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भगत सिंह ने जब काउंसिल हाउस में बम फेंका, कैसे की थी तैयारी

भगत सिंह ने जब काउंसिल हाउस में बम फेंका, कैसे की थी तैयारी

23 मार्च की तारीख़ को भारत में शहीद दिवस के तौर पर मनाया जाता है, साल 1931 में इस दिन स्वतंत्रता आंदोलनकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी.

भगत सिंह से जुड़ी यह 'विवेचना' 8 अप्रैल 2020 को प्रकाशित की गई थी.

उस ज़माने में काउंसिल हाउस जो कि आज का संसद भवन है, का शुमार दिल्ली की बेहतरीन इमारतों में किया जाता था.

काउंसिल हाउस में सेफ़्टी बिल पेश होने से दो दिन पहले 6 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त काउंसिल हाउस के असेंबली हॉल गए थे ताकि ये जायज़ा लिया जा सके कि पब्लिक गैलरी किस तरफ़ हैं और किस जगह से वहाँ बम फेंके जाएंगे.

वो ये हर क़ीमत पर सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनके फेंके गए बमों से किसी का नुक़सान न हो. हाँलाकि 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' पास किया जा चुका था जिसमें मज़दूरों द्वारा की जाने वाली हर तरह की हड़ताल पर पाबंदी लगा दी गई थी, लेकिन 'पब्लिक सेफ़्टी बिल' पर अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल ने अभी तक अपना फ़ैसला नहीं सुनाया था. इस बिल में सरकार को संदिग्धों को बिना मुक़दमा चलाए हिरासत में रखने का अधिकार दिया जाना था.

काउंसिल हाउस में प्रवेश

8 अप्रैल को सदन की कार्यवाही शुरू होने से कुछ मिनट पहले 11 बजे भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त बिना किसी का ध्यान आकर्षित किए हुए काउंसिल हाउस में दाख़िल हो चुके थे. उस समय उन्होंने ख़ाकी रंग की कमीज़ और हाफ़ पैंट पहन रखी थी. उसके ऊपर उन्होंने सिलेटी रंग का चारखाने का कोट पहन रखा था जिसमें तीन बाहरी जेबें थीं और एक जेब कोट के अंदर थी. उन दोनों ने ऊनी मोज़े भी पहन रखे थे.

भगत सिंह ने एक विदेशी फ़ेल्ट हैट लगाई हुई थी. इसका उद्देश्य था कि भगत सिंह की ऊँची कद काठी और सुंदर व्यक्तित्व की वजह से कहीं उन्हें पहले ही न पहचान लिया जाए. इस फ़ेल्ट हैट को लाहौर की एक दुकान से ख़रीदा गया था. सदन का एक भारतीय सदस्य उन्हें गेट पर पास दे कर ग़ायब हो गया था. उस समय दर्शक दीर्घा लोगों से खचाखच भरी हुई थी.

भगत सिंह ने जब काउंसिल हाउस में बम फेंका, कैसे की थी तैयारी

भगत सिंह के एक और जीवनीकार मलविंदर जीत सिंह वराइच अपनी किताब 'भगत सिंह - द एटर्नल रेबेल' में लिखते हैं, 'दिलचस्प बात ये थी कि तीन अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने उन्हीं कपड़ो में कश्मीरी गेट के रामनाथ फ़ोटोग्राफ़र की दुकान पर अपनी तस्वीरें खिचाई थीं, जिन कपड़ों में वो बम फेंकने असेंबली हॉल जाने वाले थे. वो 6 अप्रैल को उन तस्वीरों को लेने दोबारा उस दुकान पर भी गए थे.'

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असेंबली भवन आने से पहले भगत सिंह ने अपनी एक जेब घड़ी अपने एक साथी जयदेव को दे दी थी. इस घड़ी का भी एक इतिहास रहा है. सबसे पहले ये घड़ी ग़दर पार्टी के एक सदस्य ने फ़रवरी 1915 में खरीदी थी. इसके बाद रास बिहारी बोस ने वो घड़ी 'बंदी जीवन' के लेखक शचींद्र नाथ सान्याल को दे दी.

