तराधिकारी अनवर सादात ने इसराइल के साथ शांति की बात की और पश्चिमी देशों से बेहतर संबंधों का रुख़ किया.

अब्दुल फ़तह अल-सीसी मई 2014 में राष्ट्रपति बने. वो ऐसे वक्त भारत आए हैं जब मिस्र की अर्थव्यवस्था के सामने मुश्किल चुनौतियां हैं.

साल 2021-22 में भारत और मिस्र के बीच 7.26 अरब डॉलर का व्यापार था और 50 से ज़्यादा भारतीय कंपनियों ने मिस्र के विभिन्न क्षेत्रों में तीन अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किया है.

भारत-मिस्र संबंध में उतार-चढ़ाव

भारत और मिस्र के अच्छे संबंध गुटनिरपेक्ष आंदोलन की वजह से उस वक्त शुरू हुए थे जब मिस्र में कमान राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर के हाथ थी और भारत में जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे. माना जाता है कि दोनों नेताओं के बीच पर्सनल केमिस्ट्री बहुत अच्छी थी.

साठ का दशक शीत युद्ध का ज़माना था.

मिस्र में भारत के पूर्व राजदूत नवदीप सूरी एक लेख में लिखते हैं, "राजनीतिक स्तर पर दोनों देश इतने नज़दीक थे कि भारत ने 1956 की सुएज़ संकट के दौरान मिस्र को गुप्त रूप से सैन्य सामान भेजा. परमाणु सहयोग और साठ के दशक में एक संयुक्त फ़ाइटर प्रोजेक्ट पर भी सोचविचार किया गया. वो वक्त था जब महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर का नाम घर-घर में जाना जाता था. उनकी किताबों का अरबी में अनुवाद अरब साहित्य के महत्वपूर्ण लोगों ने किया."

स्वेज़ नहर संकट मतलब, वो दौर जब मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने स्वेज़ नहर कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. जिसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने इलाक़े में अपनी फ़ौजें भेजी थीं.

नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर पुष्प अधिकारी के मुताबिक़, अनवर अल सादात के जाने के बाद भारत और मिस्र के रिश्तों में गर्माहट थोड़ी कम हुई, और इसकी वजह इंदिरा गांधी और सादात के काम करने के अलग तौर-तरीके थे.

वो कहते हैं, "जमाल अब्दुल नासिर राष्ट्रवादी नेता थे. उन्होंने स्वेज़ नगर कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इससे सभी पश्चिमी देश उनसे खफ़ा हो गए. सादात उसको बैलेंस करने में लग गए."

सादात की हत्या के बाद मिस्र में होस्नी मुबारक़ सत्ता में आए. उसी दौरान साल 1983 में दिल्ली में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सम्मेलन हुआ जहां प्रोफ़ेसर पुष्प अधिकारी के मुताबिक़ इंदिरा गांधी और होस्नी मुबारक़ के बीच "पर्सनालिटी की कुछ समस्या हो गई."

नवदीप सूरी डिप्लोमैटिक फ़ोकलोर या कूटनीतिक कहानियों का हवाला देते हुए कहते हैं कि ऐसा लगा कि 1983 मे नई दिल्ली गुटनिरपेक्ष आंदोलन बैठक के दौरान बैठने की व्यवस्था को लेकर छोटी से प्रोटोकॉल भूल हो गई और इसे निजी अपमान की तरह लिया गया. मुबारक़ अगले 25 साल तक भारत नहीं आए. वो आख़िरकार नवंबर 2008 में भारत आए.

प्रोफ़ेसर पुष्प अधिकारी के मुताबिक, होस्नी मुबारक़ जब तक सत्ता में रहे, तब तक भारत के साथ मिस्र के रिश्ते क़रीब-क़रीब कट से गए.

जब बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे तो साल 2011 में मुबारक़ को देश में सत्ता छोड़नी पड़ी.

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दोनों देशों की ज़रूरत

लेकिन वक्त बदला है और अब दोनों देशों के रिश्ते काफ़ी बेहतर हो चुके हैं.

मोहम्मद मुदस्सिर क़मर कहते हैं, "पिछले तीन-चार सालों में भारत और मिस्र के रिश्तों में काफी सुधार हुआ है, दोनों काफी क़रीब आए हैं. जब अल-सीसी 2013 में भारत आए तो मिस्र की विदेश नीति में भी बदलाव आया. उनकी कोशिश है जिन देशों से पहले मिस्र के रिश्ते अच्छे थे, उन्हें फिर से बढ़ाया जाए, खासकर आर्थिक वजहों से."

मिस्र और भारत दोनो को एकदूसरे की ज़रूरत है.

2021 में कोविड-19 की लहर के दौरान मिस्र ने भारत को ऑक्सीजन सिलेंडर, कंसेन्ट्रेटर और रेमडेसवीर दवाएं भेजी थीं. इसी तरह ज़रूरत पड़ने पर भारत ने मिस्र को मई 2022 में 61,500 टन गेहूं भेजा था.

हाल ही एक भारतीय कंपनी ने मिस्र में ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट लगाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके तरह कंपनी वहां कुल निवेश आठ अरब डॉलर का निवेश करेगी.

प्रोफ़ेसर पुष्प अधिकारी के मुताबिक जहां मिस्र को शिक्षा, आईटी, रक्षा आदि क्षेत्रों में भारत की ज़रूरत है, भारत के लिए मिस्र अफ्रीका में निवेश का रास्ता बन सकता है क्योंकि मिस्र पश्चिम एशिया और अफ्रीका की राजनीति में बहुत मज़बूत है.

वो कहते हैं, "मिस्र में शिक्षा की स्थिति बहुत बदहाल है. वो भारत से मदद चाहता है. उत्तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया में अभी भी मिस्र मज़बूत सैन्य ताकत है. फिर, जिस तरह का विकास इसराइल में हो रहा है, मिस्र उसकी बराबरी नहीं कर पा रहा है. इसलिए मिस्र को सैन्य मदद भी चाहिए. मिस्र रक्षा सेक्टर में भारत से काफ़ी कुछ चाहता है."

"दो-तीन महीने पहले इस्लामिक देशों का सम्मेलन हुआ था. उसमें भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान एक प्रस्ताव लेकर आया था. मिस्र की कड़ी आपत्ति की वजह से वो पास नहीं हो पाया. इस तरह मिस्र भारत की तरफ़ गुडविल जेस्चर दिखा रहा है."

2022 में मोहम्मद पैग़बर के बारे में बीजेपी की प्रवक्ता रहीं नुपुर शर्मा की टिप्पणी के बाद भारत को इस्लामिक मुल्कों की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी. कई अरब मुल्कों ने भी इस मामले पर असंतोष प्रकट किया, लेकिन मिस्र ने इस दौरान कोई भी टिप्पणी नहीं की.

इस मुद्दे को लेकर पाकिस्तान ओआईसी में एक प्रस्ताव लेकर आया लेकिन अल-सीसी के इसे समर्थन न करने के कारण ये प्रस्ताव पास नहीं हो सका.


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