1000 का नोट बंद कर मोदी ने वाजपेयी सरकार के फैसले पर की चोट

1978 में ही 1000, 5000 और 10,000 रुपए के नोट बंद कर दिए गए थे। 1998 में हाई डिनोमिनेशन नोटों को दोबारा से लाए जाने पर विचार किया गया।

नई दिल्ली। 8 नवंबर की आधी रात के बाद यानी 9 नवंबर से भारत सरकार ने 500 और 1000 रुपए के नोट बंद कर दिए हैं। इससे पहले 1978 में भी अधिक कीमत के नोट यानी हाई डिनोमिनेशन नोट बंद किए गए थे।

atal bihari

1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी थी, तो उसके कुछ महीनों बाद ही तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने नए नोटों की जरूरत का मुद्दा उठाया था।

इससे करीब दो दशक पहले 1978 में ही 1000, 5000 और 10,000 रुपए के नोट बंद कर दिए गए थे, जिसके बाद अर्थव्यवस्था को कुछ रफ्तार भी मिली थी। हालांकि, 1998 में हाई डिनोमिनेशन नोटों को दोबारा से लाए जाने पर विचार किया जा रहा था।

इसके बाद सरकार ने यह फैसला किया कि 1978 में मोरारजी देसाई की सरकार द्वारा नोटबंदी के फैसले को दरकिनार करते हुए दोबारा से 1000 रुपए के नोट जारी किए जाएंगे।

वित्त मंत्री ने कहा था कि 1978 में 1000 रुपए के नोट बंद किए जाने के बाद 1998 में उसकी कीमत काफी कम हो गई थी। उनके अनुसार 1982 को बेस ईयर मानते हुए कंज्यूमर प्राइस इडेक्स के तहत 1978 के 1000 रुपए की कीमत 1998 में महज 160 रुपए रह गई थी।

इसका मतलब था कि लोगों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए हाई डिनोमिनेशन के नोटों की जरूरत थी। जिसके बाद भुगतान के अन्य तरीकों पर भी चर्चा शुरू हुई।

हालांकि, सरकार के इस कदम का विपक्षी पार्टियों ने भी खूब विरोध किया था, जिसके बाद सरकार की तरफ से कुछ डेटा जारी किया गया। यशवंत सिन्हा के अनुसार, 1998 तक लोगों की तरफ से करंसी नोटों को बढ़ाने की मांग काफी बढ़ गई है।

इसके बाद सरकार ने नासिक और देवास की करंसी प्रिंटिंग प्रेस का आधुनिकीकरण किया और दो नई प्रिंटिंग प्रेस मैसूर और सालबोनी में स्थापित कीं। सरकार ने इसके बाद 36 लाख नए नोट भी छापे थे, जिनमें 20 लाख नोट 100 के थे और 16 लाख नोट 500 रुपए के थे।

इसके बाद यशवन्त सिन्हा ने कहा था कि नए नोटों की मांग और पूर्ति में 2004-05 तक एक बड़ा गैप आने की संभावना है, जिसकी वजह से भी 1000 रुपए के नोट छापना सही है ताकि नोटों की पूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

1000 के नोट छापे जाने के नियम को मंजूरी मिलने के बाद सरकार ने रीयल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (आरटीजीएस) और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर (एनईएफटी) पर जोर देना शुरू कर दिया था।

ऐसा नहीं था कि 1998 में ही इस मुद्दे पर बात की गई। 1987 में राजीव गांधी के नेतृत्व में चल रही सरकार ने भी 500 रुपए के नोट छापे थे। 15 साल पहले जब पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने भी बड़े नोटों को वापस लाने पर जोर दिया था, लेकिन उसे मंजूरी नहीं मिली।

जहां एक ओर 70 के दशक में सरकार नोटों की पूर्ति न होने की दिक्कत को झेल रही थी, इसके बावजूद बड़े नोटों को जनवरी 1978 में बंद करने पर जोर दिया गया। इससे दो महीने पहले ही रिजर्व बैंक ने सरकार को नासिक की प्रिंटिंग प्रेस के आधुनिकीकरण का सुझाव दे दिया था।

जब जनता सरकार के समय में वित्त मंत्री एचएम पटेल ने रिजर्व बैंक के गवर्नर आईजी पटेल को बड़े नोटों को बदलने के बारे में कहा था तो खुद गवर्नर ने ही इस कदम का विरोध किया था। उन्होंने वित्त मंत्री से कहा था कि इस तरह के कदम से अर्थव्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं होगा। यह बात आईजी पटेल ने खुद अपनी ऑटोबायोग्राफी में भी लिखी है।

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