अब नहीं रहा ‘आप’ के पास धरने के अलावा कुछ भी
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। आम आदमी पार्टी ने जिस तेज रफ्तार से अपने लिए देश की राजनीति में जगह बनाई थी, उसी तेजी के साथ इसका पतन भी हुआ। इसने अपने पहले ही चुनाव में उसी अंदाज में बल्लेबाजी करनी शुरू की थी मानो की कोई बल्लेबाज अपने पहले ही टेस्ट मैंच में शतक ठोक रहा हो। पर दिल्ली में सरकार बनाने के बाद उसके मुख्यमंत्री और मुख्य चेहरे यानी अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह का व्यवहार किया, वह शर्मनाक ही कहा जाएगा।

गणतंत्र दिवस से पहले धरना
अरविंद केजरीवाल गणतंत्र दिवस से कुछ दिन पहले कुछ पुलिस अफसरों के खिलाफ एक्शन लेने की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए। मामला उनके एक मंत्री सोमनाथ भारती और युगांडा की कुछ औरतों के बीच वाद-विवाद से जुड़ा था।
सीएम पद छोड़ा
इसके बाद केजरीवाल ने सिर्फ इस बात पर अपनी सरकार से इस्तीफा दे दिया क्योंकि जैसा वे कह रहे थे कि भाजपा और कांग्रेस ने उन्हें लोकपाल बिल को पारित करवाने में मदद नहीं की।
क्यों छोड़ा सीएम पद
बात-बात पर जनता की बात करने वाले केजरीवाल ने इतना बड़ा फैसला खुद ले लिया। कहते हैं कि इस फैसले को लेने से पहले उन्होंने अपने चंदेक साथियों से ही बात की। और तो और, अपने सारे विधायकों से भी बात नहीं की। उनका मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना उनके लिए बेहद खराब साबित हुआ। मीडिया से लेकर देश की जनता ने कहना शुरू कर दिया कि वे तो जिम्मेदारी लेने से बचते हैं और वे सिर्फ आंदोलनकारी नेता है। वे मुख्यमंत्री के लायक ही नहीं है।
यही नहीं, आम आदमी पार्टी के तमाम नेताओं ने सबको बुरा-भला कहना शुरू कर दिया। सबकी पगड़ी उछालनी शुरू कर दी बिना ठोस साक्ष्यों के। इससे भी जनता उससे दूर हुई।
लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने देश के तमाम भागों में अपने उम्मीदवार खड़े किए। केजरीवाल खुद नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बनारस से लड़े। उन्हें तो लग रहा था कि मानो बस उनकी सरकार देश में बनने ही वाली है। पर देश की जनता ने उन्हें सिरे से खारिज कर दिया। वे खुद हारे और उनके चार ही उमीदवार जीते। यह बात सबको मालूम है कि चारों अपने दम पर जीते, ना कि आम आदमी पार्टी के कारण।
अब वक्त निकला
अब तो यही लगता है कि आम आदमी पार्टी का सर्वश्रेष्ठ काल गुजर चुका है। अब उसके पास धरने-प्रदर्शन के अलावा कुछ बचा नहीं है। हां, दिल्ली विधानसभा का आगामी चुनाव उसके लिए जीवन-मरण का सवाल होगा।












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