मोदी के आयुष्मान भारत में आख़िर कितना दम
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना-आयुष्मान भारत की शुरुआत की.
इस अवसर पर पीएम ने कहा कि इस योजना की शुरुआत ग़रीबों में गरीब और समाज के वंचित वर्गों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा और उपचार प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया है.
इस योजना के तहत हर साल प्रति परिवार को 5 लाख रुपए के स्वास्थ्य बीमा की बात की गई है.
सरकार का दावा है कि इससे 10 करोड़ परिवार यानी 50 करोड़ से अधिक लोगों को फायदा होगा.
पीएम के अनुसार 5 लाख की राशि में सभी जांच, दवा, अस्पताल में भर्ती के खर्च शामिल होंगे. इसमें कैंसर और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों सहित 1300 बीमारियां शामिल होंगी.
https://twitter.com/narendramodi/status/1043822135192379392
आयुष्मान भारत कार्यक्रम के ज़रिए क्या मोदी सरकार करोड़ों के हेल्थ इंश्योरेंस करा पाएगी? जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केंद्रों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है वहां इसका कितना फ़ायदा निजी अस्पतालों को मिल सकता है? इन सभी मुद्दों पर अर्थशात्री ज्यां द्रेज से बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने बात की. पढ़िए-
मुझे लगता है कि आज प्रधानमंत्री जी पूरे देश को बेवकूफ़ बना रहे हैं.
सबसे पहली बात है कि प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि अब 10 करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपए तक का स्वास्थ्य बीमा मिलेगा, लेकिन इसके लिए उन्होंने अब तक एक नया पैसा भी आवंटित नहीं किया है.
इस आयुष्मान भारत के लिए इस साल का बजट है 2,000 करोड़. 2,000 करोड़ में से क़रीब-क़रीब 1,000 करोड़ राष्ट्रीय स्वस्थ्य बीमा योजना का पैसा है जो पहले भी था और अब भी है.
और बाक़ी जो 1,000 करोड़ है वो कथित तौर पर हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के लिए रखा गया है, यानी लगभग 80,000 रुपए प्रति सेंटर. आप समझ सकते हैं कि इतने में कितना काम हो सकता है.
प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुसार अगले चार सालों में सरकार इस योजना के अनुसार डेढ़ लाख स्वास्थ्य केंद्र खोलने जा रही है.
इसका मतलब है कि जो पुराने पीएसी, सीएचसी और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र थे उनके नाम बदल कर उन्हें हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर बता कर कह रहे हैं कि देढ़ लाख सेंटर बनाएंगे.
ये बिल्कुल पब्लिक रिलेशन्स है. अभी तक एक नया पैसा स्वास्थ्य बीमा के लिए नहीं है. मेरे हिसाब से जब तक आपने एक लाख करोड़ रुपए आवंटित नहीं किया है, 10 करोड़ परिवारों का स्वास्थ्य बीमा नहीं हो सकता है.
- इलाज को तरसते भारतीयों के लिए क्या हैं 'मोदीकेयर’ के मायने
- गोरखपुर में बच्चों की मौत पर विदेशी मीडिया
- मोहल्ला क्लीनिक: किस हाल में है आम आदमी पार्टी का ड्रीम प्रोजेक्ट
मोदी ने घोषणा करते हुए कहा कि "इस योजना के तहत प्रति वर्ष प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपये के स्वास्थ्य बीमा की कल्पना की गई है और यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है."
नहीं ये संभव नहीं है. मान लीजिए अगर पांच लाख लोग इसके एक प्रतिशत का इस्तेमाल कर लेते हैं, यानी पांच हज़ार रुपए का- तो 10 करोड़ परिवारों के लिए आपको 50,000 करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी होगी.
इसलिए मैं कहता हूं कि पहले सरकार पैसा दिखाए फिर हम हेल्थ केयर की बात करेंगे.
दूसरी बात ये कि 'सभी को स्वास्थ्य सेवा' के लिए सोशल इंश्योरेंस का मॉडल काम में आ सकता है. लेकिन इसके लिए सबसे पहले गांव और कस्बों में मौजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मज़बूत करना है. नहीं तो लोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र छोड़ कर सीधा निजी अस्पताल का रुख़ करेंगे और वहां स्वास्थ्य बीमा के ऊपर निर्भर रहेंगे.
निजी अस्पतालों में कितना खर्च होता है आप समझ सकते हैं. इससे स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च तो बढ़ेगा, लेकिन स्वास्थ्य सेवा के मानकों में बहुत अधिक सुधार नहीं होगा.
