हाल-ए-हिन्दी, दो शुद्ध नहीं लिख पाया हिन्दी का एमए
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) राजधानी दिल्ली में त्रिनगर के एक स्कूल में हिंदी अध्यापक के इंटरव्यू के दौरान प्रिंसिपल ने एक कैंडिडेट से दो शब्द लिखवाए। आप इन शब्दों को फोटो में देखिए।
ताज्जुब की बात
ताज्जुब की बात यह है कि ये शब्द लिखने वाला कैंडिडेट हिंदी में एमए है। यह शिक्षा के मौजूदा स्तर की बानगी है। इस दयनीय हालत के लिए स्कूल की प्रिंसिपल सरकार और अभिभावकों को जिम्मेदार मानती हैं। बच्चों को कहां पढ़ाना है, यह देखना अभिभावकों का काम है। वो अपने बच्चों को शिक्षा की दुकानों में क्यों भेजते हैं।
फैलती दुकानें
उधर, सरकार कुकुरमुत्ते की तरह फैल रही इन दुकानों पर अंकुश क्यों नहीं लगाती है। वरिष्ठ हिन्दी पत्रकार उमेश जोशी कहते हैं कि हालात यही रहे तो जल्द ही वो दिन आ जाएंगे कि किसी को भी ये पता नहीं होगा कि कौन सा शब्द शुद्ध है और कौन सा अशुद्ध।
कई बार तो लगातार अशुद्ध शब्द पढ़ते-पढ़ते खुद का आत्मविश्वास भी डगमगाने लगता है और लगने लगता है कहीं मैं ही गलत तो नहीं हूँ। ऊपर लिखे दोनों शब्द पहली नज़र में ठीक-ठाक लगते हैं मगर कहाँ बिंदी छूटी और आ की मात्रा पर ई की मात्रा कैसे लगी ये पता लगाना भी मुश्किल लगने लगा है।













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