हिमाचल: 4 सीटों पर मिली हार बीजेपी के लिए नहीं है परेशानी का सबब, वोट शेयर में हुई गिरावट से बढ़ी टेंशन

नई दिल्ली, 16 नवंबर: हाल ही में हुए उपचुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा को हिमाचल प्रदेश बड़ी शमिंर्दगी झेलनी पड़ी है। राज्य की एक लोकसभा और तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में बीजेपी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस ने मंडी लोकसभा उपचुनाव सहित तीनों विधानसभा क्षेत्रों - अर्की, फतेहपुर और जुब्बल-कोटखाई में जीत हासिल की है। बीजेपी की इस हार के पीछे कई वजहों को जिम्मेदार माना जा रहा है।

वोट शेयर में भारी गिरावट

वोट शेयर में भारी गिरावट

हिमाचल भाजपा के नेताओं के अनुसार, करारी हार का सबसे प्रमुख कारण 'टिकटों के वितरण में आलाकमान द्वारा लिया गया एकतरफा फैसला' था। पार्टी के भीतर चल रही अंदरुनी कलह और गुटबाजी को माना जा रहा है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए इन सीटों पर मिली हार परेशानी का अधिक का सबब नहीं है। पार्टी को इस वक्त जिस चीज की सबसे अधिक चिंता सता रही है, वह वोट शेयर में भारी गिरावट।

जुब्बल-कोटखाई सीट पर बीजेपी की जमानत हुई जब्त

जुब्बल-कोटखाई सीट पर बीजेपी की जमानत हुई जब्त

सत्तारूढ़ दल परंपरागत रूप से उपचुनावों में जीतती रही है। लेकिन अपनी करारी हार से भाजपा की मुश्किलें इस तथ्य से और बढ़ गई हैं कि इन निर्वाचन क्षेत्रों में उसके वोट-शेयर में भारी गिरावट आई है। फतेहपुर विधानसभा में 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 49 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन उपचुनाव में यह घटकर 32 फीसदी रह गया। जो कि सत्तारूढ़ दल के लिए चिंता का विषय है। जुब्बल-कोटखाई विधानसभा सीट पर इस उपचुनाव में कांग्रेस के खाते में लगभग 52 प्रतिशत वोट-शेयर आया था, जबकि बागी चेतन बरागटा 41 प्रतिशत वोट शेयर पाने में कामयाब रहे, जबकि भाजपा के उम्मीदवार सरायक को केवल चार प्रतिशत वोट मिले। इस विधानसभा में बीजेपी का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। 2017 के विधानसभा चुनावों में इस सीट पर कांग्रेस के पास लगभग 42 प्रतिशत वोट-शेयर था, जबकि भाजपा के पास 49 प्रतिशत वोट शेयर था। इस सीट पर बीजेपी कैंडीडेट की जमानत जब्त हो गई है।

मंडी सीट पर कांग्रेस वोट शेयर में 2 2 फीसदी का इजाफा

मंडी सीट पर कांग्रेस वोट शेयर में 2 2 फीसदी का इजाफा

वहीं अगर मंडी लोकसभा सीट की बात करें तो 2019 के संसदीय चुनावों में कांग्रेस का वोट-शेयर 27 प्रतिशत था, जो इन उपचुनावों में बढ़कर लगभग 49 प्रतिशत हो गया है। वहीं बीजेपी को 2019 में इस सीट पर 69.7 फीसदी वोट मिले थे। जो इस चुनाव में घटकर करीब 48 फीसदी रह गया। इस चुनाव में कांग्रेस ने इस सीट पर लगभग 22 फीसदी वोट शेयर में वृद्धि हासिल की है। हालांकि बीजेपी इस हार को यह कहकर सामान्य बनाने की कोशिश कर रही है कि, प्रतिभा सिंह सहनभूति के चलते जीती हैं।

'हार के लिए सीएम ठाकुर को बहुत हद तक दोषी'

'हार के लिए सीएम ठाकुर को बहुत हद तक दोषी'

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने हार के लिए सीएम ठाकुर को बहुत हद तक दोषी ठहराया है। उनका कहना है कि, मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने फतेहपुर सीट पर आलाकमान को पूरी तरह गुमराह किया। चूंकि कृपाल परमार को 2017 में पीएम मोदी के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के कारण विधानसभा का टिकट मिला था, इसलिए राज्य स्तर के नेताओं ने इस बार उन्हें दरकिनार करने का फैसला किया था। उनकी उम्मीदवारी में खत्म करने के लिए, पीएमओ को फर्जी रिपोर्ट भेजी गई, इसलिए इस बार उन्हें टिकट नहीं दिया गया।

आंतरिक कलह के कारण बलि चढ़ गई कोटखाई सीट

आंतरिक कलह के कारण बलि चढ़ गई कोटखाई सीट

बीजेपी नेता ने बताया कि, कोटखाई सीट जेपी नड्डा खेमे और प्रेम कुमार धूमल खेमे के बीच आंतरिक कलह के कारण बलि चढ़ गई। (केंद्रीय मंत्री) अनुराग ठाकुर और धूमल के काफी करीबी माने जाने वाले चेतन बरागटा को सीएम ठाकुर टिकट नहीं देना चाहते थे, इसलिए टिकट एक कमजोर उम्मीदवार नीलम सरायक को आवंटित किया गया। लेकिन मुख्यमंत्री भी उनकी जीत सुनिश्चित नहीं कर सके।

वहीं दूसरी ओर प्रेम कुमार धूमल और जेपी नड्डा के बीच संबंध काफी समय से काफी खराब रहे हैं। 2010 में जब धूमल राज्य के सीएम थे तब उन्होंने आलाकमान से नड्डा को केंद्रीय टीम में शामिल करने का अनुरोध किया था। इस अनुरोध के बाद, तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने नड्डा को राज्य की राजनीति से हटा दिया और उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में नियुक्त किया, जिससे धूमल को राज्य के मामलों में एक स्वतंत्र लगाम मिली। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी से नजदीकी के चलते पार्टी के भीतर नड्डा के कद में इजाफा हुआ। वह पहले मोदी कैबिनेट में मंत्री बने और अब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। इसी का परिणाम है कि, नड्डा अपने करीबी सहयोगी जय राम ठाकुर को भी मुख्यमंत्री बनवाने में कामयाब रहे।

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