जानिए क्या हुआ था Chandrayaan-2 के साथ? क्यों हो गया था ये फेल
इसरो ने चंद्रयान-3 के लॉन्च की तैयारी को पूरा कर लिया है और इस ऐतिहासिक लॉन्च पर ना सिर्फ भारत बल्कि दुनिया की निगाह टिकी है। यह मिशन भारत के लिए काफी अहम है। दरअसल चार साल पहले जब चंद्रयान-2 को लॉन्च किया गया था तो यह पूरी तरह से सफल नहीं हो सका था, ऐसे में इसरो के सामने इस बार इस मिशन को सफल बनाने की चुनौती है।
चंद्रयान 2 की बात करें तो तकनीकी गड़बड़ी की वजह से इससे इसरो का संपर्क टूट गया था। ऐसे में यह गलती दोबारा ना हो इसके लिए इसरो ने सफल प्रारंभिक परीक्षण किया है और इसके बाद ही इसे 14 जुलाई को लॉन्च किया जाएगा।

चंद्रयान-2 को 7 सितंबर 2019 को लॉन्च किया या था, लेकिन विक्रम लैंडर में तकनीकी गड़बड़ी के बाद इसका इसरो से संपर्क टूट गया था। जिसकी वजह से लैंडर से किसी भी तरह का संवाद स्थापित नहीं किया जा सका। यह चांद की सतह से महज 400 मीटर पहले ही संपर्क से दूर चला गया।
चंद्रयान-2 का उद्देश्य चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग था। इस लक्ष्य को अभी तक सिर्फ अमेरिका, चीन और रूस हासिल कर सके हैं। लेकिन ट्रांजैक्टरी में बदलाव और रफ्तार में कमी नहीं हो पाने की वजह से लैंडर और रोवर प्रज्ञान चांद की सतह पर क्रैश हो गया, जिसकी वजह से इससे इसरो का संपर्क टूट गया था।
चंद्रयान-2 की विफलता से सबक लेते हुए इसरो ने यह गलती दोबारा ना हो इसके लिए कई जरूरी परीक्षण किए और इसके बाद चंद्रयान 3 को लॉन्च किया जा रहा है। चंद्रयान 3 का लक्ष्य पिछले गलती को सही करने के साथ चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करना है। वैज्ञानिकों ने तकनीकी खराबी को दूर करने के लिए हर संभव प्रयास किए हैं।
चंद्रयान 3 की बात करें तो यह चंद्रयान 2 से दो मायनों में अलग है। पहला यह कि चंद्रयान 3 में रोवर नहीं होगा, इस मिशन का मुख्य लक्ष्य दूसरे पहलुओं की खोज करना है। चंद्रयान 3 में पेलोड होगा जोकि चंद्रयान 2 में नहीं था। पेलोड जिसे स्पेक्ट्रो पोलारिमिट्री ऑफ हैबिटेबल प्लैनेट अर्थ यानि शेप कहते हैं। यह चंद्रमा से धरती की स्पेक्ट्रल और पलोरिमिट्रिक माप करेगा।












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