'मैं अपने बच्चे की किक भी नहीं महसूस कर पाती थी'
पेट में पल रहे बच्चे की किक मां को रोमांचित कर देती है. लेकिन किसी आम गर्भवती कि तरह मौपी अपने बच्चे की हलचल महसूस नहीं कर सकती थीं.
कंधे से नीचे लकवाग्रस्त मौपी, पति या किसी क़रीबी को पेट छूकर बच्चे की हलचल महसूस करने को कहतीं.
परेशानियां तो बहुत थीं, पर दस साल से व्हील चेयर पर रही मौपी के लिए मां बनना एक ज़िद थी, जिसके लिए उन्हें हर दर्द क़बूल था.
मौपी बताती हैं, "लकवाग्रस्त लोगों को कई बार नसों में भयानक दर्द होता है जिसके लिए मैं दवाइयां लेती थी. लेकिन गर्भ धारण करने के बाद मुझे वो दवाइयां छोड़नी पड़ीं ताकि बच्चे को साइड इफ़ेक्ट ना हो."
दवाइयां ना लेने कि वजह से गर्भावस्था के दौरान मौपी हर रात तेज़ दर्द से कराहती थीं.
मौपी के सीने की मांसपेशियों के कुछ हिस्से में भी लकवा है, इसलिए उन्हें सांस फूलने की परेशानी भी है.
वो बताती हैं, "गर्भावस्था के दौरान मांसपेशियों की अकड़न और बढ़ गई थी, कभी-कभी इतनी बढ़ जाती थी कि लगता था कि लेबर पेन शुरू हो गया है."
लेकिन लकवे की वजह से मौपी को समझ ही नहीं आता था की शरीर के नीच के हिस्से में क्या हो रहा है.
'जितनी शारीरिक तक़लीफ़ थी, उतना ही सामाजिक दबाव'
मौपी बताती हैं, "गर्भावस्था के दौरान कई लोगों ने संदेह जताया कि बच्चा भी विकलांग हो सकता है और मैं अपनी शारीरिक स्थिति की वजह से शायद बच्चे को सही परवरिश ना दे पाऊं."
मौपी ने जानकारी जुटानी शुरू की और अपने पति से बात की.
मौपी के पति प्रशांत खुद भी पोलियो सर्वाइवर हैं. वो छड़ी की मदद से ही चल पाते हैं.
हालांकि मौपी और प्रशांत की विकलांगता में काफ़ी अंतर है. मौपी 90 फ़ीसदी विकलांग हैं और प्रशांत 10 फ़ीसदी.
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मां-बाप बनने की चाहत तो दोनों को थी, लेकिन प्रशांत को डर था कि कहीं मौपी की शारीरिक स्थिति की वजह से आगे चलकर उसके जीवन में और कठिनाइयां ना आएं.
लेकिन डॉक्टर ने आश्वासन दिया कि लकवे कि वजह से मौपी को प्रसूति संबंधि कोई दिक्कत नहीं आएगी, यानी वो मां बनने में पूरी तरह सक्षम हैं.
बस उनका अनुभव और औरतों जैसा नहीं होगा.
लकवाग्रस्त मरीज़ों को यूरिनरी ट्रैक्ट इनफ़ेक्शन की परेशानी भी रहती है. मूत्र की नली में संक्रमण रहने से डिलीवरी कई बार पहले ही हो जाती है.
मौपी के साथ भी यही हुआ. उन्होंने आठ महीने में ही बच्चे को जन्म दिया. 31 मार्च 2017 को ऑपरेशन के ज़रिए डिलीवरी हुई.
ज़िंदगी को मिला नया मकसद
मौपी कहती हैं, "मुझे लगा जैसे कोई चमत्कार हो गया. लड्डू के हमारी जिंदगी में आने के बाद मुझे जीने का नया मकसद मिल गया है."
गर्भावस्था के दौरान और पिछले सात महीनों से मौपी ने एक सहायक को साथ रखा हुआ है. सहायक की मदद से वो अपनी बेटी का ख़्याल रख पा रही हैं.
मौपी कहती हैं, "मैं खुद तो लड्डू के लिए कुछ नहीं कर पाती. लेकिन मैं अपनी सहायक के ज़रिए उसे अपने तरीके से बड़ा कर रही हूं."
शारीरिक चुनौतियां अभी भी हैं और मानसिक तनाव भी होता है.
मौपी को स्तनपान कराने में बहुत दिक्कत होती है क्योंकि पीठ और पेट की मासपेशियों में जकड़न रहती है.
पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है. वो कहती हैं "अपनी विकलांगता को पीछे रखकर मैं एक सामान्य मां की तरह लड्डू को सही परवरिश देने की कोशिश करती हूं, जिसके लिए मेरे अंदर की मज़बूत मां मुझे हिम्मत देती है."
और मौपी के शब्दों में ये सब कर पाना बिल्कुल 'ऑउट ऑफ़ द वर्ल्ड फ़िलिंग' है.












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