India-China tension: 20 साल बाद चीन को क्यों हो रही लद्दाख की इस सड़क से चुभन
नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच शनिवार को मिलिट्री कमांडर स्तर की वार्ता हुई। मीटिंग का मकसद पिछले एक माह से लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर जारी टकराव को टालने के उपाय तलाशना था। भारत और चीन के बीच पिछले करीब सात साल में जो भी विवाद हुए हैं उनमें बॉर्डर पर होने वाले निर्माण कार्यों ने बड़ी भूमिका अदा की है। इस बार भी तनाव की बड़ी वजह एक सड़क का निर्माण कार्य है। भारत और चीन के बीच दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में तैयार हो रही सड़क चीन के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गई है। इसी वजह से चीन का पारा कोरोना वायरस महामारी के बीच इतना हाई है।

हर मौसम में सेना को होगी आसानी
दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी रोड को सब सेक्टर नॉर्थ रोड भी कहा जाता है। यह सड़क हर मौसम में सेना के काम आ सकती है और इसलिए ही इसे ऑल वेदर रोड भी कहते हैं। चीन से सटी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) के एकदम करीब इस सड़क के जरिए लद्दाख की राजधानी लेह, दक्षिण में स्थित दारबुक और श्योक गांव से हर पल जुड़ी रहती है। दारबुक गांव, चीन बॉर्डर का आखिरी गांव है और 14,000 फीट की ऊंचाई पर है। 225 किलोमीटर सड़क श्योक और डीबीओ सेक्शन के बीच सड़क का काम बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) ने साल 2000 में शुरू किया था। पहले इस सड़क का काम साल 2012 तक पूरा हो जाना था लेकिन इसमें देर होती गई।

खुद PMO रखता नजर
साल 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पहली सरकार थी जिसने लेह से डीबीओ को जोड़ने वाली सड़क निर्माण की योजना का ऐलान किया था। सड़क पर साल 2012 तक 320 करोड़ की लागत का अनुमान लगाया गया था। इस प्रोजेक्ट पर प्रधानमंत्री ऑफिस व्यक्तिगत तौर पर नजररखता आ रहा है। बीआरओ ने श्योक गांव के करीब सड़क का निर्माण कार्य सबसे पहले शुरू किया था। यह सड़क श्योक नदी के करीब से बहती है और वी के आकार में है। श्योक घाटी लेह से पश्चिम में पड़ती है और दक्षिण में श्योक वैली पैंगोंग झील से इसी सड़क के जरिए जुड़ी हुई है। बीआरओ की सड़क श्योक नदी के किनारों को पार करती हुई नदी के पश्चिम तक जाती है।

आईएएफ का बेस आखिरी मंजिल
छुम्मेद, मुंद्रो और मंदाल्टानंग गांव से गुजरती हुई सड़क सुल्तान छुश्कु पहुंचती है। यह एक पुल है जो 430 मीटर लंबा है और इसे कर्नल छेवांग रिनशेन सेतु नाम दिया गया है। पिछले वर्ष अक्टूबर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस पुल का उद्घाटन किया था। सड़क मुरगो गांव तक पहुंचती है और यह एक पुराना रास्ता है तो काराकोरम पास तक जाता है। इसके बाद बुरतसा और किजिल लांगेर भी चीन के एकदम करीब हैं और इसी सड़क के रास्ते में आते हैं। भारतीय सेना इस सड़क से काराकोरम पास के दक्षिण में आखिरी सैन्य पोस्ट तक आसानी से पहुंच सकेगी। यही वजह है कि चीन नहीं चाहता कि इस सड़क का काम पूरा हो सके। दौलत बेग ओल्डी में पहले ही इंडियन एयरफोर्स (आईएएफ) का बेस एक्टिव है।

LAC बस 9 किलोमीटर दूर
चीन हमेशा से ही इसका विरोध करता आ रहा है। डीबीओ, काराकोरम रेंज के एकदम करीब है और उत्तर भारत को सबसे ठंडा हिस्सा है। यहां से चीन की सीमा दक्षिण में बस आठ किलोमीटर और अक्साई चिन के उत्तर पश्चिम से बस नौ किलोमीटर की दूरी पर है। इसके करीब ही इंडियन आर्मी का सियाचिन बेस है। काराकोराम की सीमा चीन के शिनजियांग प्रांत से लगी हुई है। पाकिस्तान के साथ भी इस हिस्से को लेकर विवाद है। डीबीओ, भारत का उत्तर पश्चिमी हिस्सा है और एलएसी से बस नौ किलोमीटर दूर इस जगह के करीब अक्साई चिन, चिप चाप नदी और जीवन नाला है।

तेजी से हो सकेगी जवानों की तैनाती
यह सड़क ना केवल जवानों की तैनाती तेजी से सुनिश्चित करती है बल्कि यही एक रास्ता है जहां से एएलजी यानी एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड तक पहुंचा जा सकता है। यहां पर सी-130जे जैसा भारी एयरक्राफ्ट भी आसानी से लैंड कर सकता है। इस सड़क की एक शाखा गलवान घाटी तक भी जाती हैं। भारत इस सड़का को हमेशा से ही सुरक्षित करना चाहता है। इस हिस्से में तापमान सर्दियों में -55 डिग्री से नीचे तक चला जाता है। न तो इस हिस्से पर जंगली जानवर हैं और न ही किसी प्रकार के पेड़ पौधे।












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