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अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने गठित किया पैनल, जानिए मध्यस्थता कैसे काम करती है?

नई दिल्ली। अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मध्यस्थता के जरिए इस मसले को सुलझाने का आदेश दिया है। आज आया फैसला कई मायनों में अहम है क्योंकि इस बातचीत कोर्ट की निगरानी में होगी। बातचीत के लिए एक समिति का गठन किया गया है। जिसके अध्यक्ष जस्टिस मोहम्मद इब्राहिम खलीफुल्ला हैं। इसके अलावा धार्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू मध्यस्थता समिति में शामिल हैं। लेकिन आइए जानते हैं किमध्यस्थता काम कैसे करती है।

भारत में मध्यस्थता का क्या है कानून?

भारत में मध्यस्थता का क्या है कानून?

मध्यस्थता के बारे में आपको बता दें कि इसको पहली बार औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में विवाद समाधान की विधि के रूप में कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त हुई। हालांकि बाबरी विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 89 का उल्लेख किया है। जिसने अदालतों को लंबित विवादों को निपटाने के लिए वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) के तरीकों का उल्लेख करने की अनुमति दी है। इसके तहत, पार्टियों की सहमति अनिवार्य कर दी गई और अदालत लोक अदालत, या मध्यस्थता के माध्यम से सुलह, न्यायिक निपटान के लिए मामलों का उल्लेख कर सकती है।

मध्यस्थता प्रक्रिया के चरण

मध्यस्थता प्रक्रिया के चरण

चूंकि मध्यस्थता प्रक्रिया 15 मार्च से शुरू होने वाली है, जस्टिस कलीफुल्ला की अध्यक्षता वाले मध्यस्थों के पैनल को यह सुनिश्चित करना है कि पक्ष और उनके काउंसल्स मध्यस्थता प्रक्रिया के प्रारंभ में मौजूद रहे। इसके बाद मध्यस्थ अपनी योग्यता के साथ एक परिचय देता है, अपनी तटस्थता स्थापित करता है और मध्यस्थता प्रक्रिया में विश्वास को दोहराता है। इसके बाद अपनी तटस्थता स्थापित करता है और मध्यस्थता प्रक्रिया में विश्वास को दोहराता है। इसके बाद मध्यस्थ पार्टियों से अनुरोध करता है कि वे अपना परिचय दें। इसके बाद उनके साथ तालमेल विकसित करने का प्रयास करता है विश्वास हासिल करता है। मध्यस्थता के जरिए हल निकालने के पीछे विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए पक्षों को प्रेरित करना है। इसके बाद प्रक्रिया आगे बढ़ती है और समिति के लोग सभी को सुनते हैं। इसके बाद भी पैनल रिपोर्ट तैयार करता है और फिर किसी निर्णय तक पहुंचा जाता है। मध्यस्थ भी प्रभावी सवाल पूछता है और पार्टियों को उनके मामलों की ताकत और कमजोरियों को समझने में मदद करता है।

अदालतों का सहारा लिए बिना विवादों को हल करने का एक वैकल्पिक तरीका है

अदालतों का सहारा लिए बिना विवादों को हल करने का एक वैकल्पिक तरीका है

आपको बता दें कि जब सुप्रीम की संविधान पीठ ने अयोध्या भूमि विवाद के संभावित समाधान के लिए मध्यस्थता पर विचार किया तो इसमें एक रास्ता दिखा कि पार्टियों के बीच समझौत के जिए हल निकाला जा सकता है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने भी इस बात का प्रयास किया था जब उन्होंने कहा था कि विवाद को सुलझाने के लिए पार्टियां 'कुछ दे, कुछ ले'। मध्यस्थता अदालतों का सहारा लिए बिना विवादों को हल करने का एक वैकल्पिक तरीका है। यह एक संरचित, स्वैच्छिक और इंटरैक्टिव बातचीत प्रक्रिया है।

बंद कमरे में होगी बातचीत

बंद कमरे में होगी बातचीत

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के जरिए इस विवाद का हल निकालने के लिए एक समिति गठित की है। जिसके अध्यक्ष जस्टिस मोहम्मद इब्राहिम खलीफुल्ला हैं। इसके अलावा धार्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू मध्यस्थता समिति में शामिल हैं। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मध्यस्थता के लिए बातचीत फैजाबाद में एक बंद कमरे में होगी और समिति को 4 हफ्ते में प्रगति रिपोर्ट सौंपनी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बातचीत के प्रक्रिया कैमरे के सामने होगी. बातचीत की पूरी प्रक्रिया 8 हफ्ते में पूरी कर ली जाएगी।

यह भी पढ़ें- अयोध्या मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्या बोलीं मायावती

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