प्रेमचंद-निराला के उत्तर प्रदेश में नहीं रहा हिन्दी पढ़ना जरूरी

नई दिल्ली( विवेक शुक्ला) क्या हिन्दी का संबंध किसी धर्म से है? अगर हिन्दी उत्तर प्रदेश के बच्चों के लिए पढ़ने के स्तर पर अनिवार्य नहीं होगी तो कहा के लिए होगी। उत्तर प्रदेश और हिन्दी का चोली दामन का साथ है। ये बड़ा सवाल हैं। पर, अब उत्तर प्रदेश के मदरसों में हिन्दी की पढ़ाई जरूरी नहीं होगी।

पर अंग्रेजी जरूरी

जरा सोचिए कि प्रेमचंद और निराला के प्रदेश में हिन्दी स्वैच्छिक विषय के रूप में पढ़ाई जाएगी। हां, उत्तर प्रदेश के मदरसों के बच्चों के लिए अंग्रेजी पढ़ना अनिवार्य होगा। यानी हिन्दी से बढ़कर अंग्रेजी।

हिन्दी विरोधी

उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड ने अपने एक फैसले में हिन्दी की पढ़ाई को अनिवार्य विषय से हटा दिया है। बड़ा सवाल ये है कि मदरसा बोर्ड ने इस तरह का हिन्दी विरोधी फैसला लिया कैसे।

हिन्दी सीखते पाकिस्तान के हिन्दु

सरकारी मदद

किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि मदरसा बोर्ड पूरी तरह से राज्य सरकार के रहमोंकरम पर चलता है। राज्य सरकार ही उसे फंड उपलब्ध करवाती है। जो समाजवादी पार्टी की सरकार अपने को हिन्दी का सबसे बड़ा प्रवक्ता होने का दावा करती है, उसके प्रदेश में हिन्दी का मदरसा बोर्ड ने घोर अपमान किया है।

कानपुर से संबंध रखने वाले कवि प्रमोद तिवारी कहते हैं कि राज्य मदरसा बोर्ड के उक्त फैसले का कोई आधार नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि क्या मदरसों में पढ़ने वाले उत्तर प्रदेश से संबंध नहीं रखते ? क्या उन्हें हिन्दी पढ़ना-जानना जरूरी नहीं है। मतलब मदरसा के छात्रों के लिए हिन्दी से बढ़कर अंग्रेजी हो गई।

जारी रहे हिन्दी

उधर, राजधानी में अल्मांरफीक मदरसा के प्रभारी मकसूद आलम ने भी मदरसा बोर्ड के फैसले को गलत ठहराया।उन्होंने कहा कि हिन्दी को मदरसों में अनिवार्य विषय के रूप में ही पढाया जाना चाहिए। सरकार को बोर्ड के फैसले को नहीं मानना चाहिए।

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