विधानसभा का इतिहास: कैसे दो हिस्सों में बंट गया था बंगाल?
कोलकाता। कोलकाता विधानसभा के इतिहास को जानने के लिए हमें 1862 के इतिहास को खंगालना होगा। 18 जनवरी 1862 में भारतीय काउंसिल एक्ट 1861 के तहत 12 सदस्यीय विधानसभा का गठन किया गया था।
ब्रिटिश काल में शुरु हुई थी प्रक्रिया
बंगाल प्रेसीडेंसी में विधानसभा का गठन ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल ने बंगाल के लेफ्टीनेंट गवर्नन के साथ मिलकर की थी। इसमें कुछ नामित सदस्यों को जगह दी गयी थी जिसके बाद धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती गयी। काउंसिल एक्ट 1892 के तहत विधानसभा में अधिकतम 20 सदस्य हो सकती थी।
समय दर समय बढ़ता गया दायरा
इंडियन काउंसिल एक्ट 1909 में इस नंबर को और बढ़ाया गया और सदस्यों की संख्या को भारत सरकार के 1919 एक्ट में इसे बढ़ाकर 50 कर दिया गया। जिसके बाद विधानसभा के सदस्यों में एक बार फिर से इजाफा हुआ और इसे 125 कर दिया गया।
1935 में दो सदनों में बंटा बंगाल
1935 के भारत सरकार के एक्ट में बंगाल को दो सदनों में बांटा गया। जिसमें काउंसिल और विधानसभा शामिल थे। विधानसभा का कार्यकाल पांच साल के लिए कर दिया गया साथ ही इसके सदस्यों की संख्या को 250 कर दिया गया। जबकि काउंसिल के सदस्यों की संख्या को 63 से कम नहीं और 65 से ज्यादा नहीं कर दिया गया। हर तीन साल बाद एक तिहायी सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो
जाता था।
आजादी के बाद दो भागों में बंटा बंगाल
आजादी के बाद बंगाल को पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल में विभाजित कर दिया गया। पश्चिम बंगाल विधानसभा का गठन किया गया जिसमें कुल 90 सदस्य थे, इसमें एंग्लो इंडियन का एक नामित सदस्य भी शामिल था। आजादी के बाद 21 नवंबर 1947 को पहली विधानसभा अस्तित्व में आयी। 5 जून 1952 में विधानसभा का गठन हुआ जिसमें कुल 51 सदस्य थे साथ ही कुल सदस्यों की संख्या 250 कर दी गयी।
1969 में विधान परिषद का हुआ गठन
पहले विधानसभा चुनाव के बाद 18 जून 1952 में नयी विधानसभा का गठन हुआ। 21 मार्च 1969 में पश्चिम बंगाल की परिषद को खत्म कर दिया गया। बाद में भारतीय संसद ने पश्चिम बंगाल को 1969 एक्ट के तहत नयी विधान परिषद जो कि 1 अगस्त 1969 को अस्तित्व में आयी।













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