बिहार में पासवान का साथ बीजेपी की मजबूरी? LJP ठोक रही है लोकसभा की सात सीटों के लिए दावेदारी
नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव 2019 के लिए बिहार में एनडीए के अंदर सीटों के बंटवारे को लेकर फिलहाल सहमति नहीं बनी है। बीजेपी 20-20 के फॉर्मूले को अपनाना चाहती है जिसमें वो 20 सीटें खुद के पास रखेगी और बाकी 20 का बंटवारा जेडी(यू), एलजेपी और आरएलएसपी के बीच हो। लेकिन समस्या ये है कि जेडी(यू) कम से कम 17 सीटें चाहती है तो एलजेपी भी पिछली बार की सात सीटों से कम पर मानने को राजी नहीं, वहीं आरएलएसपी भी दो से कम पर नहीं मानेगी। ऐसे में अब या तो बीजेपी खुद की सीटों में से अपने दूसरे साथियों को सीटें दे या उन्हें कम सीटों पर लड़ने के लिए राजी करे या फिर एलजेपी और आरएलएसपी के साथ गठबंधन तोड़ दे। बीजेपी आरएलएसपी को दरकिनार कर सकती है लेकिन एलजेपी का साथ छोड़ना बीजेपी को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

नरेंद्र मोदी सरकार इस वक्त दलित विरोधी होने की धारणा से लड़ रही है और इससे भाजपा को नुकसान हो सकता है। ऐसे में बीजेपी रामविलास पासवान का साथ छोड़ने का जोखिम नहीं ले सकती है। यही कारण है कि एलजेपी खुद भी इस बात को लेकर आश्वस्त है कि उसे बिहार में ज्यादा सीटें मिलेगी। एलजेपी ने 2014 में 7 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 6 पर जीत दर्ज की थी। एलजेपी का कहना है कि अगर बीजेपी उत्तर प्रदेश में भी उसका साथ चाहती है तो बिहार में उसे ज्यदा सीटें मिलनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में पासी जाति जिस से पासवान आते हैं कि अच्छी खासी जनसंख्या है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में और रायबरेली और अमेठी में भी पासी जाति की एक बड़ी आबादी है ऐसे में बीजेपी राम विलास पासवान और उनके बेटे चिराग का यहां पर प्रचार में इस्तेमाल कर सकती है। एलजेपी उत्तर प्रदेश में भी तीन से चार सीटें बीजेपी से मांग सकती है। उत्तर प्रदेश में दलितों की कुल आबादी में साढ़े तीन फीसदी पासी जाति है।

चुनावी सर्वों के हिसाब से भी बिहार में अगर बीजेपी, जेडीयू, एलजेपी और आरएलएसपी साथ रहती हैं तो उन्हें इसका फायदा होगा और एलजेपी और आरएलएसपी का अलग होना नुकसान का सौदा होगा। एबीपी न्यूज के ताजा सर्वे पर भी नजर डालें तो अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में एलजेपी और आरएलएसपी यूपीए का साथ देती हैं तो एनडीए का आंकड़ा 22 सीटों से आगे नहीं जाएगा और यूपीए को 18 सीटें मिल सकती हैं। वहीं अगर एलजेपी और आरएलएसपी एनडीए में बनी रहती हैं तो एनडीए को कुल 40 सीटों में से राज्य में 31 सीटें मिलने की संभावना है और यूपीए को महज 9 सीटों पर ही कामयाबी मिल सकती है।
ये तमाम समीकरण साफ दिखाते हैं कि बिहार में अगर बीजेपी को कामयाबी हासिल करनी है तो उसे एलजेपी को साथ रखना ही होगा। एलजेपी भी इस बात को समझती है और इसलिए वो बिहार में सात से कम सीटों पर समझौता करने को राजी नहीं है।
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