कैसे नरेंद्र मोदी के राज में क्षेत्रीय दलों की मोहताज बनकर रह गई है कांग्रेस ?
नई दिल्ली, 28 जून: एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की पहल पर पिछले दिनों तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट हुई थी। हालांकि, बाद में पवार की पार्टी ने ही थर्ड फ्रंट की जल्दीबाजी पर सुर बदल लिए थे। राष्ट्र मंच के नाम से जो बैठक शरद पवार के घर बुलाई गई थी, उसमें कांग्रेस के कुछ नेताओं को निमंत्रण जरूर दिया गया था,लेकिन वो ऐसे नेता थे जो खुद ही पार्टी की जमात में ग्रुप-23 के रूप में मशहूर हैं। उस बैठक को लेकर कांग्रेस ने औपचारिक तौर पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष नाना पटोले ने जो बातें कहीं, उससे जरूर जाहिर हुआ कि कांग्रेस अब खुद को राष्ट्रीय स्तर पर अकेले नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी का सामना करने में असमर्थ मान चुकी है। पटोले की बातों में कहीं न कहीं गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों की उसके प्रति बेरुखी से बेचैनी जरूर महसूस हुई।

सहयोगी दलों की पैरवी की मोहताज हुई कांग्रेस
पहले तो ममता बनर्जी के दूत और पूर्व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने शरद पवार के घर बुलाई बैठक में गांधी परिवार की अगुवाई वाली कांग्रेस के किसी बड़े चेहरे को आमंत्रित नहीं किया। बाद में शरद पवार ने खुद यह कहना शुरू कर दिया है कि अगर भाजपा के विकल्प की तलाश है तो उसमें कांग्रेस को भी शामिल करना होगा। कांग्रेस के लिए यही आवाज बिहार में नेता विपक्ष और लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव ने भी उठाई है। महाराष्ट्र में एनसीपी कांग्रेस की सहयोगी है और बिहार में राजद से उसका दशकों पुराना गठबंधन है। ये बात अलग है कि एनसीपी कांग्रेस से ही निकली हुई पार्टी है और लालू यादव कांग्रेस विरोधी राजनीति की पैदाइश हैं। एक बात और महत्वपूर्ण है कि पवार को यह तो लगता है कि कांग्रेस को किनारे करके अगर मोदी की बीजेपी से लड़ाई लड़ेंगे तो उसकी धार मजबूत नहीं होगी। लेकिन, उन्होंने कलेक्टिव लीडरशिप की बात कहकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को आगे बढ़ाने की मुहिम में लगीं कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के मन के अनुकूल बात नहीं की है। यानी वो बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस को साथ लेने की वकालत तो कर रहे हैं, लेकिन माइनस-सोनिया वाली कांग्रेस का नेतृत्व उन्हे मंजूर नहीं है।

क्षेत्रीय दलों की नजरों में कैसे कमजोर हुई कांग्रेस
इसकी वजह ये है कि 2014 के लोकसभा चुनाव तक भाजपा-विरोधी विपक्षी राजनीति की धुरी रही कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के बीच अपनी पुरानी साख खो चुकी है। कांग्रेस, बीजेपी के खिलाफ अकेले 200 से ज्यादा सीटों पर भिड़ने का दम तो भरती है, लेकिन जमीनी हालात उसके पक्ष में नहीं हैं। अगर 2019 के लोकसभा चुनाव को देखें तो कांग्रेस को मिली 52 सीटों में से 46 सीटें वहां मिलीं, जहां भाजपा उसके मुकाबले में थी ही नहीं; और तो और ये सारी सीटें उसे गैर-हिंदीभाषी राज्यों में मिलीं। जैसे- केरल में 15, तमिलनाडु और पंजाब में 8-8, तेलंगाना और असम में 3-3, पश्चिम बंगाल में 2 और महाराष्ट्र, मेघालय, कर्नाटक, ओडिशा, गोवा, पुडुचेरी और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 1-1. सिर्फ 6 सीटें ही वह हिंदीभाषी राज्यों में भाजपा से सीधे मुकाबले में जीत सकी। वो भी यूपी की 80 सीटों में से 1, बिहार में 40 में से 1, मध्य प्रदेश में 28 में से 1, झारखंड 14 में से 1 और छत्तीसगढ़ में 11 में से 2. वहीं गुजरात के अलावा राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में तो भाजपा से सीधे मुकाबले उसका खाता भी नहीं खुला।

