जिसने निजता के अधिकार पर दी थी दलील, पढ़िए आधार पर उस वकील की राय
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 24 अगस्त 2017 को निजता के अधिकार को आर्टिकल 21 और भारतीय संविधान के पार्ट-2 के तहत मौलिक अधिकार घोषित कर दिया है। निजता के अधिकार पर दलील करने वाले वकीलों में से एक प्रसन्ना एस ने वनइंडिया को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू दिया है। उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर जो फैसला सुनाया है, उससे कोर्ट ने आधार के पीछे के आइडिया को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। आइए जानते हैं क्या-क्या कहा वकील प्रसन्ना ने।
सवाल- सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 21 और संविधान के पार्ट-3 के तहत निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया है, तो इस तरह आधार के लिए जमा किया गया डेटा और जानकारी कितनी तर्क संगत है?
जवाब- सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को न केवल मौलिक अधिकार कहा है, बल्कि यह भी कहा है कि लोगों के अधिकार पर लगने वाली बाध्यताएं भी कम से कम हों। इसके लिए एक कानून होना चाहिए। 2016 तक आधार योजना को कोई कानूनी समर्थन नहीं मिला था। इस तरह से 2016 से पहले जमा किया गया डेटा किसी भी कानून के तहत नहीं आता है, इसलिए मेरे हिसाब से उस सारे डेटा को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि जल्द भी भारत में एक डेटा प्रोटेक्शन कानून भी बन सकता है और इसके लिए उन्हें एक समिति के बनाए जाने की अपेक्षा भी की।
सवाल- आधार योजना को तर्कसंगत बताते हुए केन्द्र ने कहा है कि गरीबों के जीने का अधिकार उच्च वर्ग के निजता के अधिकार से कहीं अधिक महत्व रखता है। निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब केन्द्र और सुप्रीम कोर्ट एक दूसरे के विरोध में खड़े नजर आ रहे हैं। आपको क्या लगता है कि इस परस्पर विरोध को कैसे खत्म किया जा सकता है या फिर केन्द्र के पास ही आधार पर आखिरी फैसला लेने का अधिकार है?
जवाब- यह हास्यास्पद और दुखद है। निजता का अधिका मौलिक अधिकार है और गरीब यह नहीं कह रहे कि उन्हें निजता नहीं चाहिए, यह सरकार है जो उन पर निजता और गरीबी में से किसी एक को चुनने का दबाव बना रही है। या तो सरकार को यह समझ ही नहीं आ रहा है कि गरीबी क्या है और निजता क्या है। ऐसे भी लोग हैं जो समानता के अधिकार को उच्च वर्ग के एक विकल्प के रूप में देख सकते हैं। हालांकि, वास्तविकता इससे अलग है।
सवाल- सुप्रीम कोर्ट के फैसले से किसी नागरिक की यौन प्राथमिकता को लेकर भी कुछ बड़े सकेंत मिले हैं, क्या इसका इशारा यह है कि भविष्य में धारा 377 को खत्म किया जा सकता है?
जवाब- इस बात की बहुत ही कम संभावनाएं है कि इस धारा को खत्म किया जाए, और यह अच्छा है कि फैसला वापस कोर्ट के पास आ गया है, ससद पर इसे नहीं छोड़ा गया है।
सवाल- क्या सुप्रीम कोर्ट की तरफ से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किए जाने पर कोई तर्कसंगत बाध्यताएं है? अगर कोई हैं, तो वो क्या हैं?
जवाब- किसी भी व्यक्ति पर लिया जाने वाला कोई एक्शन पूरी तरह से निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए।
सवाल- इस फैसले से ऐसे कौन से केस या पुराने फैसले पर, जिन पर असर पड़ेगा?
जवाब- इस फैसले से बहुत सी योजनाओं पर असर पड़ेगा और बहुत सी ऐसी योजनाएं होंगी, जिन पर भविष्य में असर पड़े।












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