काश कि भारत-पाक बॉर्डर ना होता! - वुसअत की डायरी

वुसअत की डायरी: काश के भारत-पाक बॉर्डर ना होता!
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वुसअत की डायरी: काश के भारत-पाक बॉर्डर ना होता!

सुनते हैं कि वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त और सुहासिनी हैदर को कराची में किसी कॉन्फ्रेंस में आना था. वक्त पर वीज़ा नहीं मिला.

मुझे मेरठ की चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी से एक कॉन्फ्रेंस का बुलावा था.

मेरे ट्रैवल एजेंट ने कहा कॉन्फ्रेंस के न्योते की कॉपी और जिसने ये न्योता भेजा उसके घर के पते का कोई बिल या उसके आधार कार्ड की कॉपी मंगवा लें. मैं आपकी वीज़ा एप्लिकेशन भर देता हूं आगे आपकी किस्मत.

मेरा मेरठ जाने का जज़्बा वहीं झाग की तरह बैठ गया.

हमसे अच्छे तो दोनों देशों के वो मछुआरे हैं जिनकी नाव समंदर में ज़रा-सी इधर से उधर हो जाए तो मुफ्त में गुजरात या कराची की जेल में पहुंच जाते हैं.

और जब उनकी संख्या दो ढाई सौ हो जाती है तो फिर दुनिया दिखावे के लिए मन्नत की चिड़ियों की तरह आज़ाद करके वाघा, अटारी के ज़रिए वापस कर दिया जाता है.

कुछ ही महीनों में गुजरात और कराची का पिंजरा फिर नई चिड़ियों से भर जाता है.

करतारपुर
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करतारपुर

करतारपुर में सूंघ ली साजिश की बू

सुना है करतारपुर बिना वीज़े के आया-जाया जा सकेगा मगर इसके लिए भी सिख होने की शर्त है.

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह उन यत्रियों में फिर भी शामिल न होंगे क्योंकि उन्हें शक़ है कि हो न हो इस मेहरबानी के पीछे आईएसआई का कोई बहुत बड़ा मंसूबा है.

पर कैप्टन अमरिंदर सिंह ये बताना भूल गए कि आईएसआई का प्लान ये है कि जिस तरह वैज्ञानिक लोग पक्षियों के पंजों से ट्रांसमीटर बांध के उन्हें उड़ा देते हैं उसी तरह करतारपुर आने वाले सिख यात्रियों को तोहफ़े में जो पगड़ी या कड़ा दिया जाएगा उसमें जासूस ट्रांसमिटर फिट होगा.

कैप्टन अमरिंदर सिंह अकेले नहीं हैं.

हमारे अपने धार्मिक राजनेता मौलाना फज़्लुर्रहमान को भी यकीन है कि करतारपुर कॉरिडोर यहूदी लॉबी के इशारे पर अहमदी समुदाय की सुविधा के लिए खोला गया है ताकि वो कादिय़ान और रव्वा आसानी से आ-जा सकें.

यानी पहले तो अहमदी लोग दाढ़ियां बढ़ाएंगे, ग्रंथ साहिब के पाठ का प्रैक्टिस करेंगे और फिर जो बोले सो निहाल का नारा लगाते हुए असली यात्रियों में घुल-मिल जाएंगे और फिर करतारपुर से पाकिस्तान या भारत के अंदर बाड़ फलांग के गुम हो जाएंगे.

करतारपुर
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करतारपुर

जब ऐसे-ऐसे महान नेता ऐसी-ऐसी बातें करते हैं तो मुझ जैसों को तो बिल्कुल शोभा नहीं देता कि भारत यात्रा के लिए अपनी मुश्किलात का रोना रोऊं.

या इस पर मातम करूं कि बरखा दत्त और सुहासिनी हैदर को वक़्त पर वीज़ा क्यों नहीं मिला.

चलिए एक महान कवि इफ्तिख़ार आरिख़ की कुछ शेर सुनते जाइए-

बिखर जाएंगे हम क्या जब तमाशा ख़त्म होगा

मेरे माबूद आख़िर कब तमाशा ख़त्म होगा,

कहानी में नए किरदार शामिल हो गए हैं.

नहीं मालूम अब किस ढप तमाशा ख़त्म होगा

कहानी आप उलझी है कि उलझाई गई है

ये उप्दा तब खुलेगा जब तमाशा ख़त्म होगा

दिले ना मुत्तमईन ऐसा भी क्या मायूस रहना

जो ख़ल्क उठी तो सब करतब, तमाशा ख़त्म होगा.

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