कांग्रेस का कमजोर होता नेतृत्व और क्षेत्रीय नेताओं की बढ़ती ताकत
आज कांग्रेस को अपनी बात रखने के लिए अपनी सहयोगियों का मोहताज होना पड़ रहा है, इसकी वजह है। तथ्य ये है कि कांग्रेस के पास जितने लोकसभा सांसद हैं, उनकी कुल संख्या उसमें से निकलकर बनी एनसीपी, टीएमसी और वाईएसआर कांग्रेस के सांसदों से सिर्फ 3 ज्यादा है। अगर इन तीनों दलों के 49 लोकसभा सांसदों को बाकी भाजपा-विरोधी क्षेत्रीय दलों के सांसदों की संख्या से जोड़ दें तो यह कांग्रेस पर बहुत ज्यादा भारी पड़ जाते हैं। अगर कांग्रेस और उसकी सहयोगियों के अलावा बाकी विपक्षी पार्टियों की बात करें तो उसके नेता अपने-अपने राज्यों में राहुल-प्रियंका से ज्यादा बड़े मास लीडर हैं। जगन मोहन रेड्डी (वाईएसआरसीपी), के चंद्रशेखर राव (टीआरएस), नवीन पटनाटक (बीजेडी) और बादल परिवार (अकाली दल)।

'जो पहल करेगा, उसी के हाथ में विकल्प होगा'
गैर-भाजपा विरोधी दलों और कांग्रेस में चल रही कशमकश पर वनइंडिया ने राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार से खास बात की। उनका कहना है कि गठबंधन की सियासत पूरे देश में स्वीकार्य बन गई है और बहुमत वाली पार्टी भी गठबंधन की पार्टी है और इसी के तहत चुनाव लड़कर आई है। वहीं कांग्रेस से जुड़ी मौजूदा चर्चा पर उन्होंने कहा, "भाजपा के समांतर सबसे बड़ी पार्टी जिसका एक से अधिक राज्यों में प्रभाव है तो वो कांग्रेस है। जब भी राष्ट्रीय राजनीति में विकल्प देने की बात होगी तो कांग्रेस को छोड़कर किसी विकल्प की तैयारी नहीं हो सकती है। मगर, कांग्रेस को माइनस करके कोई गठबंधन बन जाए...बड़े पैमाने पर उसका राष्ट्रीय स्तर पर कैंपेन चलने लगे और वो विकल्प बनकर के सामने आ जाए तो वैसी स्थिति में कांग्रेस के लिए उसका समर्थन करना लाजिमी, स्वाभाविक या मजबूरी बन जाता है।....जो पहल करेगा, उसी के हाथ में विकल्प होगा। "

भाजपा-विरोधी दलों को कांग्रेसी नेतृत्व क्यों मंजूर नहीं
सोनिया गांधी ने कम से कम 10 साल तक भाजपा विरोधी यूपीए की अगुवाई की। लेकिन, अब वह राजनीति में उतनी सक्रिय रहने की स्थिति में नहीं हैं और न ही कांग्रेस में पहले वाली जान बची है। ऊपर से बीजेपी विरोधी बाकी पार्टियों को लगता है कि सोनिया का पूरा फोकस राजनीति से पूरी तरह से किनारे हटने से पहले अपने दोनों बच्चों की स्थाई प्लेसमेंट पर है, जबकि राहुल और प्रियंका दोनों ही चुनावी राजनीति की कसौटी पर बार-बार नाकाम साबित हो चुके हैं। इसलिए कोई क्षेत्रीय पार्टी और नेता कांग्रेस को साथ लेकर चलने की बात तो करते हैं, लेकिन सोनिया जैसा गांधी परिवार के नेतृत्व के आगे सिर झुकाने के लिए तैयार नहीं लग रहे हैं।
प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वे कई टीवी चैनलों और अखबारों से जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वो प्रमुख हिंदी न्यूज चैनलों में सम-सामयिक मुद्दों पर चर्चा में भाग लेते हैं और बेबाकी से अपनी राय देश के सामने रखने के लिए जाने जाते हैं।












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