हार्दिक पटेल के कांग्रेस में आने से राहुल को कितना फायदा,मोदी को कितना नुकसान?
नई दिल्ली- अगर पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल होते हैं, तो यह स्थिति निश्चित तौर पर गुजरात की राजनीति को बहुत ही दिलचस्प बना देगी। मौजूदा समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हार्दिक पटेल दोनों ही गुजरात के सबसे बड़े क्राउड पुलर हैं। इस बात में भी कोई शक नहीं कि 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी की छठी जीत का आंकड़ा सिमट कर महज दो अंकों में रह गया, तो उसके पीछे भी हार्दिक को एक बड़ा कारण माना जाता है। लेकिन, क्या लोकसभा चुनाव में भी हार्दिक उतना ही असर डाल पाएंगे?

पाटीदार आंदोलन के बाद हार्दिक की राजनीति
अगस्त 2015 से पहले हार्दिक पटेल का देश की राजनीति में कोई वजूद नहीं था। लेकिन, पाटीदार आरक्षण की मांग को लेकर उन्होंने जो आंदोलन खड़ा किया, उसने गुजरात के ही नहीं, देश के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों को चौंका दिया। उस आंदोलन के समय हार्दिक की लोकप्रियता चरम पर थी, लेकिन उनके चुनाव लड़ने की उम्र नहीं हुई थी। ना ही वो ये मानने के लिए तैयार थे कि उनकी मुहिम का कोई राजनीतिक मकसद है। लेकिन, महज दो साल के भीतर ही उनके राजनीतिक मकसद से पर्दा उठना शुरू हो गया। पाटीदार आंदोलन के उनके बेहद करीबियों ने ही आंदोलन के फंड की हेरफेर के आरोप लगाने शुरू कर दिए। 2017 में विधानसभा चुनाव आते-आते उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगजाहिर होने लगी। उनपर तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से गुपचुप मीटिंग के आरोप भी लगे। खबरें यहां तक उड़ीं कि पाटीदार आंदोलन में अहमदाबाद की रैली में जो उन्होंने 5 लाख से ज्यादा की भीड़ जुटाई थी, उसके पीछे विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया का भी रोल था, जो मोदी से अपनी सियासी हिसाब चुकता करना चाहते थे।

गुजरात विधानसभा चुनाव में हार्दिक का असर
गुजरात विधानसभा के दौरान भी सीधे राजनीतिक मैदान में उतरने की उनकी उम्र नहीं हुई थी। लेकिन, उन्होंने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कांग्रेस के लिए काम किया। पाटीदार युवाओं के एक वर्ग में उनका प्रभाव निश्चित रूप से महसूस किया गया। चुनाव परिणाम पर इसका असर भी माना गया। लगातार 6 बार राज्य की सत्ता में बीजेपी की वापसी तो हुई, लेकिन उसे दो अंकों में पहुंचने के लिए भी बड़ा संघर्ष करना पड़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 60.11% था, जो घटकर 2017 के विधानसभा चुनाव में महज 49.05% रह गया। वहीं कांग्रेस का वोट शेयर 33.45% से बढ़कर 41.44% तक पहुंच गया। असेंबली की 182 सीटों में से बीजेपी को 99 और कांग्रेस को 77 सीटें मिलीं। जबकि, कहा जाता है कि ये आंकड़ा भी तब आया जब प्रधानमंत्री मोदी ने प्रचार में पूरा जोर लगा दिया। गौरतलब है कि आम चुनाव में मोदी लहर के चलते गुजरात में बीजेपी ने 26 की 26 सीटें अपने नाम कर ली थी।

