भारत ने चीन को याद दिलाई अक्साई चिन पर जबरन कब्जे की बात, 1959 वाले दावे पर जवाब का इंतजार
नई दिल्ली। पिछले दिनों भारत के प्रमुख अंग्रेजी अखबार से बात करते हुए चीन के विदेश मंत्रालय के ऑफिशियल की तरफ से कहा गया था कि उनका देश आज भी सन् 1959 वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को मानता है। लेकिन भारत की तरफ से चीन को स्पष्ट कर दिया गया कि उसने कभी भी उसके एकपक्षीय नजरिए को एलएसी के लिए स्वीकारा नहीं है। अब 12 अक्टूबर को जब दोनों देशों के मिलिट्री कमांडर्स एलएसी के हालातों पर चर्चा करने के लिए मिलेंगे तो माना जा रहा है कि भारत, चीन की प्रतिक्रिया का इंतजार करेगा। गौरतलब है कि अगले हफ्ते दोनों देशों के बीच सांतवें दौर की कोर कमांडर वार्ता होने वाली है।

अक्साई चिन में 33,000 किमी तक चीन का कब्जा
भारत और चीन के बीच पिछले दिनों 19वें दौर की वार्ता वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसलटेशन एंड को-ऑर्डिनेशन (WMCC) के तहत हुई है। इस मीटिंग के दौरान विदेश मंत्रालय में पूर्वी एशिया के ज्वॉइन्ट सेक्रेटरी का जिम्मा संभाल रहे नवीन श्रीवास्तव ने चीन को 1959 वाली एलएसी को लेकर स्थिति स्पष्ट कर दी है। चीन की तरफ से जिस साल का जिक्र किया जा रहा है उस समय तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री झोहू एनलाई की तरफ से सात नवंबर 1959 को प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के समक्ष एलएसी की रूपरेखा का प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन भारत ने उस समय भी इसे मानने से इनकार कर दिया गया था। भारतीय राजनयिकों ने यह बात भी चीन को स्पष्ट कर दी है कि उसने पहले ही अक्साई चिन में 33,000 किलोमीटर की जमीन पर कब्जा किया हुआ है। साथ ही पाकिस्तान ने गैर-कानूनी तौर पर पीओके के तहत आने वाली शक्सगम वैली की 5,180 स्क्वॉयर किमी जमीन भी उसे सौंप दी थी। चीन की तरफ से उस मीटिंग में भारत की तरफ से इस इनकारनामे पर कोई जवाब नहीं दिया गया था।

क्यों चीन ने छेड़ी 1959 की बात
सात नवंबर सन् 1959 का जो जिक्र चीन की तरफ से किया गया है उस दिन तत्कालीन चीनी पीएम झोहू की तरफ से भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को चिट्ठी लिखी गई थी। इस चिट्ठी में लिखा था, 'दोनों देशो के बीच बॉर्डर की यथास्थिति को बरकरार रखने के लिए, बॉर्डर के इलाकों पर स्थिरता बरकरार रखने और एक मैत्रीपूर्ण निबटारे के लिए, चीन की सरकार ने प्रस्ताव दिया है कि भारत और चीन की सेनाएं पूर्व में मैकमोहन रेखा से 20 किलोमीटर दूर हट जाएं और पश्चिम में दोनों तरफ के जवान अधिकतम संयम बरतें।' दोनों देशों के बीच टकराव को पांच माह हो चुके हैं और चीन की तरफ से लगातार भारतीय जवानों को इसके लिए दोषी बताया गया है। जबकि भारत इस बात को मानने से इनकार करता आ रहा है कि उसके जवानों ने एलएसी को पार किया। भारत की तरफ से कई बार कहा जा चुका है कि उसने हमेशा ही जिम्मेदारी के साथ बर्ताव किया है। वह हमेशा से बॉर्डर पर शांति और स्थिरता का पक्षधर है।

1950 में पड़े चीन के कदम
सन् 1909 के लद्दाख तहसील रेवेन्यू मैप और चीन के सन् 1893 के आधिकारिक नक्शे से यह बात साबित हो जाती है कि अक्साई चिन, लद्दाख का हिस्सा था।अक्साई चिन को चीन का हिस्सा बताता जबकि हकीकत है कि यह भारत का हिस्सा है। लेकिन सन् 1950 में चीन ने इस पर नियंत्रण कर लिया और अब वह एलएसी की स्थिति को बदलने की कोशिशों में लगा हुआ है। इतिहासकारों के मुताबिक सन् 1865 में भारत-चीन सीमा का ब्रिटिश सर्वेयर विलियम जॉन्सन ने सर्वे किया और जॉनसन लाइन के हिसाब से बताया कि अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है। इसके बाद 1899 में एक और ब्रिटिश सर्वेयर ने अक्साई चिन को मैकार्ने मैकडोनल्ड लाइन के हिसाब से अक्साई चिन को चीन का हिस्सा बताया। फिर इसके 50 साल बाद चीन ने अक्साई चिन पर कब्जे का पहला कदम रखा और यहां सन् 1951 में सड़क बनानी शुरू कर दी।

अब चीन की प्रतिक्रिया का इंतजार
भारत को उम्मीद है कि अगले हफ्ते जब सांतवें दौर की कोर कमांडर वार्ता होगी तो उस दौरान चीन की तरफ से एलएसी को लेकर उसके नजरिए पर भी कोई प्रतिक्रिया दी जा सकती है। भारत और चीन के बीच लद्दाख में 1597 किलोमीटर लंबी एलएसी है। लेह स्थित 14 कोर यानी फायर एंड फ्यूरी के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह आखिरी बार इस वार्ता का नेतृत्व करेंगे। वह अभी तक जून से लेकर सितंबर तक हुई सभी मीटिंग्स का नेतृत्व कर चुके हैं। लद्दाख में अब उनका एक साल का कार्यकाल 14 अक्टूबर को खत्म हो रहा है। ले. जनरल हरिंदर सिंह के साथ उनके उत्तराधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल पीजीके मेनन भी इस वार्ता में शामिल होंगे। इसके अलावा विदेश मंत्रालय के ज्वॉइन्ट सेक्रेटरी नवीन श्रीवास्तव भी मीटिंग में शामिल होंगे। चीनी की तरफ से पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) के मेजर जनरल ल्यू लिन जो साउथ शिनजियांग मिलिट्र रीजन के कमांडर हैं, वार्ता में शामिल हो रहे हैं।












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