सान्याल ने वो घड़ी भगत सिंह को भेंट में दी थी. उस समय सदन में सर जॉन साइमन के अलावा मोतीलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना, एन सी केल्कर और एम आर जयकर भी मौजूद थे. भगत सिंह को यह अच्छी तरह पता था कि उनके बम इस विधेयक को क़ानून बनने से नहीं रोक पाएंगे. कारण था कि नेशनल असेंबली में ब्रिटिश सरकार के समर्थकों की कमी नहीं थी और दूसरे वायसराय को क़ानून बनाने के असाधारण अधिकार मिले हुए थे.

दुर्गा दास ने बम की ख़बर दी पूरी दुनिया को

भगत सिंह द्वारा बम फेंकने की घटना का बहुत सजीव वर्णन दुर्गा दास ने अपनी मशहूर किताब 'इंडिया फ़्रॉम नेहरू टू कर्ज़न एंड आफ़्टर' में किया है.

दुर्गा दास लिखते हैं, '8 अप्रैल को जैसे ही अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल सेफ़्टी बिल पर अपनी रूलिंग देने खड़े हुए भगत सिंह ने असेंबली के फ़र्श पर बम लुढ़का दिया. मैं पत्रकारों की गैलरी से बाहर निकल कर प्रेस रूम की तरफ़ दौड़ा. मैंने एक संदेश डिक्टेट कराया और एपीआई के न्यूज़ डेस्क से कहा कि वो इसे लंदन में रॉयटर और पूरे भारत में फ़्लैश कर दें. इससे पहली कि मैं फ़ोन पर और विवरण देता, फ़ोन लाइन डेड हो गई. पुलिस वालों ने तुरंत असेंबली का मुख्य द्वार बंद कर दिया. मेरे सामने ही भगत सिंह और बटुकेशवर दत्त को हिरासत में लिया गया. लेकिन मेरी ख़बर को रॉयटर ने तीन घंटों तक नहीं चलाया, क्योंकि कोई उसका कोई फॉलो - अप नहीं भेजा गया था. भेजा भी कैसे जाता, किसी पत्रकार को असेंबली हॉल से बाहर ही नहीं आने दिया गया. उठते हुए धुएं के बीच स्पीकर विट्ठलभाई पटेल ने सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी.'

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बम फेंकने के बाद इंकलाब ज़िदाबाद का नारा

भगत सिंह ने बम फेंकते समय इस बात का ध्यान रखा कि वो उसे कुर्सी पर बैठे हुए सदस्यों से थोड़ी दूर पर फ़र्श पर लुढ़काएं ताकि सदस्य उसकी चपेट में न आ सकें.

जैसे ही बम फटा ज़ोर की आवाज़ हुई और पूरा असेंबली हॉल अँधकार में डूब गया. दर्शक दीर्घा में अफ़रातफ़री मच गई. तभी बटुकेश्वर दत्त ने दूसरा बम फेंका. दर्शक दीर्घा में मौजूद लोगों ने बाहर के दरवाज़े की तरफ़ भागना शुरू कर दिया.

कुलदीप नैयर अपनी किताब 'विद आउट फ़ियर - द लाइफ़ एंड ट्रायल ऑफ़ भगत सिंह' में लिखते हैं, 'ये बम कम क्षमता के थे और इस तरह फेंके गए थे कि किसी की जान न जाए. बम फ़ेंकने के तुरंत बाद दर्शक दीर्घा से 'इंकलाब ज़िदाबाद' के नारों के साथ पेड़ के पत्तों की तरह पर्चे नीचे गिरने लगे. उसका मज़मून ख़ुद भगत सिंह ने लिखा था. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन पार्टी के लेटरहेड पर उसकी 30-40 प्रतियाँ टाइप की गईं थीं.'

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हिंदुस्तान टाइम्स के सजग संवाददाता दुर्गादास ने अपनी सजगता का परिचय देते हुए वो पर्चा वहाँ से उड़ा लिया और हिंदुस्तान टाइम्स के साँध्यकालीन विशेष संस्करण में छाप कर सारे देश के सामने रख दिया.

बहरे कानों के लिए धमाका ज़रूरी

इस पर्चे का पहला शब्द था 'नोटिस.'

