India at 75: 1947 में औसतन 32 साल ही जीते थे भारतीय, आजादी के बाद से स्वास्थ्य क्षेत्र में बदलाव देखिए

नई दिल्ली, 10 अगस्त: स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से भारत ने हर क्षेत्र में तरक्की की है। लेकिन, स्वास्थ्य सेवाओं या हेल्थकेयर सेक्टर में भारत में जो बदलाव हुआ है, वह क्रांतिकारी है। आजादी के बाद से भारत में स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच भी बढ़ी है और इसकी बेहतर उपलब्धता ने जनता का काम भी आसान किया है। इसका परिणाम 75 सालों में हुए बदलावों की तुलना करने से साफ नजर आता है। सबसे बड़ी कामयाबी सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में देखने को मिली है और देश ने आजादी के बाद से मृत्यु दर को कम करने में बहुत ही बड़ी उपलब्धि पाई है। जानलेवा रोगों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियानों की शुरुआत के साथ-साथ, सबको स्वास्थ्य सुविधाएं मिले इसके प्रयासों ने परिस्थियां बदलकर अप्रत्याशित लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी सहायता पहुंचाई है।

औसत आयु में बढ़ोतरी

औसत आयु में बढ़ोतरी

1947 में जब भारत अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ था, तब एक भारतीय की औसत आयु (जीवन प्रत्याशा) करीब 32 साल ही होती थी। आज जब हम आजादी के 75 साल पूरे कर रहे हैं तो एक भारतीय की औसत उम्र 70.19 वर्ष हो चुकी है। यानी बीते 75 वर्षों में हमारी आयु दोगुनी से भी कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है। हम स्वास्थ्य सेवाओं में कितने सशक्त हुए हैं, उसके आकलन का यह एक बेहतरीन नमूना है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक वैश्विक स्तर पर लोगों की औसत आयु 72.98% है। यानी हम लगभग उसी कतार में खड़े हैं, जहां दुनिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत ने अपनी आबादी की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए काफी बढ़िया काम किया है। जानकारों की राय में मानव के विकास का आकलन करने के लिए जीवन प्रत्याशा सबसे सफल और सुविधाजनक इंडिकेटर है। कई तरह की रिसर्च में यह बात सामने आई है कि भारत में आजादी के बाद से जो जीवन प्रत्याशा बढ़ी है,उसके पीछे बेहतर इलाज की उपलब्धता, बेहतरीन दवाओं की देश में मौजूदगी और अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीयों की औसत आयु में इस बढ़ोतरी के पीछे नवजात और बाल मृत्यु दर में कमी के साथ-साथ मातृ मृत्यु दर को कम करने में सफलता मिलना बहुत बड़ा कारण है।

मातृ मृत्यु दर में कमी

मातृ मृत्यु दर में कमी

1940 के दशक में भारत में मातृ मृत्यु दर 2,000 थी। मतलब ये हुआ कि बच्चों को जन्म देने के दौरान प्रति 1,00,000 माताओं में से 2,000 की मौत हो जाती थी। आजादी के महज एक दशक बाद ही यानी 1950 के दशक में मातृ मृत्यु दर घटकर आधी यानी 1,000 रह गई। जबकि, 2017-19 तक यह कम होकर 103 रह गई थी। उससे पहले साल 2016-18 के बीच यह दर 113 थी। यानी कि इन दो वर्षों में 8.8% की गिरावट आई। लेकिन, खास बात ये है कि इसी साल मार्च में रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने एक स्पेशल बुलेटिन में बताया कि भारत में मातृ मृत्यु दर में 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। यहां यह भी बता दें कि भारत यूनाइटेड नेशंस के सतत विकास लक्ष्य (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) में भी शामिल है, जिसका लक्ष्य 2030 तक मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) को 70 से कम पर ले जाना है।

बाल मृत्यु दर में गिरावट

बाल मृत्यु दर में गिरावट

संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक भारत में 2022 में नवजात मृत्यु दर प्रति 1,000 जन्म पर 27.695 है। अगर 2021 से तुलना करें तो नवजात मृत्यु दर (आईएमआर) में 3.74% की गिरावट आई है। वहीं नेशनल हेल्थ फैमिली सर्वे-5 से पता चला है कि सभी राज्यों में नवजात मृत्यु दर में काफी गिरावट रिकॉर्ड की गई है। सबसे ज्यादा सफलता असम ने हासिल किया है, जहां प्रति 1,000 बच्चों में से मौत का आंकड़ा 48 से घटकर 32 तक आ चुका है।

