आर्मी चीफ को मिला Territorial Army के इस्तेमाल का अधिकार, जानें कैसे काम करता है सेना का ये'सपोर्ट सिस्टम'?
India-Pak Tension Territorial Army : भारत पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव को देखते हुए भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। गुरुवार की रात को पाकिस्तानी सेना ने बॉर्डर एरिया में सिविलियंस को टारगेट करते हुए ड्रोन अटैक किया जिसका सेना ने मुंहतोड़ जवाब दिया।
इसके बाद शुक्रवार, 8 मई को रक्षा मंत्री ने तीनों सेनाओं के चीफ के साथ मीटिंग की जिसमें आर्मी चीफ को टेरिटोरियल आर्मी के इस्तेमाल की छुट दी गई। इस बैठक में सेना प्रमुख को टेरिटोरियल आर्मी (Territorial Army) के इस्तेमाल का पूर्ण अधिकार सौंप दिया गया है।

इस खबर के सामने आने के बाद आम नागरिकों के मन में यह सवाल भी उठा आखिर टेरिटोरियल आर्मी होती क्या है? इसकी स्थापना क्यों की गई थी और यह देश की रक्षा व्यवस्था में किस प्रकार का योगदान देती है?
क्या है टेरिटोरियल आर्मी और ये काम कैसे करती है? आईए विस्तार से जानते हैं..
रक्षा मंत्रालय ने 9 मई को एक अधिसूचना जारी किया जिसमें सेना को TA के इस्तेमाल के लिए कहा गया है। इसमें कहा गया है कि यह आदेश अगले तीन सालों के लिए लागू रहेगा। इसका सीधा मतलब है कि आर्मी को किसी भी मिशन के लिए अपने सपोर्ट सिस्टम के इस्तेमाल का पूरा अधिकार है जिससे सेना और मजूबत होगी।
Territorial Army: क्या है टेरिटोरियल आर्मी कैसे करती है काम?
टेरिटोरियल आर्मी, भारतीय सेना का एक ऐसा घटक है जो 'पार्ट-टाइम सिविलियन सोल्जर्स' की अवधारणा पर आधारित है। आम नागरिकों से बनी यह सेना आपातकाल, आपदा और राष्ट्रीय सुरक्षा में आर्मी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अहम भूमिका निभाती है।
टेरिटोरियल आर्मी के जवान आमतौर पर व्यापारी, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर जैसे पेशेवर होते हैं, जो सामान्य समय में अपने पेशे में कार्यरत रहते हैं, लेकिन आपातकालीन स्थिति, युद्धकाल या विशेष सैन्य अभियानों के समय सेना के साथ सक्रिय रूप से जुड़ जाते हैं।
टेरिटोरियल आर्मी की स्थापना स्वतंत्र भारत में 9 अक्टूबर 1949 को की गई थी। हालांकि, इसकी जड़ें ब्रिटिश कालीन 'Territorial Force' में पाई जाती हैं। स्वतंत्रता के बाद भारतीय रक्षा प्रणाली को मजबूत करने के उद्देश्य से इसे औपचारिक रूप से एक रिजर्व फोर्स के रूप में पुनर्गठित किया गया।
Territorial Army को क्यों कहा जाता है 'सपोर्ट सिस्टम'?
Departmental Units: यह इकाइयाँ रेलवे, ऑयल कंपनियों, टेलीकॉम आदि जैसे सरकारी संस्थानों से जुड़ी होती हैं। इनका काम आपातकाल के समय इन संस्थानों की सेवा को बनाए रखना होता है।
Non-Departmental Units: यह इकाइयाँ सीधे भारतीय सेना के तहत काम करती हैं और जरूरत पड़ने पर सीमा पर सुरक्षा जैसे कार्यों में शामिल होती हैं। इन्हें सेना के विभिन्न कोर के तहत संगठित किया जाता है, जैसे इंफैंट्री, आर्टिलरी, इंजीनियर्स आदि।
टेरिटोरियल आर्मी को सेना का सपोर्ट सिस्टम कहा जाता है क्योंकि यह समय-समय विशेष परिस्थितियों में सेना को सहायता देती है। विशेष रूप से तब, जब सेना को अतिरिक्त मानव संसाधनों की जरूरत होती है।
यह बल निम्नलिखित क्षेत्रों में अहम योगदान देता है:
● आपदा प्रबंधन:
बाढ़, भूकंप, तूफान जैसे प्राकृतिक आपदाओं के समय टेरिटोरियल आर्मी राहत और बचाव कार्यों में जुटती है।
● आंतरिक सुरक्षा:
टेरिटोरियल आर्मी चुनाव, त्योहारों या अन्य संवेदनशील अवसरों पर पुलिस बल के साथ मिलकर कानून व्यवस्था बनाए रखने में मदद करती है।
● बुनियादी ढांचे की सुरक्षा:
रेलवे, ऑयल फील्ड्स, बिजली ग्रिड्स और अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा में TA को लगाया जाता है।
● सैन्य अभियानों में सहयोग:
समय आने पर यह बल मुख्य सेना के साथ सीमावर्ती इलाकों में भी तैनात किया जा सकता है, जैसा कि कारगिल युद्ध के दौरान हुआ था।
Territorial Army: कब-कब TA ने निभाई भूमिका?
यह पहली बार नहीं है, जब भारतीय सेना को इसको इस्तेमाल करने का अधिकार दिया गया है। इससे पहले भी इस फोर्स ने आपात स्थिति में देश की सुरक्षा के लिए काम किया है। इससे पहले 1962 में भारत- चीन युद्ध, 1965 और 1971 के पाकिस्तान युद्ध और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान टेरिटोरियल आर्मी ने सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। हाल के वर्षों में भी इसने कोविड-19 महामारी, बाढ़ और अन्य आपदाओं के समय नागरिक प्रशासन को सहयोग दिया।
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