"IAS बनाम जज" वीडियो पर विवाद: डॉ. विकास दिव्यकीर्ति को 2 अगस्त को अजमेर कोर्ट में पेश होने का आदेश
जाने-माने टीचर, पूर्व सिविल सेवक, और Drishti IAS कोचिंग संस्थान के संस्थापक‑प्रबंध निदेशक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। अपने एक वीडियो में जजों पर की गई टिप्पणी के मामले में राजस्थान के अजमेर की एक अदालत ने उन्हें 2 अगस्त 2025 को फिर से पेश होने का आदेश दिया है।
दरअसल, "IAS बनाम जज में ज्यादा पावरफुल कौन?" विषय पर बनाए गए वीडियो में न्यायाधीशों पर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-2, अजमेर की अदालत में हाल ही में सुनवाई हुई, मगर डॉ. विकास दिव्यकीर्ति कोर्ट के समक्ष पेश ही नहीं हुए।

विकास दिव्यकीर्ति के वकील ने अदालत में हाजिरी माफी की अर्जी लगाई। परिवादी के वकील अशोक रावत ने इसका विरोध भी किया और विकास दिव्यकीर्ति की गिरफ्तारी वारंट से तलब करने की प्रार्थना की। ऐसे में पीठासीन अधिकारी मनमोहन चंदेल ने पाबंद किया कि वे दो अगस्त को विकास दिव्यकीर्ति को कोर्ट में पेश करें।
पूरा विवाद जज और आईएएस में से ज्यादा ताकतवर कौन है? वाले वीडियो से शुरू हुआ। अजमेर के वकील कमलेश मंडोलिया ने इस वीडियो के आधार पर विकास दिव्यकीर्ति के खिलाफ कोर्ट में शिकायत कर दी थी।
मंडोलिया की शिकायत पर अजमेर के न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-2 के पीठासीन अधिकारी मनमोहन चंदेल की अदालत ने मामला दर्ज कर विकास दिव्यकीर्ति को नोटिस जारी किए। कमलेश मंडोलिया की शिकायत पर बहस के बाद कोर्ट ने मानहानि केस को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया था। मामले में 22 जुलाई को सुनवाई होने वाली थी। विकास दिव्यकीर्ति कोर्ट में हाजिर नहीं हुए।
विकास दिव्यकीर्ति ने वायरल वीडियो में क्या कहा?
सोशल मीडिया पर "IAS vs Judge: कौन है ज़्यादा ताकतवर?" शीर्षक से एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में विकास दिव्यकीर्ति ने कक्षा में छात्रों को पढ़ाते हुए कहा कि "प्रश्न है कि एक जिला कलेक्टर को एक ऑर्डर राज्य सरकार ने दिया है और एक ऑर्डर हाईकोर्ट ने। उसे किसका पालन करना चाहिए? जवाब है-हाईकोर्ट का। क्योंकि वो राज्य सरकार के लिए भी और कलेक्टर के लिए भी ठीक है। वरना हाईकोर्ट दोनों को टांग देगा। हाईकोर्ट बहुत ताकतवर होता है। टांग देता है। उन्होंने आगे कहा कि "हाईकोर्ट कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड है। हाईकोर्ट अगर जिला कलेक्टर को आदेश दे या सीएम कलेक्टर से कहे कि जो मैंने कहा वो करो, तो ऐसे में कोर्ट की अवमानना में सीएम भी नप सकता है।"
शिकायतकर्ता का कहना है कि यह बयान न्यायपालिका की गरिमा के विरुद्ध है, जबकि समर्थक इसे एक शैक्षणिक उदाहरण मानते हैं।
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