रोग उन्मूलन कार्यक्रमों की सफलता

रोग उन्मूलन कार्यक्रमों की सफलता

देश की आजादी के बाद भारत ने मलेरिया, टीबी, एड्स समेत कई रोगों का भारत से खात्मे का अभियान चलाया। पोलियो को मिटाने की वजह से आज पूरी दुनिया भारत का नाम लेती है। 1990 के दशक तक भारत में पोलियो भयावह रूप से मौजूद था। औसतन रोजाना 500 से 1,000 बच्चे इसकी वजह से लकवाग्रस्त हो जाते थे। 2014 में भारत को पोलियो मुक्त घोषित किया जा चुका है और जनवरी, 2011 के बाद से देश में इसके एक भी केस मिलने की सूचना नहीं है। अमेरिकी जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसीन एंड हाइजिन में छपे एक शोध के मुताबिक 1947 में भारत में 7.5 करोड़ मलेरिया पीड़ित थे। तब भारत की अनुमानित जनसंख्या 33 करोड़ थी। मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम की वजह से 1964 में इसके सिर्फ करीब एक लाख केस रह गए थे। 1976 में इसका फिर से प्रकोप देखने को मिला और करीब 64 लाख लोग मलेरिया पीड़ित थे। लेकिन, उसके बाद से इसमें काफी कमी आई है और विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2021 मलेरिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के सबसे ज्यादा मलेरिया वाले 11 देशों में सिर्फ भारत ने ही इसके खिलाफ बेहतर प्रगति हासिल की है।

अन्य गंभीर रोगों से मुकाबला

अन्य गंभीर रोगों से मुकाबला

भारत दुनिया का सबसे विशाल कुष्ठ रोग निवारण अभियान (राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम) चला रहा है। एक समय भारत में चेचक के सबसे ज्यादा मामले सामने आते थे। 1979 में भारत खुद को चेचक (स्मॉल पॉक्स) मुक्त घोषित कर चुका है। इसी तरह से भारत ने हैजा, काला ज्वर और एचआईवी नियंत्रण में भी काफी कामयाबी पाई है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत के सामर्थ्य का परिचय दुनिया ने कोरोना महामारी में भी किया है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद भारत ने कोविड संकट का जिस तरह से सामना किया है, वह अविश्वसनीय है। साथ ही जिस महामारी में विकसित देशों के भी हाथ-पांव फूल चुके थे, उसमें भारत ने जिस तरह से वैक्सीन विकसित करने और उसके उत्पादन में तेजी दिखाकर मानवता की रक्षा के लिए काम किया है, उसका कायल आज पूरा विश्व हो चुका है। कोविड-19 के खिलाफ ये लड़ाई अभी भी जारी है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र की नीतियां और कार्यक्रमों से मदद

स्वास्थ्य के क्षेत्र की नीतियां और कार्यक्रमों से मदद

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत को इन 75 वर्षों में जो सफलता मिली है, उसके पीछे अनेकों नीतियां और सरकारी कार्यक्रमों का बहुत बड़ा योगदान है। इसकी वजह से देश में स्वास्थ्य सुविधाओं में काफी प्रगति हो पाई है। बीते दशकों में सरकार ने हेल्थकेयर सेक्टर में जो योजनाएं लॉन्च की हैं, उनमें नेशनल हेल्थ मिशन, नेशनल रूरल हेल्थ मिशन ने बच्चों और माताओं की सेहत को ठीक रखने में काफी काम किया है। इन नीतियों के तहते कई सारी योजनाएं भी शुरू की गई हैं, जिसमें जनानी सुरक्षा कार्यक्रम के तहत गर्भवती माताओं के खाते में सीधा कैश ट्रांसफर होता है। जनानी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत गर्भवती माताओं को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त प्रसूति की सुविधा दी जाती है। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत गर्भावस्था के दौरान, खासकर जोखिम वाली माताओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाने का इंतजाम है। 2018 में केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू किया, जो दुनिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य बीमा अभियान है। इस योजना के तहत सरकार बीमारियों के समय वित्तीय जोखिमों से सुरक्षा मुहैया करवाती है और अनुमानित तौर पर सालाना 6 करोड़ लोग इससे लाभांवित हो रहे हैं। इसके अलावा सरकार ने प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना जैसी स्कीम भी लॉन्च की है।

हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में भी हुआ काफी विकास

हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में भी हुआ काफी विकास

अगर विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों की वजह से देश ने स्वास्थ्य व्यवस्था के क्षेत्र में सफलता पाई है तो इन 75 वर्षों में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर भी काफी मजबूत हुआ है। इसका अंदाजा सिर्फ इसी से लग सकता है कि 1950 की दशक में भारत में जहां सिर्फ 28 मेडिकल कॉलेज हुआ करते थे, आज उनकी संख्या 612 हो चुकी है, जिसमें 92,000 से ज्यादा मेडिकल छात्र-छात्राएं शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।(तस्वीरें- सांकेतिक)

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