प्रियंका गांधी के अयोध्या दौरे से कैसे बदली चुनावी फ़िज़ा

प्रियंका गांधी
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यूं तो प्रियंका गांधी प्रयागराज से वाराणसी चुनाव-प्रचार के दौरान भी कई मंदिरों में गईं, लेकिन अयोध्या को कुछ इस तरह विवादों से बांध दिया गया है कि उनका हनुमान गढ़ी जाना भी इससे अछूता नहीं रहा.

सवाल उठे कि प्रियंका गांधी राम जन्मस्थान क्यों नहीं गईं?

"जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह नहीं गए, तो फिर कांग्रेस से ये सवाल क्यों?" कांग्रेसियों ने ये जवाब, सवाल पूछनेवालों की तरफ़ ही उछाल दिया है.

पर बात महज़ इतनी ही न थी, कांग्रेस महासचिव से संतों के एक धड़े, अखिल भारतीय संत समिति ने न सिर्फ़ राम जन्मभूमि पर पार्टी का रुख़ साफ़ करने को कहा, बल्कि प्रियंका गांधी के हिंदू होने पर ही सवाल खड़े कर दिए.

ख़ैर ये तो बात अयोध्या की है, प्रियंका गांधी की फ़ैज़ाबाद (अब अयोध्या) यात्रा की शुरुआत शुक्रवार दोपहर शहर से तक़रीबन 40 किलोमीटर दूर कुमारगंज से हुई.

धूप की बढ़ती तपिश

प्रियंका गांधी
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रायबरेली से फ़ैज़ाबाद आनेवाली सड़क पर स्थित कुमारगंज में तेज़ धूप के बावजूद स्कूल-कॉलेज के छात्र, युवक, युवतियां, बूढ़े-जवान जमा थे.

कुछ ने हाथों में गेंदे के फूलों की माला ले रखी थी, तो कुछ कांग्रेस के निशान वाली टोपियां पहने थे, तो कुछ की सफ़ेद टी-शर्ट पर 'प्रियंका गांधी यूथ ब्रिगेड' लिखा था.

पास ही प्रियंका गांधी की तस्वीर वाला एक बड़ा सा बैनर लगा था, "अयोध्या तैयार, कांग्रेस इस बार."

फ़ैज़ाबाद संसदीय सीट 1977 तक कांग्रेस की मज़बूत सीटों में से एक रही, लेकिन फिर हालात बदले और 1991 के बाद से यहां भारतीय जनता पार्टी चार बार जीत हासिल कर चुकी है. 2009 में हालांकि ये सीट फिर से कांग्रेस के पाले में चली गई थी.

कांग्रेस के फ़ैज़ाबाद से उम्मीदवार निर्मल खत्री हैं. निर्मल के बेटे अभिषेक खत्री कहते हैं, "हाल के सालों में यहां कोई भी उम्मीदवार दो बार लगातार जीत हासिल नहीं कर पाया है."

निर्मल खत्री का मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा सांसद लल्लू सिंह और समाजवादी पार्टी के आनंद सेन से है.

ये शायद जीत की उम्मीद है या प्रियंका गांधी के स्वागत की ज़बरदस्त तैयारियां कि फ़ैज़ाबाद शहर से कुमारगंज तक रास्ते भर हाथ के निशानवाली झंडिया रस्सियों में एक घर से दूसरे घर तक टंगी नज़र आती हैं और झंडे लहराते दिखते हैं.

कमल निशान वाले भगवा झंडे शहर से कोसों दूर इनायत नगर की एक छत पर लगे दिखते हैं, वो भी महज़ तीन.

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डेढ़ घंटे की देरी से पहुंचीं प्रियंका

इन्हीं रंगों के बीच प्रियंका गांधी की गाड़ियों का क़ाफ़िला कुमारगंज पहुंचता है, लगभग डेढ़ घंटे की देरी से.

इसलिए उनके पास वक़्त होता है महज़ अपनी गाड़ी से एक बार कुछ मिनटों के लिए उतरने का और फिर टाटा सफ़ारी के पायदान पर खड़े होकर लोगों की तरफ़ हाथ हिलाने का.

क़ाफ़िला अगले पड़ाव की तरफ़ बढ़ जाता है कुछ इस तेज़ी से कि कुमारगंज से थोड़ी दूर आगे एक शामियाने के नीचे कुर्सियों पर बैठे लोग इंतज़ार ही करते रह जाते हैं और उनका कैवल्केड आगे को बढ़ जाता है.

वहां मौजूद एक बुज़ुर्ग बुरी तरह बिगड़ जाते हैं. वे स्थानीय भाषा में किसी अश्लील शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहते हैं, "अइह अब भोट मांगे .."

