India In Brics: ब्रिक्स के दिल में भारत, बदलते वैश्विक समीकरण में बढ़ रही हिंदुस्तान की धमक
India In Brics: ब्रिक्स की भूमिका में लगातार विस्तार हुआ है। एक पश्चिमी निवेश बैंक की धारणा से लेकर विश्वसनीय भू-राजनीतिक समूह बनने तक ब्रिक्स ने अपने स्वरूप में बदलाव किया है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से वैश्विक शक्ति संतुलन में हुए परिवर्तनों की कड़ी में यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है। इस यात्रा में, भारत एक शक्तिशाली केंद्र के तौर पर उभरा है। भारत की भूमिका सिर्फ एक सहभागी के तौर पर नहीं है, बल्कि वह एक धुरी बन चुका है। इसके इर्द-गिर्द इस समूह की वैधता और दीर्घकालिक सफलता घूमती है।
वैश्विक कूटनीतिक सत्ता के केंद्र में दशकों तक, अमेरिका और उसके ट्रांसअटलांटिक सहयोगी हावी रहे हैं। उन्होंने ही विश्व को बड़े पैमाने पर नियंत्रित किया है। आईएमएफ, विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ जैसी संस्थाएं पश्चिम की आर्थिक और सामरिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर काम करती रही हैं। ताकत के इस समीकरण ने थोड़े समय के लिए स्थिरता जरूर दी है, लेकिन अक्सर इसमें विकासशील देशों के हितों की अनदेखी की गई है। इस अनदेखी ने एक नए स्तर की असमानता को जन्म दिया है।

India In BRICS: भारत की भूमिका का वैश्विक मंच पर विस्तार
इस एकतरफा व्यवस्था को चुनौती देने का काम ब्रिक्स कर रहा है और भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण मंच है। यहां सिर्फ अमेरिका का विरोध ही एक मात्र मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मंच एक वैश्विक संतुलन की मांग करता है। 21वीं सदी की दुनिया को 20वीं सदी के एकध्रुवीय व्यवस्था के नियमों से नहीं चलाया जा सकता है, इस मान्यता की पुष्टि भी ब्रिक्स करता है। इस समूह की सम्मिलित जीडीपी (पीपीपी के आधार पर) पहले ही जी-7 से अधिक है। साथ ही, इसकी जनसांख्यिकीय और संसाधन में बढ़त भी इसे ग्लोबल साउथ की आवाज का स्वाभाविक केंद्र बनाती है।
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अमेरिकी वर्चस्व को BRICS के जरिए मिल रही चुनौती
अमेरिकी वर्चस्व केवल आर्थिक हकीकत नहीं, बल्कि एक राजनीतिक वास्तविकता भी है। यह वर्चस्व डॉलर के प्रभुत्व, वैश्विक वित्तीय प्रवाह पर नियंत्रण और मनचाहे तरीके से किसी देश पर प्रतिबंध लगाने की क्षमता के तौर पर भी नजर आती रही है। भारत ने हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता को सर्वोपरि माना है। दुनिया में कोई एक ताकत ही व्यापार मार्गों, वित्तीय लेन-देन और यहां तक कि रक्षा खरीद पर आदेश दे या नियंत्रित करे, अपने-आप में एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
ब्रिक्स में अपनी भूमिका को मजबूत बनाते हुए भारत एक तीर से कई निशान साध रहा है। विश्व एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जहां वैश्विक शासन बातचीत और पारस्परिक सम्मान पर आधारित हो। इसमें दबाव या बल प्रयोग न हो या काफी हद तक सीमित रहे। यह दृष्टिकोण उन उभरती अर्थव्यवस्थाओं के दृष्टिकोण से गहराई से मेल खाता है। ऐसे देश लंबे समय से व्यापार, जलवायु परिवर्तन और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर पश्चिमी देशों के दोहरे मानकों का खामियाजा झेल रहे हैं।
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Russia-China के साथ भारत की मजबूत साझेदारी
⦁ ब्रिक्स में, रूस और चीन भारत के स्वाभाविक साझेदार के रूप में खड़े हैं। ये दोनों सहयोगी भी एकतरफा वैश्विक ताकत को समाप्त करने में मदद करते हैं। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे सभी कूटनीतिक संबंधों की अपनी अलग गतिशीलता है।
⦁ रूस के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी भरोसे और विरासत से जुड़ा है। यह साझेदारी शीत युद्ध के दौर से चली आ रही है। मॉस्को एक स्थिर रक्षा साझेदार रहा है, वैश्विक मंचों पर भारत का हितैषी रहा है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सीट के लिए मुखर समर्थक रहा है। आज, रूस के ऊर्जा संसाधन, प्रौद्योगिकी और पश्चिम-प्रधान प्रणालियों को दरकिनार करने की इच्छा इसे ब्रिक्स के आर्थिक और सुरक्षा एजेंडे में एक अमूल्य सहयोगी बनाते हैं।
⦁ चीन के साथ भारत के संबंध अधिक जटिल रहे हैं। सीमा पर तनाव और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों का टकराव वास्तविक समस्याएं हैं। दोनों देश यह मानते हैं कि वैश्विक मंचों पर सहयोग उनके रणनीतिक हितों के अनुसार है। चीन की आर्थिक मजबूती और तकनीकी क्षमता, भारत की जनसांख्यिकीय बढ़त और रणनीतिक भूगोल के साथ मिलकर एक बड़ी ताकत बनते हैं। एक-दूसरे के साथ चुनौतियों से निपटते हुए भी वैश्विक संतुलन के लिए यह साझेदारी अनिवार्य है। ब्रिक्स एक ऐसा मंच है, जहां दोनों देश द्विपक्षीय विवादों को अलग रखकर वैश्विक वित्तीय सुधार और व्यापार की विविधता को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर काम कर सकते हैं।
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भारत की चुनौतीपूर्ण भूमिका: संतुलन बनाते हुए पुल बनना
भारत के लिए ब्रिक्स जितना ज़रूरी है उतना ही इस संगठन के लिए भी भारत का महत्व है। यह सिर्फ तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था या सैन्य क्षमताओं की वजह से नहीं है। एक ही मंच पर प्रतिस्पर्धी गुटों के बीच संतुलन बनाने वाले पुल की भूमिका के तौर पर भी है। चीन और रूस के विपरीत, भारत पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखता है। यही वजह है कि जब वैश्विक संस्थाओं की निष्पक्षता और सुधार की बात कही जाती है, तो भारत एक विश्वसनीय आवाज बनता है। भारत की प्राथमिकता ही टकराव के बजाय सहयोग की रही है। ब्राज़ील या दक्षिण अफ्रीका के विपरीत, भारत की भौगोलिक स्थिति और आर्थिक गति इसे यूरेशिया और हिंद-प्रशांत कनेक्टिविटी के लिए एक स्वाभाविक आधार बनाती है।
सबसे जरूरी बात यह है कि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली ब्रिक्स की मांगों को नैतिक मजबूती प्रदान करती है। ब्रिक्स में भारत की प्रभावी भूमिका इस विचार की पुष्टि करती है कि बहुध्रुवीय दुनिया को अधिनायकवादी ताकतों के जरिए नियंत्रित होने की ज़रूरत नहीं है। शासन की विविधता साझा आर्थिक लक्ष्यों के साथ सह-अस्तित्व में दुनिया लगातार तरक्की कर सकती है।
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