चंद्रयान-3 लैंडिंग: वो पांच बदलाव जिनके चलते ISRO को मिली कामयाबी, भारत ने रच दिया इतिहास
भारत की स्पेस एजेंसी इसरो द्वारा चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर सफलतापूर्वक लैंडिंग होने के बाद देश में उत्साह का माहौल है। विश्व के कोने कोने से हमारे वैज्ञानिकों को बधाई मिल रही है। हमारे वैज्ञानिकों ने दिखा कि अमेरिका, रूस और ब्रिटेन से भी हम आगे जा सकते हैं। उन्होंने बता दिया कि भारतीय वैज्ञानिक किसी से भी कम नहीं हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि हम असफलता से भागते नहीं बल्कि उसका डटकर सामना करते हैं और फिर अपनी कामयाबी का झंडा बुलंद करते हैं।
तो चलिए आज हम आपलोगों को बताएंगे कि आखिर वैज्ञानिकों चंद्रयान-2 की असफल लैंडिंग के बाद चंद्रयान-3 मिशन में क्या सब बदलाव किया। आखिर वे कौन से 5 बदलाव किए गए जिससे इसरो को इतने बड़े मिशन में सफलता हाथ लग गई। तो चलिए आज हमलोग इन्हीं 5 बदलावों के बारे में चर्चा करेंगे जिससे चंद्रयान-3 चंद्रमा पर सफलतापूर्वक लैंडिंग कर सका। नीचे पढ़ें पूरी खबर...

चंद्रयान-3 में नहीं लगाया गया ऑर्बिटर
चंद्रयान-2 के समान चंद्रयान-3 में एक लैंडर और एक रोवर तो है लेकिन इसमें ऑर्बिटर नहीं है। यानी कि बिना ऑर्बिटर के ही इसे लॉन्च किया गया। ऑर्बिटर (Orbiter) ग्रह या उपग्रह के चारों तरफ चक्कर लगाते हुए उससे संबंधित जानकारियां अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुंचाता है।
लैंडर में पांच की जगह चार इंजन लगाए गए
चंद्रयान-2 के लैंडर में पांच इंजन लगे थे जबकि इस बार इसका वजन कम करने के लिए चंद्रयान-3 में चार इंजन लगाए गए हैं। चंद्रयान-3 में लेजर डॉपलर वेलोसिमिट्री के साथ चार इंजन लगाए गए जिसका उद्देश्य था कि वह चंद्रमा पर उतरने के सभी चरणों में अपनी ऊंचाई और अभिविन्यास को नियंत्रित कर सके।
लैंडर के लेग्स पहले के मजबूत बनाए गए
चंद्रयान-3 में किसी भी प्रतिकूल प्रभाव से निपटने के लिए इसके लैग्स को मजबूत किया गया। इसके साथ अधिक उपकरण, अपडेटेड सॉफ्टवेयर और एक बड़ा ईंधन टैंक लगाए गए। ऐसा इसलिए किया गया था कि यदि अंतिम मिनट में कोई बदलाव भी करना पड़ा तो ये उपकरण उस स्थिति में अपनी भूमिका निभा सकें।
लैंडिग करने के लिए अधिक क्षेत्रफल वाले जगह को चुना जाएगा
इसरो ने चंद्रयान-2 से सीखते हुए चंद्रयान-3 में व्यापक बदलाव किए। चंद्रयान-2 के उतरने के लिए जितना क्षेत्र निर्धारित किया गया था, उसमें काफी इजाफा किया गया। लैंडिंग के लिए लगभग 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तय किया गया था।
वैकल्पिक लैंडिंग की सुविधा से लैस किया गया
इसरो ने परीक्षण के दौरान यह तय कर लिया था कि अगर लैंडिंग के लिए एक जगह उपयुक्त नहीं होगी तो दूसरी जगह पर लैंड कराई जाएगी। चंद्रयान-3 को टारगेट स्थल से आगे-पीछे ले जाने की व्यवस्था भी की गई थी। एक किलोमीटर के दायरे में उसकी सुरक्षित लैंडिंग हो सके इसका भी खासा ध्यान रखा गया।












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