इससे पहले जोरियम गांव के बृजकिशोर तिवारी का भी कहना था कि प्रियंका गांधी का ये शो तमाशा से ज़्यादा कुछ नहीं, इसलिए वोट इस बार भी लोग मोदी को ही देंगे.

इस रोड-शो में प्रियंका गांधी नुक्कड़ सभाएं कर रही हैं, लोगों से गांव में जाकर मिल रही हैं, चौपाल आयोजित हो रहे हैं. शुक्रवार को उन्होंने पूरे अटका गांव में एक अनुसूचित जाति के लोगों के साथ चौपाल आयोजित की.

दलितों से प्रियंका गांधी की मुलाक़ात को बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती कैसे देखेंगी यह एक सवाल होगा.

मायावती ने हाल ही में प्रियंका गांधी के सहारनपुर के एक अस्पताल में जाकर भीम आर्मी के घायल हो गए नेता चंद्रशेखर से मिलने पर ख़ुशी नहीं जताई थीं.

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औरतों का भरोसा

कहा जा रहा है कि प्रियंका गांधी की ये यात्रा कांग्रेस के मिशन-30 का हिस्सा है और वो इन यात्राओं और रोड-शो के ज़रिये फ़ैज़ाबाद, बहराइच, गोंडा, बाराबंकी और दूसरी उन सीटों पर फिर से जीत हासिल करना चाहती हैं जो 2009 में उसके पास थीं.

बलिया से सभा में शामिल होने आए पार्टी कार्यकर्ता रंजीव श्रीवास्तव कहते हैं, प्रियंका जी के आने से कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा है और हम इसके बल पर जीत हासिल करेंगे.

प्रियंका के त्रिवेणीगंज सभा में पहुंचते ही, प्रियंका गांधी ज़िंदाबाद, कांग्रेस ज़िंदाबाद का नारा बुलंद होता है, और ब्लैक कैट कमांडोज़ भीड़ को कांग्रेस महासचिव से दूर रखने की नाकाम कोशिश में लग जाते हैं.

'प्यारी बहनों'.... से शुरुआत होती है, उनके भाषण की, और कहा जाता है कि वो भाषणबाज़ी में यक़ीन नहीं करती, वैसे भी लोग पांच सालों में बहुत भाषण सुन चुके हैं, और एक बार ही 'चौकीदार चोर है' का नारा हर तरफ़ से लोग बार-बार दोहराने लगते हैं.

कांग्रेस की न्यूनतम आय गारंटी स्कीम- जिसमें देश की 20 फ़ीसदी ग़रीब जनता को 72 हज़ार रुपये सालाना देने का वादा किया है, की बात सुनते ही प्रियंका गांधी-राहुल गांधी ज़िंदाबाद का नारा फिर से लगने लगता है.

जिस पर प्रियंका कहती हैं, ''ओहो'' और उनकी मुठ्ठियां उनकी कमर से जाकर लग जाती है, कलाई पर बड़े डायल की घड़ी बंधी है.

लोगों से शिकायत के लहजे में वो कहती हैं कि आपको 56 इंच को सबक़ सिखाना है, सब नेताओं को सबक़ सिखाना है कि जनता सबसे ताक़तवर है.

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भाषण ख़त्म कर प्रियंका गांधी अगली सभा के लिए निकल जाती हैं.

वहां रखी कुर्सियों पर हमें गांव गंगा प्रसाद दुबे का पुरवा की तीन औरतें जानकी, सुनीता और कमलेश मिलती हैं जो हमसे कहती हैं कि प्रियंका जी जो बोली हैं उसपर उन्हें भरोसा है, उन लोगों के यहां न तो शौचालय बनवाया गया है न ही उन्हें घर बनाने को पैसे मिले हैं, बावजूद इसके कि वो एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के पास चक्कर लगा चुकी हैं.

कमलेश थोड़ा गंभीर होकर बोलती हैं, बिजली तो क्या हमरे गांव में पोल तक नहीं लगा, आप हर गांव में बिजली लगने की बात कर रहे हैं.

कादीपुर नौवाकुंआ के विजय नारायण पाठक को शिकायत है कि आवारा पशु लोगों की खड़ी फ़सल चर ले रहे हैं, तो वो बच्चों को क्या ठूंठ खिलाएंगे?

वही बात जिसका दावा प्रियंका गांधी थोड़ी देर पहले मंच से कर रही थीं कि हालात ये हो गए हैं कि आवारा पशुओं के डर से औरतें दिन में और मर्द रात में चौबीस-चौबीस घंटे पहरा दे रहे हैं.

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