इसीलिए मूलभूत सुविधाओं में सुधार किया जाना बेहद ज़रूरी है. इसे गेटकीपिंग कहा जाता है.
इसका मतलब है कि पहले लोग अपने स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केंद्र जाएं और वहां अपनी बीमारी के बारे में पता करने के बाद रेफरेल होने पर ही बड़े सरकारी अस्पताल या निजी अस्पताल का रुख़ करें और वहां अपने बीमे का इस्तेमाल करें.
गेटकीपिंग के काम में लगी व्यवस्था को मज़बूत करना सबसे ज़रूरी काम है.
ओडीशा, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारतीय राज्यों में स्वास्थ्य केंद्रों की हालत काफी सुधरी है, लेकिन इनमें अभी और सुधार की ज़रूरत है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की जो क्षमता है उसका अब तक पूरा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.
ऑल इंडिया एम्बुलेंस सेवा 108 के बारे में लोग जानने लगे हैं. कई राज्यों में अब मुफ़्त दवाइयां भी दी जा रही हैं, ये अच्छी शुरुआत है. हालांकि डॉक्टरों की उपस्थिति अब भी एक चुनौती बनी हुई है, लेकिन इसको सुधारना बहुत मुश्किल नहीं है. उपस्थिति पर निगरानी करने के तरीक़े लागू किए जा सकते हैं.
मेरा मानना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत में सुधार करने के बाद धीरे-धीरे सोशल इंश्योरेंस की तरफ़ बढ़ना चाहिए.
डिजिटल इंडिया के नाम पर कई तरह की नई तकनीकें लाई जा रही हैं जो कभी-कभी मदद कर सकते हैं, लेकिन ये कभी-कभी नुकसान भी कर देते हैं.
मेरी समझ में आयुष्मान भारत की सच्चाई ये है कि स्वास्थ्य सेवा के बहाने लोगों का स्वास्थ्य संबंधी डेटा इकट्ठा करने की कोशिश हो रही है. इसे आईटी सेक्टर के लोग पब्लिक डेटा प्लेटफॉर्म कहते हैं.
2000 करोड़ के खर्चे कर के 50 करोड़ लोगों का डेटा सरकार के पास होगा और आप जानते हैं कि आजकल डेटा जमा करके कितनी कमाई हो सकती है.
मुझे फ़िलहाल ये स्वास्थ्य योजना कम और बड़े पैमाने पर किया जा रहा डेटा कलेक्शन का काम लग रहा है.
लेकिन सरकार ने ऐसा कुछ नहीं कहा है?
आयुष्मान भारत के नाम पर जो दस्तावेज़ सबसे पहले सामने आया वो था नेशनल हेल्थ स्टैक. हालांकि ये कंसल्टेशन पेपर है, लेकिन नीति आयोग के इस दस्तावेज़ को देखें तो इसमें केवल डेटा और आईटी और डेटा कलेक्शन की बात की गई है.
इस दस्तावेज़ देखें तो आपको पता चलेगा कि ये स्वास्थ्य सेवा कम और डेटा प्लेटफॉर्म बनाने का काम अधिक है.
सरकार का कहना है कि निजी अस्पताल भी इस योजना का हिस्सा होंगे. क्या इसका मतलब ये होगा कि जो बीमा सरकार अपने खजाने से करने वाली है उसका एक हिस्सा उनके पास भी जा सकता है.
निजी अस्पतालों को तो फ़ायदा होगा. मैं पढ़ रहा था कि निजी अस्पताल आयुष्मान भारत में जिस तरह हर तरह के इलाज या ऑपरेशन की क़ीमत रखी गई है उससे वो ख़ुश नहीं हैं. उनका कहना है कि ये काफ़ी कम है और इस कारण उन्हें कमाने का मौक़ा कम मिलेगा.
अगर उनकी क़ीमतें कवर नहीं होंगी तो वो इसमें शामिल नहीं होंगे. जो अस्पताल शामिल हो रहे हैं वो वहीं हैं जिन्हें लगता है कि वो इस रेट पर काम कर सकते हैं और थोड़ा मुनाफ़ा बना सकते हैं.
लेकिन अस्पताल ये भी कोशिश करेंगे कि वो और भी सस्ते में काम करें ताकि वो अपना थोड़ा प्रॉफिट बना सकें. इसका सीधा असर इलाज के स्टैंडर्ड पर पड़ेगा.
इसे सख्त निगरानी के ज़रिए रोका जा सकता है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर ऐसा कर पाना संभव नहीं है.












Click it and Unblock the Notifications