जानिये कैसे शुरु हुआ केरल विधानसभा का सफर
नई दिल्ली। केरल में विधानसभा की शुरुआत प्रिंसली स्टेट त्रावणकोर 1888 में हुई थी। यह पहली विधानसभा थी जो अग्रेजों को शासन में भारत के बाहर बनी थी। त्रावणकोर की विधानसभा में कई बदलाव हुए हैं, लेकिन लोगों की इसमें भागीदारी बड़ी संख्या में बढी।
जमींदारों और व्यापारियों ने शुरुआत की थी
लोगों की सहभागिता और प्रदेश के बढ़ते दायरे की वजह से इस विधानसभा का विस्तार किया गया। इसके बाद श्रीमूलम त्रावणकोर विधानसभा का विस्तार हुआ। यह मुख्य रूप से जमींदार और व्यापारियों की थी। इसका मुख्य उद्देश्य था कि लोगों की जरूरतों को सरकार तक पहुंचाना।
इसके साथ ही लोगों की समस्याओं, शिकायतों को सरकार तक पहुंचाने का काम इसके जरिए शुरु हुआ। 1 अक्टूबर 1904 में आखिरकार लोगों की राजनीति में बढ़ती समझ, आंदोलन के बाद इसे विधानसभा का स्वरूप दिया गया। इसी दिन रिजोल्यूशन पास हुआ कि इसमें सदस्यों का चयन चुनाव के माध्यम से किया जाएगा।
ग्रेजुएट होना था अनिवार्य
इस विधानसभा में कुल 100 सदस्य थे जिनमें से 77 चुनाव के जरिए आये जबकि 23 लोगों को नामित किया गया। इनका कार्यकाल एक वर्ष का था। जिन लोगों ने हर साल अपनी जमीन का कर 50 रुपए बैंक खाते में जमा किये थे उन्हें वोट देने का अधिकार दिया गया।
सदस्यो के लिए अर्हता रखी गयी कि उनकी 2000 से अधिक नहीं होनी चाहिए और उन्हें ग्रेजुएट होना अनिवार्य था। यही नहीं ग्रेजुएशन किये 10 साल से अधिक नहीं हुए हो और उनका घर संबंधित तालुका में होना चाहिए। हर वर्ष सदस्यं की संख्या में इजाफो होता गया। 1921 में चुने गये सदस्यों ककी संख्या में इजाफा हुआ और सदन में 50 सदस्य हो गये जिनमें 28 को चुनाव के द्वारा चुना गया जबकि बाकी को नामांकित किया गया।
कोचीन और मद्रास को भी मिला प्रतिनिधित्व
1925 में कोचीन में भी विधानसभा का गठन हुआ, जिसमें 30 लोगों को चुना गया जिसमें 15 नामांकित सदस्य थे। मद्रास के मालाबार जोकि अंग्रेजों के शासन में थी वहां से भी प्रतिनिधित्व कोचीन में था।
भारत की आजादी के बाद कोचीन और त्रावणकोर में सरकारें बनीं। 1949 में त्रावणकोर और कोचीन विधानसभा का आपस में विलय हो गया। इस विधानसभा में कुल 178 सदस्य थे।
1956 में केरल का भाषा के आधार पर निर्माण हुआ जिसमें त्रावणकोर और कोचीन का विलय किया गया।
आजादी के बाद हुआ केरल विधानसभा का गठन
पहला आम चुनाव केरल में 1957 में हुआ था। 5 अप्रैल 1975 में यहां पहली विधानसभा बनी जिसमें 127 सदस्य थे। बाद में मालापुरम और कासरगोद को भी इसमे मिलाया गया और सदस्यों की कुल संख्या 2010 में 140 पहुंच गयी।
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