शहीदों को सलाम: काकोरी कांड से 'बिस्मिल' ने अंग्रेजों के किए थे दांत खट्टे! भयभीत हो गया था ब्रिटिश शासन
Saheedo Ko Salam: पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' (Pandit Ramprasad Bismil) के नाम से शायद ही कोई अनजान होगा। मैनपुरी षड्यंत्र और काकोरी कांड के महानायक अमर शहीद 'बिस्मिल' ने अपने हौंसलों से ब्रिटिश शासन के ताबूत में कील तब ठोक दी, जब 1925 में सहारनपुर से लखनऊ जा रही 8 डाउन ट्रेन उन्होंने लूटी थी। यह घटना ब्रिटिश शासन का सबसे बडा फेल्योर था।
'बिस्मिल' ने काकोरी रेलवे स्टेशन के पास रोका और सरकारी खजाने को लूट लिया। यह पहली बार था, जब आजादी के नायकों ने ब्रिटिश सरकार को कड़ा जवाब दिया था। 'बिस्मिल' का जन्म एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था, लेकिन उनका जीवन असाधारण था।'बिस्मिल' ने चंद्रशेखर व अन्य साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए। पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' का प्रसिद्ध नारा था 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए-क़ातिल में है।' इस नारे ने स्वतंत्रता संग्राम की गति को 'बिस्मिल' के शहादत के बाद भी थमने नहीं दिया।वनइंडिया आपको अपनी 'शहीदों को सलाम' सीरीज के जरिए 'बिस्मिल' के योगदान से रूबरू करा रहा है...

कैसा था बिस्मिल' का बचपन?
पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। उनका परिवार ब्राह्मण वर्ग का था और धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से संपन्न था। उनके पिता बहुत ही अनुशासनप्रिय थे और उन्होंने राम प्रसाद के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राम प्रसाद की प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव में ही हुई। वे एक कुशाग्र बुद्धि के छात्र थे और उन्हें पढ़ाई में बहुत रुचि थी। उनके पिता ने उनकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। वे संस्कृत और हिंदी भाषा में बहुत निपुण थे और प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही वे विभिन्न धार्मिक और साहित्यिक पुस्तकों का अध्ययन करते थे। बचपन में ही उनकी जन्मकुंडली देखकर ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी, कि संभावना बहुत कम है, लेकिन इसका जीवन किसी तरह बचा रहा, तो इसे चक्रवर्ती सम्राट बनने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।
धार्मिक और साहित्यिक रुचि
बचपन से ही राम प्रसाद 'बिस्मिल' का धार्मिक और साहित्यिक रुचियों की ओर झुकाव था। उन्होंने रामायण, महाभारत और गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया। इसके साथ ही वे हिंदी साहित्य और कविताओं में भी रुचि रखते थे। उनकी कविताएं और लेखन स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों को प्रेरित करने के लिए मशहूर हुए।
साहित्यिक रुचि रखने वाले कैसा बना क्रांतिदूत?
राम प्रसाद के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने 1916 में बनारस के एक सम्मेलन में शामिल होकर बाल गंगाधर तिलक के भाषण को सुना। तिलक के विचारों और भाषण ने राम प्रसाद को बहुत प्रभावित किया और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने का निश्चय किया।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना
पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने 1924 में साथियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना था। संगठन के सदस्य क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से जनता को जागरूक करने और स्वतंत्रता की भावना को बढ़ावा देने का काम करते थे।

