चीन से सीमा पर तनाव की संभावना नहीं, ऐसा होने पर पीछे नहीं हटेगा भारत

सरकारी सूत्रों का कहना है कि देपसांग प्लेन्स पर बातचीत आगे भी जारी रहेगा और अभी इसका मकसद अप्रैल 2020 की यथास्थिति की बहाली को सुनिश्चित करना है.

नई दिल्ली 16 मई: लद्दाख गतिरोध के अब तीसरे वर्ष में प्रवेश करने के साथ ही शीर्ष सरकारी सूत्रों ने 'दिप्रिंट' को बताया कि भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन से फिर से किसी लड़ाई की संभावना नहीं देख रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर चीन फिर से तनाव बढ़ाने की कोशिश करता है, तो भारत परिणाम की चिंता किए बिना जवाब देगा।

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भारत एक शांतिप्रिय देश है
इन अटकलों के बारे में पूछे जाने पर कि आने वाले कुछ महीनों में या फिर अगले कुछ सालों में यह तनाव दोनों देशों के बीच किसी संघर्ष में बदल सकता है, एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने आगे बताया कि 'भारत किसी तरह के युद्ध या संघर्ष की संभावना नहीं देखता है, जैसे कि गलवान में पहले हुआ था. भारत एक शांति प्रिय देश है। वह चीन सहित अपने सभी पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध रखना चाहता है। चीन इस बात को समझ गया है कि भारत किसी भी तरह की आक्रमकता को बर्दाश्त नहीं करेगा और न ही पीछे हटेगा। गलवान में, भारत ने पूरी बहादुरी से लड़ाई लड़ी और चीनी पक्ष को इससे नुकसान पहुंचा। सूत्र ने यह भी बताया कि संघर्ष के दौरान भारत को भी नुकसान उठाना पड़ा था। लेकिन चीन यह समझ चुका था कि भारत झुकेगा नहीं।

भारत जवाब दे सकता है
यह पूछे जाने पर कि अगर किसी संघर्ष का सामना करना पड़े तो क्या होगा, सूत्र ने बताया कि हमारे सैनिक बहुत दृढ़ निश्चय वाले हैं। जंग सिर्फ हथियारों और सुरक्षा प्रणालियों के जरिये हीं नहीं बल्कि सैनिकों के धैर्य और दृढ़ संकल्प से भी लड़ी जाती है, जो हमारे पक्ष में बहुत अधिक है। यदि वास्तव में कोई संघर्ष होता है, तो हम इस बात की परवाह किए बिना कि इसके परिणाम क्या होंगें। हम जवाब देंगे। एलएसी मुद्दे पर भारत के साथ चीन की वर्तमान में चल रही सैन्य और कूटनीतिक वार्ताओं के बारे में सत्र ने बताया कि निकट भविष्य में भी जारी रहेंगी। उन्होंने आगे कहा कि हालांकि पैंगोंग-त्सो के दोनों किनारों, गलवान घाटी और गोगरा पोस्ट में डिसइंगेजमेंट हुआ है, लेकिन देपसांग प्लेन्स और डेमचोक के मुद्दे पर बने रहेंगे क्योंकि वे मौजूदा गतिरोध से पहले के हैं।

बातचीत जारी रहेगा
सरकारी सूत्रों का कहना है कि देपसांग प्लेन्स पर बातचीत आगे भी जारी रहेगा और अभी इसका मकसद अप्रैल 2020 की यथास्थिति की बहाली को सुनिश्चित करना है, जिसमें न केवल सैनिकों को हटाया जाएगा (डिसइंगेजमेंट ऑफ ट्रुप्स), बल्कि समग्र रूप से डी-एस्केलेशन भी होगा। इससे हम यह मतलब निकाल सकते हैं कि भारत और चीन दोनों को 40 हजार से भी अधिक उन अतिरिक्त सैनिकों को वापस लेना होगा, जिन्हें लद्दाख में एलएसी के पास तैनात किया गया है, और अप्रैल 2020 के बाद से बनाये गए सभी रडार और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल स्थलों और अन्य को भी नष्ट करना होगा।

सीमा पर बेहतर बुनियादी ढांचे पर जोर
सरकारी सूत्रों ने दिप्रिंट से कहा कि चीन के साथ हुए तनाव की वजह से सैन्य प्राथमिकताओं पर फिर से विचार किया गया है, और सम्पूर्ण राष्ट्र वाले दृष्टिकोण का पालन किया जा रहा है। उन्होंने कहा, एलएसी तनाव को केवल सेना के नजरिये से नहीं देखा जा सकता है. इसे सम्पूर्ण राष्ट्र के दृष्टिकोण की आवश्यकता है और कूटनीति और अर्थशास्त्र सहित इसके व्यापक प्रभाव हैं।सूत्रों ने आगे बताया कि अब आधुनिक तकनीक और सीमा पर बेहतर बुनियादी ढांचे पर जोर दिया जा रहा है।

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