भारत का पहला जनरल पोस्ट ऑफ़िस जहां बिग बेन के कारीगर ने लगाया था घंटाघर

1780 में Kolkata (अब कोलकाता) पहुंचने के बाद मिसेज एलिजा फे सुदूर इंग्लैंड में रहने वाले अपने परिजनों को जो पत्र भेजा था उसका मजमून यही था.

Indias first general post office where the artisan of Big Ben installed the clock tower

"मैं 12 महीने 18 दिन बाद कलकत्ता पहुंची हूं. यह मेरे सपनों का शहर है. इसके बारे में मैंने इतने सपने देखे थे जिनका शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता. यहां आने का मैंने कितनी बेसब्री से इंतज़ार किया है, यह मैं ही जानती हूं."

1780 में कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंचने के बाद मिसेज एलिजा फे सुदूर इंग्लैंड में रहने वाले अपने परिजनों को जो पत्र भेजा था उसका मजमून यही था. उन्होंने इस महानगर में लंबा अरसा बिताया था.

इस दौरान अपने घर भेजे गए पत्रों में वो कलकत्ता के प्रति अपने लगाव का बेहद बारीकी और संवेदनशीलता के साथ ज़िक्र करना नहीं भूलतीं.

एलिजा फे मूलतः एक ट्रैवल राइटर थीं. 1779 में एक आयरिश बैरिस्टर एंथनी फे से शादी के बाद यह दंपति उसी साल अप्रैल में भारत के लिए रवाना हुआ था.

फ्रांस, आल्प्स पर्वत श्रृंखला, इटली, वहां से जहाज से अलेक्जेंड्रिया, उसके बाद रेगिस्तान और लाल सागर पार कर ये दोनों नवंबर की शुरुआत में कालीकट के मालाबार तट पर पहुंचे थे जहां हैदर अली के निष्ठावान अधिकारियों ने उनको गिरफ़्तार कर लिया था.

क़रीब 15 हफ़्ते उन्हें क़ैद में रहना पड़ा, जिसकी वजह से इंग्लैंड छोड़ने के एक साल से भी अधिक समय के बाद मई, 1780 में वो तब के कलकत्ता पहुंचे थे.

ऊपर जिस पत्र की चर्चा की गई है उसे एलिजा ने यहां पहुंचने के बाद लिखा था. इसका ये भी मतलब है कि तब भारत से डाक सेवा शुरू हो चुकी थी.

कभी ये अंग्रेज़ों की सेना का मुख्यालय था

कोलकाता में हुगली के किनारे नेताजी सुभाष रोड पर स्थाप्त्य की दृष्टि से लाजवाब यह सफ़ेद इमारत भले वर्ष 1864 में बनी थी लेकिन महानगर में डाक सेवा उससे क़रीब 90 साल पहले वर्ष 1774 में ही शुरू हो गई थी.

यह बात शायद कम लोगों को ही पता है कि यह इमारत जहां बनी है वहां कभी फोर्ट विलियम यानी अंग्रेज़ी सेना का मुख्यालय हुआ करता था. कोलकाता में 1774 में डाक सेवा शुरू करने का श्रेय वॉरेन हेस्टिंग्स को दिया जाता है.

उनके दौर में जो पोस्ट ऑफिस शुरू हुआ था वह ओल्ड पोस्ट ऑफिस स्ट्रीट पर था. रेडफर्न नामक एक सज्जन यहां पहले पोस्ट मास्टर जनरल बने थे.

देश के पहले जीपीओ का इतिहास

वर्ष 1864 में पुराने फोर्ट विलियम के अवशेषों पर बने इस जीपीओ भवन का डिजाइन वाल्टर बी.ग्रेनविल (1819-1874) ने तैयार किया था.वो वर्ष 1863 से 1968 तक केंद्र सरकार के वास्तु सलाहकार रहे थे. ग्रेनविल एक मशहूर वास्तुकार थे. उन्होंने इंडियन म्य़ूजियम और कलकत्ता हाईकोर्ट के नक्शे भी बनाए थे.

मौजूदा जीपीओ भवन का निर्माण वर्ष 1700 में बने पुराने फोर्ट विलियम की जगह पर किया गया है. फोर्ट विलियम के उस भवन को वर्ष 1756 के हमले में सिराजुद्दौला ने बर्बाद कर दिया था.

जीपीओ भवन अपनी भव्य ऊंची गुंबद वाली छत (220 फुट से अधिक ऊँची) और लंबे आयोनिक-कोरिंथियन खम्भों के लिए मशहूर है.

यहाँ एक डाक संग्रहालय भी है जिसे 1884 में बनाया गया था. उसमें कलाकृतियों और डाक टिकटों के संग्रह को प्रदर्शित किया गया है.

इस भवन के निर्माण का जिम्मा महानगर की कंपनी मैकिनटोश बर्न लिमिटेड को सौंपा गया. वर्ष 1864 में निर्माण कार्य शुरू होने के बाद इसे पूरा होने में क़रीब चार साल का समय लगा.