काकोरी कांड (1925) से ब्रिटिश सरकार में भूचाल
'काकोरी कांड' पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' की सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों में से एक है। 9 अगस्त 1925 को, बिस्मिल और उनके साथियों ने ब्रिटिश सरकार की एक ट्रेन को लूट लिया। इस लूट का उद्देश्य सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाना और उससे प्राप्त धन का उपयोग क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए करना था। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को हिला कर रख दिया और स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी।
सहारनपुर से लखनऊ जा रही 8 डाउन ट्रेन को काकोरी स्टेशन पर रोक गया और बंदूक की नोक पर गार्ड को बंधक बनाकर लूटा गया। क्रांतिकारियों के हाथ कुल 4,601 रुपए की रकम आई। इस घटना से ब्रिटिश सरकार में भूचाल मच गया। घटना में केवल 10 ही लोग शामिल थे, लेकिन सरकार ने एक महीने के अंदर करीब 40 लोगों की गिरफ्तार किया। 6 अप्रैल 1927 को फैसला सुनाया गया।
'बिस्मिल' को दो साल बाद दी फांसी की सजा
काकोरी कांड की गिरफ्तारी में 'बिस्मिल', अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह शामिल रहे। चंद्रशेखर आजाद पुलिस की गिरफ्त से दूर ही रहे। गिरफ्तार सभी पर मुकदमा चलाया गया। 'बिस्मिल' को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में उन्हें फांसी दी गई। उनकी मृत्यु ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को और भी तीव्र कर दिया और उन्हें एक अमर शहीद के रूप में याद किया जाने लगा। वहीं, उनके साथियों को 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी दी गई। अशफाक उल्ला खान को फैजाबाद जेल और रोशन सिंह को इलाहाबाद में फांसी दी गई।
कैसे मिला राम प्रसाद को "बिस्मिल" उपनाम?
राम प्रसाद बचपन से ही साहित्य और कविता में रुचि रखते थे। उन्होंने कई कविताएं लिखीं और उन्हें अपने दोस्तों और परिवार के साथ साझा किया। उनके लेखन में उनके देशभक्ति और स्वतंत्रता के प्रति उनकी भावना झलकती थी।
एक दिन राम प्रसाद ने एक कविता लिखी और उसे अपने दोस्तों को सुनाया। कविता की पंक्तियों में "बिस्मिल" शब्द का उपयोग किया गया था, जिसका अर्थ होता है "आहत" या "घायल"। इस शब्द का उपयोग उन्होंने अपने दर्द और अपने देश के प्रति उनकी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए किया था। उनकी कविता के इस शब्द ने उनके दोस्तों और साथियों को बहुत प्रभावित किया।
उनके दोस्तों और साथियों ने उनकी इस प्रतिभा को देखकर उन्हें 'बिस्मिल' कहकर बुलाना शुरू कर दिया। यह उपनाम धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया और उन्होंने इसे अपने नाम के साथ जोड़ लिया।
अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब
- सशस्त्र संघर्ष: पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से ब्रिटिश सरकार को कड़ा जवाब दिया। उन्होंने कई हथियारबंद हमलों और लूटपाट की घटनाओं का नेतृत्व किया, जिससे ब्रिटिश सरकार को उनकी शक्ति और संगठन के बारे में पता चला।
- संगठन निर्माण: HRA जैसे संगठन की स्थापना और उसे मजबूती से चलाने का उनका प्रयास ब्रिटिश सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हुआ।
- क्रांतिकारी गतिविधियां: बिस्मिल और उनके साथियों ने कई बार ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों का आयोजन किया, जिससे सरकार की नीतियों और कार्यों को चुनौती दी गई।
- लेखन और साहित्य: उनके लेखन ने युवाओं को जागरूक किया और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। उनकी कविताएं और लेख आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।
काकोरी कांड में शामिल प्रमुख क्रांतिकारी
- पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल'
- चंद्रशेखर आजाद
- अशफाक उल्ला खां
- राजेंद्र नाथ लाहिरी
- रोशन सिंह
- भगवती चरण वोहरा (योजना में शामिल थे, पर लूट में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं थे)
पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' का प्रसिद्ध नारा था
"सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए-क़ातिल में है।"
यह नारा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय था और उन्हें प्रेरित करता था।
परिवार में कौन-कौन?
- पिता: मुरलीधर
- माता: मूलमती
- भाई: रामरतन (भाई)
- पत्नी: अविवाहित












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