पाटीदार की नई राजनीति का असर
गुजरात की 52 सीटों पर पाटीदार मतदाताओं की संख्या 20% से ज्यादा है। 2012 के चुनाव में बीजेपी ने इनमें से 36 और कांग्रेस ने 14 सीटें जीती थीं। लेकिन, 2017 में बीजेपी की सीट घटकर 28 रह गई, जबकि, कांग्रेस 23 पर पहुंच गई। लेकिन, इसका एक विपरीत असर भी पड़ा। पाटीदार दबदबे से परेशान जातियां पाटीदारों के खिलाफ गोलबंद हो गईं और पाटीदार विधायकों की संख्या 2012 के 47 से घटकर 2017 में 44 ही रह गई। यही नहीं, पाटीदारों के एक वर्ग की नाराजगी के बावजूद बीजेपी सत्ता में वापस हुई, जबकि मोदी ने पाटीदार आंदोलन के बाद पाटीदार मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल को हटाकर एक गैर-पाटीदार विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाया था और उन्हीं के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरी थी।

गुजरात में पाटीदार राजनीति का इतिहास
बुजुर्ग पाटीदार जो कि परंपरागत तौर पर कांग्रेस विरोधी रहे हैं, उन्हें हार्दिक की राजनीति शायद अंदर ही अंदर रास नहीं आ रही है। इसके पीछे 1985 का वह कांग्रेसी फॉर्मूला है, (क्षत्रिय,हरिजन,आदिवासी-मुस्लिम या KHAM) जिसने 2017 से पहले तक आमतौर पर पाटीदारों को कांग्रेस से दूर ही रखा था। सूरत और मेहसाणा जैसे पाटीदार प्रभाव वाले क्षेत्र में बीजेपी की जीत से साफ नजर आता है कि पाटीदारों के हर वर्ग में हार्दिक की पैठ अभी भी नहीं है। पाटीदार आंदोलन समर्थित कई उम्मीदवारों का उनके गढ़ में हार जाना भी यही संकेत देता है। सबसे बड़ी बात कि अगर हार्दिक जामनगर से सीधे कांग्रेस के उम्मीदवार बनते हैं, तो क्या वो पाटीदारों के हर वर्ग को राहुल गांधी के समर्थन के लिए तैयार कर पाएंगे?

मोदी और गुजराती अस्मिता पर प्रभाव
पाटीदारों के लिए राष्ट्र और राज्य की अस्मिता हमेशा ही अहम रहा है। आमतौर पर यह समाज समृद्ध, शक्तिशाली और घोर राष्ट्रवादी है। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस का मुस्लिमों के पक्ष में झुकाव ही पाटीदारों को कांग्रेस से अबतक दूर रखा था। इस लिहाज से पाटीदारों को राजनीतिक रूप से बीजेपी ज्यादा सहज लगती है। सबसे बड़ी बात कि 18 साल में नरेंद्र मोदी का जो राजनीतिक वजूद बना है, वह राज्य के लोगों के लिए जात-पात से ऊपर गुजराती अस्मिता से जुड़ चुका है। वे राष्ट्रवादी तो हैं ही, पटेलों के सभी बड़े नेताओं से उनके बहुत ही अच्चे ताल्लुकात रहे हैं। सरदार पटेल की सबसे बड़ी प्रतिमा बनाकर नरेंद्र मोदी ने जो मैसेज देने की कोशिश की है, वह भी राष्ट्र की अस्मिता से जुड़ा है। जबकि, वो सरदार पटेल के लिए कांग्रेस नेतृत्व की उपेक्षा को उजागर करने में भी कहीं न कहीं सफल रहे हैं। खास बात ये है कि यह चुनाव देश का प्रधानमंत्री चुनने जा रहा है और हार्दिक पटेल उसके दावेदार नहीं हैं। लिहाजा अगर पाटीदारों को हार्दिक या नरेंद्र मोदी में से एक को चुनना होगा, तो उनके पास विकल्प सीमित होगा। लेकिन, फिर भी हार्दिक के सहारे राहुल, मोदी के रथ की रफ्तार को धीमा करने की कोशिश तो कर रही सकते हैं।
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