कैसे कांग्रेस के लिए कन्हैया कुमार बन गए हैं चुनौती, एडजस्ट करना हो रहा है मुश्किल ?
कन्हैया कुमार को कांग्रेस में शामिल हुए दो साल गुजर चुके हैं, लेकिन पार्टी उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं सौंप सकी है। अब उन्हें दिल्ली का प्रदेश अध्यक्ष बनाने की चर्चा है, लेकिन यह काम भी आसान नहीं लग रहा है।

कांग्रेस में ऐसी चर्चा है कि जेएनयू छात्र संघ के पूर्व नेता कन्हैया कुमार को दिल्ली में पार्टी की कमान सौंपी जा सकती है। कन्हैया को पहले बिहार में जगह दी गई है, लेकिन अबतक आंतरिक मतभेदों के चलते वहां वे पूरी तरह से नेतागीरी में सेट नहीं हो पा रहे हैं, कम से कम उस रोल में नजर तो नहीं ही आ रहे हैं। लेकिन, अब पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि शीला दीक्षित भी यूपी से दिल्ली आकर पार्टी को लगातार 15 वर्षों तक सत्ता का स्वाद पहुंचा चुकी हैं, तो कन्हैया कुमार को भी मौका दिया जा सकता है। इसके अलावा उन्हें युवा कांग्रेस की जिम्मेदारी सौंपने की भी सुगबुगाहट है। लेकिन, पार्टी में इसको लेकर भी मतभेद नजर आ रहा है।

कन्हैया को दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की चर्चा
ठेठ कम्युनिस्ट विचारधारा को छोड़कर कांग्रेस में आए कन्हैया कुमार पार्टी के लिए एक चुनौती बन चुके हैं। वह राहुल गांधी की पसंद हैं, इसलिए कांग्रेस में उन्हें किस अच्छी पोजिशन पर फिट किया जाए, इसको लेकर दो साल से कवायद ही चल रही है। अब खबरें हैं कि पार्टी नेतृत्व उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस (DPCC) या भारतीय युवा कांग्रेस (IYC) अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपने पर विचार कर रहा है। लेकिन, पार्टी नेताओं के एक वर्ग में इसको लेकर बेचैनी दिख रही है। ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया है कि ये नेता कन्हैया कुमार को 'राजनीतिक और वैचारिक रूप से बाहरी' समझते हैं।

सीपीआई से कांग्रेस में हुए हैं शामिल
कन्हैया कुमार जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन के विवादित नेता रहे हैं। 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' वाले विवाद के बाद वह सीधे छात्र राजनीति से सीपीआई में शामिल होकर मुख्यधारा की राजनीति में आ गए थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार के बेगूसराय से उन्होंने केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के खिलाफ चुनाव भी लड़ा। जेएनयू विवाद के दौरान उन्हें समाज और राजनीति के जिन वर्गों का समर्थन मिला था, वह तमाम लोग उनके प्रचार अभियान में भी उतरे, लेकिन कन्हैया भाजपा के वरिष्ठ नेता से भारी अंतर से पीछे छूट गए। राहुल गांधी से नजदीकियों के चलते 2021 में वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए।

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बिहार में नहीं जमा पाए हैं प्रभाव
लेकिन, बिहार प्रदेश कांग्रेस में उन्हें कभी भी वह प्रभाव हासिल नहीं पाया, जिसकी उम्मीद में उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा को छोड़ने का फैसला किया था। प्रदेश के कांग्रेस नेता उन्हें कोई बड़ा रोल देने के विरोधी रहे हैं। राजनीति के जानकार मानते हैं कि बिहार में कन्हैया को कांग्रेस में कोई महत्वपूर्ण पद देने का विरोध सिर्फ कांग्रेसी ही नहीं करते हैं। सत्ताधारी महागठबंधन में पार्टी की बड़ी सहयोगी आरजेडी भी नहीं चाहती कि प्रदेश में कन्हैया को कांग्रेस से बड़े नेता के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाए। क्योंकि, लालू यादव अपने छोटे बेटे और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को आगे की राजनीति के लिए पूरी तरह से फिट करने में जुटे हुए हैं।

कांग्रेस में इस वजह से की जा रही है शीला दीक्षित से तुलना
शायद यही वजह है कि कांग्रेस अब जेएनयू के पूर्व छात्र नेता को दिल्ली की राजनीति में सेट करने की तैयारी में है। पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि वह राजनधानी की राजनीति में कांग्रेस के लिए 'मास्टरस्ट्रोक' साबित हो सकते हैं। इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत शीला दीक्षित का उदाहरण भी दिया जा रहा है, जिन्हें 'यूपी से दिल्ली' लाना पार्टी के लिए 'फायदे का सौदा' साबित हुआ था। कन्हैया अभी 36 साल के ही हैं, इसलिए उन्हें भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर सेट करने की भी चर्चा चल रही है। इसके पीछे दलील ये है कि 42 वर्षीय श्रीनिवास बीवी का इस पद पर चार साल पूरा होने वाला है।

शीला दीक्षित वाले तर्क का भी विरोध
लेकिन, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी से लेकर भारतीय युवा कांग्रेस में कई ऐसे नेता हैं, जो इन विचारों से प्रभावित नहीं हो रहे हैं। दिल्ली कांग्रेस के एक पदाधिकारी ने नाम नहीं जाहिर होने देने की शर्त पर कहा है कि 'एक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख बनने के लिए कुमार कांग्रेस में बहुत ही ज्यादा नए हैं। और जो शीला जी का तर्क दे रहे हैं कि वह भी दिल्ली कांग्रेस में बाहर से थीं, वह गलत हैं, क्योंकि वह शुरुआत से कांग्रेस की नेता थीं।' ठीक इसी तरह भारतीय युवा कांग्रेस के अधिकतर नेताओं का भी नजरिया यही है। क्योंकि,उनका मानना है कि उनका संगठन तो वामपंथियों और भगवा संगठनों के खिलाफ ही लड़ रहा है।












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