उसमें फ़्रेंच शहीद अगस्त वैलाँ का उद्धरण था कि 'बहरे कानों को सुनाने के लिए धमाकों की ज़रूरत पड़ती है.' अंत में कमाँडर इन चीफ़ बलराज का नाम दिया गया था.

जैसे ही बम का धुआँ छँटा असेंबली के सदस्य अपनी अपनी सीटों पर लौटने लगे. दर्शक दीर्घा में बैठे हुए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने भागने की कोशिश नहीं की. जैसा कि उनकी पार्टी ने पहले से तय कर रखा था, वो अपनी जगह पर ही खड़े रहे. वहाँ मौजूद पुलिसकर्मी इस डर से उनके पास नहीं गए कि कहीं उनके पास हथियार न हों.

भगत सिंह ने अपनी वो ऑटोमेटिक पिस्तौल सरेंडर की जिससे उन्होंने साउंडर्स के शरीर में गोलियाँ दागी थीं. उन्हें ये अच्छी तरह पता था कि ये पिस्तौल साउंडर्स की हत्या में उनके शामिल होने का सबसे बड़ा सबूत था. दोनों को अलग अलग पुलिस थानों में ले जाया गया. भगत सिंह को मुख्य कोतवाली में और बटुकेश्वर दत्त को चाँदनी चौक थाने में ताकि दोनों से अलग अलग पूछताछ की जा सके.

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खुफ़िया विभाग को प्रारंभिक सुराग

वायसराय ने एक वक्तव्य जारी कर कहा कि दोनों आक्रमणकारियों ने किसी की हत्या नहीं की. उन्होंने माना कि अगर वो चाहते तो कहर बरपा सकते थे. उनका निशाना था बस सेंट्रल असेंबली. उस समय प्रगतिवादी समझे जाने वाले कांग्रेसी नेता चमन लाल ने सबसे पहले क्राँतिकारियों के इस कारनामे की निंदा की. उन्होंने कहा कि बम फेंकना एक पागलपन भरा काम था.

कुलदीप नैयर अपनी किताब में लिखते हैं कि ' ब्रिटिश ख़ुफ़िया विभाग को लगा कि हैंडबिल को लिखने का स्टाइल और प्रारूप पहले भी कहीं इस्तेमाल किया जा चुका है. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को उन पोस्टरों की तफ़तीश करने के लिए लाहौर भेजा गया जो साउंडर्स की हत्या के बाद वहाँ की दीवारों पर चिपकाए गए थे. भगत सिंह द्वारा फेंके गए टाइप किए गए पर्चों और उन पोस्टरों में एक समानता थी. दोनों को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने जारी किया था और दोनों के भेजने वाले का नाम बलराज था जो कि इस संस्था का कमांडर इन चीफ़ था. दोनों का पहला शब्द नोटिस था और दोनों का अंत 'इंकलाब ज़िदाबाद' के नारे से होता था.'

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आसफ़ अली ने लड़ा भगत सिंह का मुक़दमा

यहीं से अंग्रेज़ों को साउंडर्स की हत्या में भगत सिंह के शामिल होने के पहले सुराग मिले. जैसे जैसे जाँच बढ़ती गई, उन पर शक पुख्ता होता चला गया. ये बात साफ़ हो गई कि पर्चों और पोस्टर की इबारत भगत सिंह ने ही लिखी थी. ये सही भी था. दोनों को भगत सिंह ने अपने हाथों से लिखा था. भगत सिंह पर भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के अंतर्गत हत्या के प्रयास का मुकदमा चलाया गया. कांग्रेस पार्टी के आसफ़ अली ने भगत सिंह का मुक़दमा लड़ा. आसफ़ अली के साथ अपनी पहली मुलाकात में भगत सिंह ने उनसे कहा कि वो चमन लाल को बता दें कि वो पागल नहीं हैं. 'हम सिर्फ़ इस बात का दावा करते हैं कि हम इतिहास और अपने देश की परिस्थितियों और उसकी आकाँक्षाओं के गंभीर विद्यार्थी हैं.'