उसी साल यानी 1868 में दो अक्तूबर को इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया.

उस समय इस भवन के निर्माण में छह लाख रुपये से कुछ ज्यादा रकम खर्च हुई थी.

बिग बेन बनाने वाले ने ही इस भवन पर लगाई थी घड़ी

इस दो-मंजिला भवन की निचली मंजिल का क्षेत्रफल 49,471 वर्ग फुट और पहली मंजिल का 29,713 वर्ग फुट है.

फिलहाल यह भवन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की हेरिटेज सूची में शामिल है. वर्ष 1896 में इस भवन के गुंबद पर चमकदार डायल वाली एक घड़ी लगाई गई.

इस घड़ी को लंदन की उसी घड़ीसाज कंपनी व्हाइटचैपल बेल फाउंड्री ने बनाया था जिसने वहां एलिजाबेथ टावर पर दूसरा बिग बेन बनाया.

पार्सल कैफ़े: अपनी तरह का पहला कैफ़े

वर्ष 2018 में इस भवन के डेढ़ सौ साल पूरे होने कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे. अभी बीते साल ही यहां एक पार्सल कैफे खोला गया था जो देश में अपनी तरह का पहला कैफे है.

अपने कामकाज के सिलसिले में पोस्ट ऑफिस आने वाले लोग इसमें बैठ कर चाय-नाश्ता कर सकते हैं. इस कैफे में खाने-पीने के साथ ही पार्सल बुकिंग काउंटर की भी सुविधा है.

इस मौके पर तत्कालीन पोस्ट मास्टर जनरल नीरज कुमार ने बताया था, "इस कैफे की शुरुआत का मकसद मौजूदा पीढ़ी के साथ डाक विभाग संबंधों को मजबूत करना है. युवा पीढ़ी में से ज्यादातर को इस भवन और इसके समृद्ध इतिहास के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. कैफे के बहाने ही सही, लोग यहां आने लगे हैं."

इस कैफे में पहुंचने वाले प्रेसिडेंसी के छात्र सुशांत कुमार दास बताते हैं, "यहां कैफे में आया तो इस भवन के समृद्ध इतिहास के बारे में ऐसी बातें भी पता चलीं जो मैंने पहले नहीं सुनी थी. अब तो मैं अक्सर यहां आता हूं."

क्यों शुरू की गई थी डाक व्यवस्था?

कोलकाता में डाक की व्यवस्था महज ईस्ट इंडिया कंपनी के पत्रों को भेजने के लिए शुरू हुई थी. लेकिन बाद में अंग्रेज़ अधिकारियों को भी मुफ़्त पत्र भेजने की सुविधा मुहैया करा दी गई.

ब्रिटिश शासकों ने इसके बाद सोचा कि आखिर डाक को भेजने और लाने का खर्च कैसे निकलेगा?

इस सवाल का जवाब तलाशते हुए आम लोगों के लिए भी पत्र भेजने की सुविधा खोल दी गई. लेकिन तब उसके लिए मामूली खर्च देना होता था.

उसके बाद निजी पत्रों की तादाद और एक से दूसरे शहर तक सामान भेजने में तेजी आई. इसके साथ ही जीपीओ की आय भी बढ़ने लगी.

आज के फ़ोन, ईमेल और मोबाइल दौर में पत्र भेजने वालों की तादाद भले बहुत कम रह गई है, इस भवन का इतिहास अब भी बेहद चमकदार है.

वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी इस भवन के स्वर्णिम दिनों के गवाह रहे हैं.

कोलकाता के सबसे बड़े अख़बार समूह में क़रीब चार दशक की नौकरी के बाद अब गुड़गांव में रह रहे मुखर्जी बताते हैं, "पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख और रिपोर्ट्स भेजने का जीपीओ ही अकेला जरिया था.

वो कहते हैं, ''सत्तर के दशक में तो यहां लंबी कतारें लगती थीं. डाक से संबंधित हर चीज यहां मिलती थी. तकनीकी विकास और ख़ासकर इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन के बढ़ते प्रचलन ने यहां भीड़ बेशक घटा दी है लेकिन यह भवन एक जीता जागता धरोहर है."

शुरुआती दौर में आम लोगों के पत्र या पार्सल उन तक पहुंचाने वालों को डाकिया नहीं, बल्कि रनर कहा जाता था.

तब जो पोशाक वो पहनते थे वो, बैज और बेल्ट यहां बने म्यूजियम में संरक्षित हैं.

यह भवन अब कोलकाता की प्रमुख पहचान बन चुका है.

मध्य कोलकाता में इस भवन के स्थान पर ही कभी पहला फोर्ट विलियम बना था. तब हुगली नदी इसके एकदम क़रीब थी.

पोस्ट ऑफिस भवन में लगी कुछ पुरानी तस्वीरों में भवन के ठीक पीछे जहाज के मस्तूल भी देखे जा सकते हैं.

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