लालू से 6 घंटे तक उलझने वाले सीबीआई के राकेश अस्थाना कैसे बने संदिग्ध

मोदी
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केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच जारी जंग सार्वजनिक होने के बाद इस मुद्दे ने राजनीतिक मोड़ ले लिया है.

सीबीआई ने जांच एजेंसी में नंबर दो की हैसियत वाले अधिकारी राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ रिश्वत लेने के मामले में एफ़आईआर दर्ज की है.

इसके बाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरते हुए राकेश अस्थाना को उनका चहेता अधिकारी क़रार दिया है.

राहुल गांधी ने ट्वीट करते हुए कहा है, "प्रधानमंत्री मोदी के चहेते अधिकारी और गुजरात कैडर के आईपीएस अफ़सर जिन्होंने गोधरा मामले की जांच भी की थी, राकेश अस्थाना को रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया है."

इसके बाद दोनों अधिकारियों को प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से समन मिलने की ख़बरें सामने आ रही हैं.

आइए जानते हैं इन दोनों अधिकारियों के बारे में...

राकेश अस्थाना
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राकेश अस्थाना

कौन हैं राकेश अस्थाना

1984 बैच के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना झारखंड के रांची शहर से आते हैं.

जेएनयू से पढ़ाई करने वाले अस्थाना को नरेंद्र मोदी और अमित शाह के क़रीबी अधिकारियों में से एक माना जाता है.

राकेश अस्थाना ने अपने अब तक के करियर में उन अहम मामलों की जांच की है जो कि वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से ख़ास माने जाते हैं.

इन मामलों में गोधरा कांड की जांच, चारा घोटाला, अहमदाबाद बम धमाका और आसाराम बापू के ख़िलाफ़ जांच शामिल है.

लेकिन राकेश अस्थाना को लालू प्रसाद यादव से लगातार छह घंटे तक पूछताछ करने के बाद ही ख्याति मिली थी.

लालू यादव
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लालू यादव

अस्थाना के ही नेतृत्व में गोधरा कांड की जांच हुई थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनाई गई आर के राघवन के नेतृत्व वाली जांच समिति ने अस्थाना की रिपोर्ट को सही माना था.

गुजरात काडर से आने की वजह से वह गुजरात के प्रमुख शहरों जैसे अहमदाबाद, सूरत और वडोदरा में उच्च पदों पर तैनात रह चुके हैं.

ख़ास बात ये है कि अस्थाना उस दौर में गुजरात के प्रमुख पदों पर रहे हैं जब वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह हुआ करते थे.

इसके बाद वर्तमान केंद्र सरकार ने अस्थाना को सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर के रूप में नियुक्त किया.

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केंद्र सरकार ने इससे पहले सीबीआई में वरिष्ठता के क्रम में नंबर दो पर तैनात अधिकारी आरके दत्ता को पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा का कार्यकाल पूरा होने से ठीक दो दिन पहले गृह मंत्रालय भेज दिया.

अगर आरके दत्ता को गृह मंत्रालय नहीं भेजा जाता तो वह स्वाभाविक रूप से सीबीआई के निदेशक बन जाते.

लेकिन सरकार के इस फ़ैसले के बाद सीबीआई लगभग एक महीने तक बिना किसी निदेशक के काम करती रही.

ख़बरों के मुताबिक़, अस्थाना इस समय विजय माल्या और लालू यादव परिवार के ख़िलाफ़ मामलों की जांच कर रहे हैं.



आलोक वर्मा
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आलोक वर्मा

सुधारवादी अफ़सर के रूप में चर्चित हैं वर्मा

अगले साल जनवरी में रिटायर होने वाले आलोक वर्मा को उन पुलिस अधिकारियों के रूप में जाना जाता है जिन्होंने पुलिस सेवा को बेहतर बनाने के लिए तमाम नई योजनाओं को शुरू किया.

आलोक वर्मा ने अपने 35 साल के करियर में अब तक केंद्र शासित राज्यों के पुलिस प्रमुख के पद से लेकर तिहाड़ जेल के डीजीपी पद और दिल्ली पुलिस कमिश्नर के पद को संभाला है.

1979 बैच के आईपीएस अधिकारी आलोक वर्मा ने मात्र 22 साल की उम्र में भारतीय पुलिस सेवा में प्रवेश किया था.

दिल्ली पुलिस में अलग-अलग पदों पर रहते हुए उन्होंने तमाम सुधारवादी क़दम उठाए.

इनमें साल 2016 में दिल्ली पुलिस आयुक्त के पद पर रहते हुए उन्होंने महिला पीसीआर शुरू कराने से लेकर दिल्ली पुलिस में पारदर्शिता लाने के लिए कई प्रयास किए.

अगर वर्तमान मामले की बात करें तो सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने अपने ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज होने के बाद आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ सीवीसी में कथित भ्रष्टाचार के 10 मामले दर्ज कराए हैं.

सीबीआई में एडिशनल डायरेक्टर और स्पेशल डायरेक्टर के पद पर रह चुके अरुण भगत आलोक वर्मा को एक बेहद ही समझदार अधिकारी बताते हैं.

बीबीसी संवाददाता नवीन नेगी के साथ बातचीत में अरुण भगत कहते हैं, "आलोक वर्मा ने मेरे साथ दिल्ली पुलिस में काम किया है. वह एक बहुत ही समझदार अधिकारी रहे हैं और जल्दबाजी में काम करने वाले अधिकारी नहीं हैं. वो धैर्य के साथ काम करते हैं. लेकिन आलोक वर्मा के सामने ज़रूर ही कोई मजबूरी होगी जिसकी वजह से वह इतने वरिष्ठ अधिकारी के ख़िलाफ़ ये क़दम उठा रहे हैं. उन्होंने अपने क़रीबी अधिकारियों से सलाह-मशविरा भी किया होगा. अगर ऐसा नहीं होता तो वह ऐसा नहीं करते."

देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई के काम करने के तरीक़ों पर तो पहले भी कई बार सवाल उठाए जाते रहे हैं.

सीबीआई को पिंजड़े में बंद तोते के विशेषण से भी नवाज़ा जा चुका है.

ये पहला मौक़ा है, जब सीबीआई के दो अधिकारी आपस में ही एक दूसरे पर खुले तौर पर आरोप लगा रहे हैं. सरकार के सामने इस विवाद को सुलझाने के साथ-साथ सीबीआई की लगातार गिरती साख को भी बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है.


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