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इस कारनामे से भगत सिंह और बटुकेशवर दत्त भारतीय युवाओं के हीरो बन गए. उनका जन समर्थन इतना बढ़ा कि अंग्रेज़ सरकार ने जेल में ही अदालत लगाने का फ़ैसला किया. ये जेल उस भवन में हुआ करती थी जहाँ इस समय मौलाना आज़ाद मेडिकल कालेज है. इस मुक़दमें में अंग्रेज़ों के वकील थे राय बहादुर सूर्यनारायण. मुकदमे के जज थे एडीशनल मजिस्ट्रेट पी बी पूल.

पूरे मुक़दमे के दौरान भगत सिंह के माता - पिता भी मौजूद थे. जब भगत सिंह को पहली बार अदालत में लाया गया तो उन्होंने मुट्ठियाँ भींच कर अपने हाथ ऊपर करते हुए 'इंकलाब ज़िदाबाद' के नारे लगाए. इसके बाद ही मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि दोनों को हथकड़ियाँ लगा दी जाएं. दोनों ने इसका कोई विरोध नहीं किया और वो लोहे की रेलिंग के पीछे रखी बेंच पर बैठ गए. भगत सिंह ने ये कहते हुए कोई बयान देने से इंकार कर दिया कि उन्हें जो कुछ कहना है वो सेशन जज की अदालत में ही कहेंगे.

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सरकार की तरफ़ से मुख्य गवाह थे सार्जेंट टेरी जिन्होंने कहा कि जब भगत सिंह को असेंबली में गिरफ़्तार किया गया था तो उनके पास से पिस्तौल मिली थी.

टेरी ने गवाही देते हुए कहा, 'पिस्टल भगत सिंह के दाहिने हाथ में थी और उसका मुंह ज़मीन की तरफ़ था.' ये सही नहीं था, क्योंकि भगत सिंह ने खुद अपनी पिस्तौल सरेंडर की थी और उन्होंने खुद पुलिस वाले से उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए कहा था.

हाँ भगत सिंह के पास से पिस्तौल की एक लोडेड मैगज़ीन ज़रूर बरामद हुई थी. भगत सिंह के खिलाफ़ 11 लोगों ने गवाही दी. जिरह के दौरान ही ये बात सामने आई कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अपनी एक जेब में बम और दूसरी जेब में डिटोनेटर ले कर आए थे और वो जानबूझ कर धीमे चल रहे थे कि कहीं बम में दुर्घटनावश पहले ही विस्फोट न हो जाए.

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उम्र कैद की सज़ा

जब भगत सिंह को अदालत में बोलने की अनुमति दी गई तो उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि उन्हें जेल में अख़बार मुहैया कराने के आदेश दिए जाएं. लेकिन अदालत ने उनका ये अनुरोध ठुकरा दिया. अदालत उनके साथ एक साधारण मुजरिम जैसा ही व्यवहार कर रही थी.

4 जून को ये मुक़दमा सेशन जज लियोनार्ड मिडिलटाउन की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया. 6 जून को अभियुक्तों ने अपने वक्तव्य दिए. 10 जून को मुकदमा समाप्त हुआ और 12 जून को फ़ैसला सुना दिया गया. अदालत ने भगत सिंह और दत्त को जानबूझ कर विस्फोट करने का दोषी पाया जिससे लोगों की जान जा सकती थी.

उन दोनों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई. मुकदमें के दौरान अभियोग पक्ष के गवाह सर सोभा सिंह (मशहूर लेखक खुशवंत सिंह के पिता ) ने गवाही दी कि उन्होंने भगत सिंह और बटुकेशवर दत्त को बम फैंकते हुए देखा था. हाँलाकि ये दोनों इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने के पक्ष में नहीं थे लेकिन बाद में उन्हें ऐसा करने के लिए मना लिया गया.

तर्क ये दिया गया कि इससे क्राँति के संदेश का प्रचार होने में मदद मिलेगी. जैसा कि उम्मीद थी हाई कोर्ट ने 13 जनवरी 1930 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की अपील ख़ारिज कर दी और उन्हें 14 सालों के लिए जेल की सलाख़ों के पीछे भेज दिया गया. बाद में साउंडर्स की हत्या के आरोप में भगत सिंग को फाँसी पर लटका दिया गया.

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